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एक ठहरी सी उदास जिंदगी
Sun, 03 May 2020 09:10 AM IST
आसिम खान
दयाशंकर शुक्ल सागर
दयाशंकर शुक्ल सागर
Published by: आसिम खान
Updated Sun, 03 May 2020 09:10 AM IST
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सांकेतिक तस्वीर
क्वारंटीन में अकेले उदास कमरे में कैद हूं। 12वीं मंजिल के इस तन्हा फ्लैट की बॉलकनी से सड़क की तरफ देखता हूं... खाली, वीरान, अंतहीन सड़क। और इसके किनारे खड़े अकेले तन्हा उदास पेड़। दूर-दूर तक कोई इंसान नहीं सिवाए झाड़ू लगाते एक सफाईकर्मी के। सिर्फ कुछ आवारा कुत्तों के भौंकने की आवाजें, नीरवता को भंग करती हैं। चौराहे पर कुछ महापुरुषों की मूर्तियां हैं, जिनके चेहरों पर भी मुर्दानगी दिखती है। भरी दोपहरी में हर तरफ एक अजीब-सी डरावनी निस्तब्धता है। इसे मरघट का सन्नाटा कहें या जिंदगी की चिर-प्रतीक्षित खामोशी।
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वक्त कैसे अनोखे ढंग से बदलता और चौंका देता है। कितना अजीब एहसास है यह... जब आपके चारों तरफ दुनिया मर रही हो, सायरन बजाती सफेद रंग की एम्बुलेंस आपके आसपास मरीजों को ढो रही हों और आप घरों में बेबस कैद हों। न केवल कैद हों बल्कि आपको गहरी नींद भी आ रही हो और आप सपने भी देख रहे हों। कुछ आशा से भरे तो कुछ खौफनाक सपने। रातों में लॉकडाउन की कुछ तस्वीरें आंखों के सामने से गुजरती हैं, जो दिन भर टीवी स्क्रीन पर चल रही खबरों से भटक कर जेहन के किसी अंधेरे कोने में अटक-सी गई थीं।
न्यूयॉर्क में डॉ. उमा मधुसूदन अपने घर के सामने हरे भरे लॉन की मखमली घास पर सफेद जैकेट पहने खड़ी हैं और सामने सड़क पर उनके इलाज से ठीक हुए दर्जनों मरीज अपनी-अपनी कार से उनके घर के सामने एक कतार में गुजरते हैं। और फिर वे हार्न बजाते हुए कार की खिड़की से अपना हाथ हिला कर अपनी डॉक्टर का अभिनंदन करते हैं। ये 'ड्राइव आफ ऑनर' है। इस सम्मान से अभिभूत, लॉन में खड़ी डॉ. उमा, तेज चलती हवा से फूलों की किसी नाजुक डाली-सी विनम्रता से झुक जाती हैं। उनकी आंखें भींगी हुई हैं और गला बेतरह रुंधा हुआ है। फिर सपने करवट बदलते हैं। एक दूसरी तस्वीर आंखों के सामने गुजरती है, हमारे अपने किसी शहर की। एक डॉक्टर को भीड़ दौड़ा रही है। उनके हाथों में पत्थर हैं, मजबूत डंडे हैं।
सफेद एप्रन में वह युवा महिला डॉक्टर लंबी अंधेरी गलियों में बदहवास भागी जा रही है। हिंसक भीड़ उसके पीछे भागती है। उसे ठोकर लगती है। वह नीचे गिर जाती है। डरी हुई कहती है- 'मुझे मत मारो। मैं तो आप लोगों की मदद करने आई थी। मैं चली जाउंगी। प्लीज, मुझे मत मारो।' मैं डर कर उठ जाता हूं। यह ख्वाब है या हकीकत। शायद यह कोई ख्वाब है। पर कितना भयावह है यह। ईसा मसीह को सूली पर कीलों से ठोंकने के जैसा डरावना। चैनल और अखबार सिर्फ संक्रमितों और मौत के आंकड़े छापते हैं। उसमें मृतकों की कोई शिनाख्त नहीं होती। उनका कोई पता नहीं होता। कोई उम्र नहीं होती। सिर्फ संख्या होती है। मौत बहुत दबे पांव आती है।
हां, तो मैं अखबारों की बात कर रहा था, जो पहले से बहुत दुबले हो गए हैं। जैसे उनकी आत्मा किसी ने निचोड़ ली हो। उनके चमकदार पन्नों पर अब बड़े-बड़े इश्तेहार नहीं छपते। पत्रकार अपने चेहरों को मास्क से छिपा कर अस्पतालों, मस्जिदों, कब्रिस्तानों और श्मशान घाटों पर खबरें ढूंढ़ते हैं। फिर विचलित करने वाली अफवाहें और खबरें छापते हैं। वे बताते हैं कि कैसे दूर शहरों में फंसे बच्चे, अपनी मरती हुई मां के अंतिम दर्शन वीडियो कॉल पर कर रहे हैं।
कैसे अपना सगा बेटा, पिता का अंतिम संस्कार करने को राजी नहीं और इलाके का तहसीलदार उस अजनबी को मुखाग्नि दे रहा है। बेटे ने जलती हुई चिता से पूरी तरह से 'सामाजिक दूरी' बना रखी है। इंसानी रिश्ते कितने ठंडे, बेजान और निर्विकार हो गए हैं। और वे जो इस नामुराद नोवल कोरोना वायरस से बच गए, उनके लिए मेडिकल स्टॉफ तालियां बजा रहा है। नर्सें उन्हें विदाई दे रही हैं। मरते हुए आदमी को अचानक लगता है कि वह जिंदा बच गया। वह तय करता है कि अब वह अपनी जिंदगी को पूरी शिद्त से जीएगा।
वह आत्मा की उन सारी ऊंचाइयों को छुएगा जो उसकी पहुंच से अब तक बहुत दूर थीं। लेकिन वह फिर अपनी उसी पुरानी दुनिया में लौट आता है, जो अब उसके लिए पूरी तरह बदल चुकी है। जहां अदृश्य, अनोखा, रहस्यमय और बेरहम वायरस अब भी जिंदा है और सबको डरा रहा है।