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अबकी बार गोलमटोल सरकार

Sun, 21 Jun 2015 08:32 PM IST
निर्मल गुप्त
निर्मल गुप्त Updated Sun, 21 Jun 2015 08:32 PM IST
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Abki bar Golmatol sarkar

बिहार में चुनावों की आहट सुनाई देने लगी है। विवाह के अवसर पर होने वाले सामूहिक भोज का सा माहौल बनने लगा है। हलवाइयों ने अपनी भट्टियां लीपनी शुरू कर दी है। आटा, दाल, चीनी, आलू, नमक, आदि की पहली खेप पहुंचने लगी है। मंगल गीत गाने के लिए गवैये गला खंखार रहे हैं। ढोलकों को ठोक-पीट कर दुरुस्त किया जा रहा है। समय रहते तमाम इंतजामों को परखने की कवायद चल रही है। बस दूल्हा कौन होगा, इस पर संशय बरकरार है। प्रदेश का वोटर दम साधे सारा कौतुक देख रहा है, पर आसन्न चुनावों को भांपकर दुधारू पशु रंभाने लगे हैं। वे भी सत्ता में उचित शेयर की मांग कर रहे हैं।

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सुशासन बाबू लगातार मुस्करा रहे हैं। कोई बता रहा है कि वह मुस्कुरा नहीं रहे, वास्तव में इतरा रहे हैं। जब से वह शत-प्रतिशत सेकुलर हुए हैं, तब से खुशमिजाज हो चले हैं। उन्होंने कह दिया है कि प्रदेश के विकास की खातिर वह कुछ भी कर सकते हैं। विकास से उनका आशय सत्तारूढ़ होने से है। सर्वांगीण तरक्की के लिए वह भूतपूर्व जी को तमाम प्रकार और प्रजाति के फल न्योछावर करने को तैयार हैं, बशर्ते वह और कोई मांग न करें।
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एक भूतपूर्व जी हैं कि मानकर भी मानते ही नहीं। किसी न किसी बात पर बिदक और रूठ जाते हैं। जब वह नाराज होते हैं, तो कह देते हैं कि उन्होंने तमाम विकल्प खुले रखे हैं। इसी खुलेपन की खातिर वह विभिन्न दलों के नेताओं से क्लोज डोर मीटिंग कर आते हैं। उन्हें पता है कि राजनीति में दरवाजे सदा खुले रखने चाहिए। सिर्फ दरवाजे ही नहीं, खिड़कियां और रोशनदान भी खुले रहें, तो उम्मीद की गगरी कभी नहीं रीतती। दावतों में लड्डू उसी की पत्तलों में प्रकट होते हैं, जो उसमें उन्हें परोसे जाने की गुंजाइश रखते हैं। जिन पत्तलों में रायता, सब्जी, चटनी फैली होती हैं, उसमें लड्डू परेसने वाले हाथ ठिठक जाते हैं।
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सुशासन बाबू को यकीन है कि गठबंधन जी की चुहलबाजी के जरिये जनता को यह कहकर रिझा लेंगे कि कुशासन पर करो वार, इस बार गोलमटोल सरकार।

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