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सोशल मीडिया का आधार: निजता के अधिकार का उल्लंघन और कानूनी जटिलताएं

Mon, 16 Sep 2019 03:29 AM IST
पवन दुग्गल पवन दुग्गल
पवन दुग्गल Published by: पवन दुग्गल Updated Mon, 16 Sep 2019 03:29 AM IST
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Aadhar Of Social Media
सोशल मीडिया से आधार को जोड़ना - फोटो : अमर उजाला

हाल ही में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को यह स्पष्ट करने के लिए कहा है कि क्या सोशल मीडिया को आधार से जोड़ने के लिए वह कोई अधिसूचना जारी करना चाहती है। शीर्ष अदालत के इस निर्देश ने फिर आधार को सोशल मीडिया से जोड़ने के महत्वपूर्ण मुद्दे पर जनता का ध्यान आकर्षित किया है। इस प्रस्ताव के संबंध में जो आधार सामने रखा जा रहा है, वह यह है कि लोगों को सोशल मीडिया पर उनकी गतिविधियों के लिए पहचाना जाए। हालांकि यह उद्देश्य बेहद प्रशंसनीय है, पर इससे कई किस्म की कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।


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सोशल मीडिया के खातों से आधार को प्रभावी ढंग से जोड़ना कई तरह के संभावित आपदा को निमंत्रण देना हो सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि इसमें देश की संप्रभुता, सुरक्षा और अखंडता को ही नहीं, बल्कि लोगों की निजता के अधिकार जैसे मौलिक अधिकार को भी हानि पहुंचाई जा सकती है। इस तथ्य के बावजूद कि यह  अधिकार पूर्ण अधिकार नहीं है और कुछ उचित प्रतिबंधों के अधीन है, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह लोगों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर नकारात्मक असर डालेगा।

सोशल मीडिया खातों को आधार से जोड़ने के मामले में समझना चाहिए कि ज्यादातर सोशल मीडिया कंपनियां भारत से बाहर हैं। इसलिए सोशल मीडिया से आधार को जोड़ते ही आप आधार से जुड़ी जानकारियां संबंधित सोशल मीडिया कंपनी के विदेशी सर्वर पर भेजते हैं, जो विदेशी अधिकार क्षेत्र और उसके कानूनों के प्रति उत्तरदायी हैं। वैसे में विदेशी सरकारें सोशल मीडिया और आधार के जुड़ाव से संबंधित आंकड़ों को अपने अधिकार क्षेत्र में मान लेंगी। ऐसे में यदि विदेशी खुफिया एजेंसियां आधार की पूरी जानकारियां हासिल करने में सक्षम हो जाती हैं, तब वह भारत की महत्वपूर्ण सूचना संरचना के रूप में आधार को निशाना बनाने में मदद करेगी और संभवतः भारत की सुरक्षा, संप्रभुता और अखंडता को भी निशाना बनाएगी। जब हमारी सरकार सोशल मीडिया कंपनियों पर भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के प्रावधानों को लागू करने के लिए जूझ रही है, तब सोशल मीडिया खातों से आधार को जोड़ने का विचार निश्चित रूप से ठीक नहीं है।

दूसरी बात यह कि जब आप लोगों के आधार को उनके सोशल मीडिया खातों से जोड़ेंगे, तो आप निजता के उनके अधिकार का उल्लंघन करेंगे। उन्हें यह कहने का अधिकार है कि आधार संबंधी उनकी जानकारियां विदेशी सर्वर पर नहीं जानी चाहिए और एक बार जब ये विदेशी सर्वरों पर चली जाएंगी, तो यह निजता के उनके अधिकार पर, जो उनके जीने के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है, हानिकारक ढंग से असर डालेगा।

