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खंडित दुनिया के लिए एक सशक्त विचार
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धारावी
वर्ष 2018 को पीछे छोड़कर हम नए वर्ष 2019 में प्रवेश कर गए हैं। इस समय मेरे जेहन में कई विचार कौंध रहे हैं। यह नया वर्ष निस्संदेह हमारे लिए महत्वपूर्ण होगा। इस वर्ष हमारे देश में लोकसभा के चुनाव होंगे, जो दुनिया की सबसे बड़ी लोकतांत्रिक कवायद होगी। और संभवतः चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका का अब तक का सबसे बड़ा परीक्षण होगा। 2019 का चुनाव भारत के वैकल्पिक विचारों के बीच एक बहुप्रतीक्षित प्रतियोगिता होगी और नतीजों में इस देश में रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति की साझेदारी होगी।
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आगे क्या होने वाला है, इस पर राजनीतिक पंडित अपने विचार व्यक्त करेंगे, क्योंकि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी चुनावी रण के लिए तैयार है और फिर से ऊर्जावान हुई कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष इस खेल में वापस लौट आया है। लेकिन राजनीतिक रंगमंच पर जो जितना मायने रखता है, वह उतना ही हमारी प्रतीक्षा करता है, यह सामाजिक वास्तविकता है। तथ्य यह है कि भारत आज कई अन्य देशों की तरह व्यापक रूप से एक खंडित समाज है। कुछ लोगों के लिए भारत चमक रहा है, लेकिन लाखों अन्य लोगों के लिए जीवन अब भी अंधकारमय बना हुआ है। हाशिये पर रहने वाले कई लोगों को खाई में गिरने का खतरा है, तो कई खाई में गिर भी रहे हैं।
यही वजह है कि राजनीतिक पूर्वानुमानों या विकास की भव्य कथा पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय मैं यहां एक सशक्त विचार साझा कर रही हूं, जिसे मैंने ब्रिटिश सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ प्रोफेसर एंथनी कोस्टेला की पुस्तक द सोशल ऐज से उठाया है। प्रोफेसर कोस्टेलो बीस वर्षों से ब्रिटेन, बांग्लादेश, भारत, मलावी और नेपाल में सहानुभूति समूहों के साथ काम कर रहे हैं और हाल तक वह विश्व स्वास्थ्य संगठन में एक वरिष्ठ अधिकारी थे। प्रोफेसर कोस्टेलो की 500 पृष्ठों की पुस्तक हमारे स्वास्थ्य, धन और टिकाऊ भविष्य के लिए सहानुभूति समूहों की ताकत पर आधारित है।
ये सहानुभूति समूह क्या हैं और हमारे आज के खंडित, ध्रुवीकृत सामाजिक लोकाचार में वे क्यों इतने महत्वपूर्ण हैं? कोस्टेलो कहते हैं कि सहानुभूति समूह परिवारों से परे सबसे छोटे सामाजिक समूह हैं, जो बड़े पैमाने पर सामाजिक विश्वास और लाभ पैदा करते हैं। इन लोगों को हमराज या विश्वासपात्र कहा जा सकता है, जो स्थानीय समस्याओं और खतरों को विश्लेषित करने तथा उस पर कार्रवाई करने के लिए एकजुट हुए हैं। इन सहानुभूति समूहों के पास काफी ताकत होती है। उन्हें बेहतरी के लिए प्रेरित किया जा सकता है-कई अध्ययनों ने समय पूर्व मौत से बचाने में सामाजिक रिश्ते की ताकत को दर्शाया है।
