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सस्ती लागत ने बढ़ाई संभावनाएं : मेक इन इंडिया की राह पर आगे बढ़ते भारत और मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने के मायने

Sat, 12 Nov 2022 06:17 AM IST
Jayantilal Bhandari जयंतीलाल भंडारी
Updated Sat, 12 Nov 2022 06:17 AM IST
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सार
निश्चित रूप से जिस तरह भारत की नई लॉजिस्टिक नीति 2022 और गति शक्ति योजना का आगाज अभूतपूर्व रणनीतियों के साथ हुआ है, उससे भी भारत आर्थिक प्रतिस्पर्धी देश के रूप में तेजी से आगे बढ़ेगा।
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Affordable cost increased possibilities: path of Make in India and meaning of becoming manufacturing hub
मैन्युफैक्चरिंग - फोटो : PTI

विस्तार

इस समय भारत मेक इन इंडिया ही नहीं, वरन मेक फॉर द ग्लोबल के मंत्र के साथ मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की जिस राह पर आगे बढ़ रहा है, उसकी चमक वैश्विक व्यापार के 75 फीसदी से अधिक हिस्से का प्रतिनिधित्व करने वाले जी-20 की बैठक में नजर आ सकती है, अगले साल जिसकी अध्यक्षता भारत करेगा। जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत के कोने-कोने में जी-20 के करीब 200 विभिन्न कार्य समूह की बैठकों के दौरान दुनिया नए सामर्थ्यवान भारत और उभरते हुए मैन्यूफैक्चरिंग हब को नजदीक से देख पाएगी। 



निस्संदेह भारत के मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की अनुकूलताएं एक के बाद एक उभरकर दिखाई दे रही हैं। हाल ही में तीन नवंबर को प्रकाशित 85 देशों के मैन्यूफैक्चरिंग से संबंधित विभिन्न कारकों का समग्र मूल्यांकन करने वाली विश्व प्रसिद्ध यूएस न्यूज ऐंड वर्ल्ड रिपोर्ट’-2022 के तहत सस्ते विनिर्माण के मद्देनजर भारत को 100 प्रतिशत अंक दिए गए हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने चीन और वियतनाम को पीछे छोड़ते हुए दुनिया भर में सबसे कम ‘विनिर्माण लागत’ वाले देश का दर्जा हासिल कर लिया है। 


हालांकि इस रिपोर्ट में ‘अनुकूल कर वातावरण’ और 'पारदर्शी सरकारी नीतियां' जैसी श्रेणियों में भारत का प्रदर्शन अब भी सुधार योग्य कहा गया है। भारत के मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने के परिप्रेक्ष्य में अधिक विनिर्माण लागत सबसे बड़ी चुनौती रही है, ऐसे में जहां अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में मैन्यूफैक्चरिंग लागत में कमी भारत के लिए सुकूनदेह है, वहीं देश में तेजी से आर्थिक सुधारों ने भी उसकी संभावनाओं को आगे बढ़ाया है। 

विगत तीन नवंबर को वडोदरा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने निजी क्षेत्र में देश के सबसे पहले सी-295 परिवहन विमान निर्माण संयंत्र का शिलान्यास करते हुए कहा कि पिछले आठ वर्षों में सरकार ने जिस तरह कई आर्थिक सुधारों को अपनाया है और कई प्रोत्साहन दिए हैं, उससे भी भारत मैन्यूफैक्चरिंग के एक बेहतर हब के रूप में उभरते हुए दिखाई दे रहा है। मोदी के अनुसार, इस समय भारत का उद्योग-कारोबार सेक्टर करीब 160 से अधिक देशों की कंपनियों के निवेश से सुसज्जित है। 

भारत में विदेशी निवेश कुछ उद्योगों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था के 61 क्षेत्रों में फैले हुए हैं और भारत के 31 राज्यों को कवर करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस समय दुनिया भर में मेक इन इंडिया की मांग बढ़ रही है। आत्मनिर्भर भारत अभियान में मैन्यूफैक्चरिंग के तहत 24 सेक्टर को प्राथमिकता के साथ तेजी से आगे बढ़ाया जा रहा है। चीन से आयात किए जाने वाले दवाई, रसायन और अन्य कच्चे माल का विकल्प तैयार करने के लिए पिछले दो वर्ष में सरकार ने प्रोडक्शन लिंक्ड इनसेटिव (पीएलआई) स्कीम के तहत 14 उद्योगों को करीब दो लाख करोड़ रुपये आवंटन के साथ प्रोत्साहन सुनिश्चित किए हैं। 

अब देश के कुछ उत्पादक चीन के कच्चे माल का विकल्प बनाने में सफल भी हुए हैं। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, पीएलआई स्कीम की सफलता के कारण ही वर्ष 2022-23 में अप्रैल-अगस्त के दौरान फार्मा उत्पादों के आयात में पिछले वर्ष की समान अवधि की तुलना में 40 फीसदी की कमी आई है और निर्यात में पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि के मुकाबले करीब 3.47 फीसदी की वृद्धि हुई है। 

निश्चित रूप से जिस तरह भारत की नई लॉजिस्टिक नीति 2022 और गति शक्ति योजना का आगाज अभूतपूर्व रणनीतियों के साथ हुआ है, उससे भी भारत आर्थिक प्रतिस्पर्धी देश के रूप में तेजी से आगे बढ़ेगा। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा हाल ही में एक नवंबर को डिजिटल रुपये की शुरुआत और नौ नवंबर को विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) द्वारा निर्यातकों को निर्यात लाभों का दावा रुपये में करने में सक्षम बनाए जाने संबंधी महत्वपूर्ण निर्णय से भी देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनाए जाने में मदद मिलेगी।

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