यह समझना कठिन है कि हम देश के नेटीजन्स (इंटरनेट पर सक्रिय लोगों) को क्यों यह महसूस कराना चाहते हैं कि सरकार धौंस दिखाना चाह रही है। लोग इस बात से आशंकित हैं कि आधार को सोशल मीडिया से जोड़ने पर सरकार को लोगों की अभिव्यक्ति पर ज्यादा नियंत्रण करने का अधिकार मिल सकता है। ऐसा रवैया लोगों के दिलो दिमाग में एक किस्म का भय पैदा कर सकता है, जिससे कि वे प्रभावी और स्वतंत्र ढंग से खुद को न व्यक्त कर सकें। यह देश के नागरिकों के कार्य करने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है।

ऐसा कतई नहीं लगता कि सोशल मीडिया को आधार से जोड़ने से फर्जी खबरों की समस्या और उसके प्रसार से निपटने में मदद मिलेगी। इसके बजाय, देश को फर्जी खबरों से निपटने के लिए नए कानून और कानूनी ढांचे के साथ तत्काल सामने आने की आवश्यकता है। यह इसलिए भी अहम है, क्योंकि भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 में फर्जी खबरों को लेकर कोई प्रावधान नहीं है। हमारे पास डाटा सुरक्षा या निजता पर कोई कानून नहीं है। हमें मलयेशिया जैसे देश के अनुभवों से सीखने की जरूरत है, जिसने विशेष रूप से इस क्षेत्र में काफी काम किया है।

ऐसे समय में जब ज्यादा से ज्यादा साइबर अपराधी अपनी गतिविधियां छिपाने के लिए डार्कनेट का सहारा ले रहे हैं और जब दुनिया भर की कानून प्रवर्तन एजेंसियों को यह समझ में नहीं आ रहा है कि डार्कनेट पर होने वाले साइबर अपराधों पर कैसे अंकुश लगाया जाए, तब हमें कोई एक कदम उठाने के बजाय, समग्रता से काम करने की जरूरत है।

मध्यस्थों यानी इंटरनेट की सुविधा देने वाली कंपनियों पर भारत नरम रहा है। भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के खंड 79 को 2008 में संशोधित किया गया था। हालांकि यह कानून के तहत अपने दायित्वों का निर्वहन करने के लिए सोशल मीडिया कंपनियों को उचित तत्परता की अनुमति देता है, पर तथ्य यह है कि इनमें से ज्यादातर कंपनियां कानून का अनुपालन करने के बजाय उल्लंघन करती हंै और इसके बावजूद मध्यस्थों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई है। जब एक बार मध्यस्थों को उनके नेटवर्क पर झूठी खबरों के प्रसार के बारे में सूचित किया जाता है और वे उसे रोकने के लिए प्रभावी कदम उठाने में विफल होते हैं, तो उन्हें उनके नेटवर्क पर फैलाई जा रही झूठी खबरों के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया जाना चाहिए? ज्यादातर मध्यस्थ सर्वोच्च न्यायालय के श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ के फैसले की आड़ लेते हैं, जो मध्यस्थों को केवल अदालती आदेश या सरकारी एजेंसी से आदेश मिलने पर ही कार्रवाई करने का निर्देश देते हैं। इस तरह का नजरिया पहले से ही कानून का पालन करने वाले नागरिकों को प्रभावी उपाय अपनाने से वंचित करता है। इस दिशा में समरूप और ज्यादा सरल दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।

जाहिर है, वक्त की मौजूदा जरूरत यही है कि आधार को सोशल मीडिया से जोड़ने में हमें जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। कोई ठोस निर्णय लेने से पहले इस तरह के दृष्टिकोण की सकारात्मक और नकारात्मक चीजों पर विशेष रूप से विश्लेषण, चर्चा और विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। यह निर्णय भारतीय संविधान में निहित सिद्धांतों को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए। देश के संप्रभु हितों और नागरिक स्वतंत्रता व अधिकारों के संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की जरूरत है।

-सुप्रीम कोर्ट के वकील और इंटरनेशनल कमीशन ऑन साइबर सिक्योरिटी लॉ के चेयरमैन।

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