लेकिन सहानुभूति समूह सामुदायिक स्तर पर भी बदलाव को संभव बनाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जैसा कि मैंने हाल ही में मुंबई के धारावी की झुग्गी बस्तियों में घूमने के दौरान पाया। धारावी का हमेशा पर्यटन गाइड पुस्तिका में एशिया की सबसे बड़ी झुग्गी बस्ती के रूप में जिक्र किया जाता है, लेकिन उसने हाल के वर्षों में सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था, जिसमें आंगनवाड़ी केंद्र और स्नेहा (सोसाइटी फॉर न्यूट्रीशन, एजुकेशन ऐंड हेल्थ एलायंस) नामक एक गैर सरकारी संगठन भी शामिल है, के साथ भागीदारी करके बाल कुपोषण को घटाया है। धारावी में बच्चे इसलिए कुपोषित नहीं हैं कि उनके माता-पिता के पास हमेशा भोजन के लिए पर्याप्त पैसा नहीं होता है, बल्कि युवा माताओं में जागरूकता की कमी होती है और भोजन की अच्छी आदतों, स्वच्छता तथा सामाजिक बाधाओं के बारे में उन्हें कम जानकारी होती है।
यदि आप लोगों को केवल यह बताते हैं कि वे गलत हैं और अगर आप उन्हें यह मानने के लिए बाध्य करते हैं कि आप उनसे क्या चाहते हैं, तो लोग अपने व्यवहार में बदलाव नहीं करते हैं। वे तब बदलते हैं, जब किसी भरोसेमंद व्यक्ति द्वारा मना लिए जाते हैं, जिन पर उन्हें आत्मविश्वास होता है। और यही वह जगह है, जहां स्नेहा अपनी टीम और स्वयंसेवकों को तैनात करती है। ये स्वयंसेवक समुदाय के ही लोग होते हैं, जो स्थानीय आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं, डॉक्टरों और निगम द्वारा संचालित सायन अस्पताल के आहार विशेषज्ञों के साथ साझेदारी के माध्यम से सफल होते हैं। इसी को मैं व्यापक बेहतरी के लिए सहानुभूति समूह की ताकत कहना चाहूंगी।
प्रोफेसर कोस्टेलो की पुस्तक का मुख्य तर्क यह है कि सहानुभूति समूह स्वास्थ्य, संगठन और पर्यावरणीय चुनौतियों से निपटने के लिए एक वैकल्पिक और अतिरिक्त अच्छा उपाय नहीं है। जैसा कि वह बताते हैं, यह गहन रूप से महत्वपूर्ण और केंद्रीय उपाय है, हालांकि उनकी शक्ति को अक्सर मुखर रूप से स्वीकार नहीं किया जाता है।
भारत के आगामी लोकसभा चुनाव में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका होगी। उनका उपयोग अभूतपूर्व होगा, क्योंकि जो सत्ता में हैं और जो सत्ता में आने की इच्छा रखते हैं, वे दोनों सोशल मीडिया का उपयोग करेंगे। जनमत बनाने और लोगों के व्यवहार को बदलने के लिए वाट्स ऐप और सोशल मीडिया के अन्य विकल्पों के जरिये गलत खबरें फैलाने की कोशिशें होंगी। हमारा एक व्यक्ति के रूप में कोई मायने नहीं होगा, केवल मतदाता के रूप में हमारा मतलब होगा।
इसलिए अब जबकि भारत धर्म, जाति, उपजाति, जनजाति, हमारी पसंद-नापसंद और यहां तक खानपान जैसे दोषपूर्ण पूर्वाग्रहों के साथ ध्रुवीकरण के गंभीर खतरे में फंसा है और जैसा कि हम नफरत की हिंसा और घृणा की भाषा का सामना करते हैं, यहां उम्मीद की बात है कि सहानुभूति समूह भी बनने लगे हैं, जो जमीनी स्तर पर आम लोगों की बेहतरी पर ध्यान केंद्रित करते हैं और वे व्यक्ति और समुदाय के रूप में इन चुनौतियों से निपटने में सहायता करते हैं। वास्तविक जीवन में अपने सहानुभूति समूह के साथ संबंध बनाने से हमें मदद मिल सकती है। यह एक सशक्त विचार है, जिसका समय निश्चित रूप से आ गया है!