{"_id":"5efc03fe77ed5f381a699cb8","slug":"a-new-deal-for-india","type":"story","status":"publish","title_hn":"भारत के लिए एक 'नया सौदा'","category":{"title":"Opinion","title_hn":"विचार","slug":"opinion"}}
भारत के लिए एक 'नया सौदा'
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
इंडिया गेट
- फोटो : अमर उजाला
भारत के दो पहलू हैं। एक शहरी, तकनीकी प्रेमी भारत, जो बड़े शहरों की ऊंची इमारतों में रहता है और जिसकी आबादी 35 फीसदी है। और दूसरा, 65 फीसदी की आबादी वाला ग्रामीण भारत, जो हमारे लिए अन्न पैदा करता है और घर बनाता है। ग्रामीण भारत ही भारत की भावना को बरकरार रखता है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
चूंकि भारत में इक्कीसवीं सदी की तैयारी का अभाव है, इसलिए दुर्भाग्य से ग्रामीण और शहरी भारत के बीच आय की व्यापक असमानता है। ग्रामीण भारत में एक विशाल आबादी के पास गुणवत्तापूर्ण मजदूरी और रोजगार की संभावनाओं का अभाव है। नतीजतन भारतीय कार्यबल का 43 फीसदी हिस्सा (विश्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक) कृषि पर निर्भर है, जो जोड़े गए सकल मूल्य (जीवीए) में मात्र 17.6 फीसदी का योगदान करता है।
कोविड संकट से पहले उद्योग एवं सेवा क्षेत्र क्रमशः जीवीए में 27.4 फीसदी और 55 फीसदी का योगदान करते थे और उनमें उच्च विकास की संभावनाएं हैं। आजादी के सत्तर साल बाद भी ग्रामीण भारत का विशाल हिस्सा सब्सिडी और सरकारी मदद पर निर्भर है। हमें भविष्य की तैयारी करने और अपने नागरिकों को बढ़ी हुई आय दिलाने के लिए निवेश करना चाहिए।
बाजार मूल्य-आवश्यक वस्तु अधिनियम के दायरे को कम करके और एपीएमसीज (कृषि उत्पाद बाजार समिति) को समाप्त करके प्रधानमंत्री मोदी किसानों को सक्रियता से सशक्त बना रहे हैं। दशकों तक बिक्री पर प्रतिबंध और कम मूल्य निर्धारण की मार झेलने वाले किसान आखिरकार बाजार मूल्य पर अपना उत्पाद बेचने के लिए स्वतंत्र हैं। एफपीओ मॉडल (किसान उत्पादक संगठन) ने सकारात्मक नतीजे दिए हैं। हालांकि, सीधे बाजार में बेचने के लिए प्रौद्योगिकी और वास्तविक समय पर सूचना सबसे ज्यादा जरूरी है।
एग्री-टेक प्लेटफॉर्म- पिछले 5-7 वर्षों में बंगलूरू और अन्य शहरों में 500 से ज्यादा एग्री-टेक कंपनियों ने किसानों के सशक्तीकरण के लिए तकनीकी-सक्षम रणनीतियों को तैयार और मंजूर किया है। उसके उपयोग से किसानों को कम अपव्यय और अन्य महत्वपूर्ण लाभों के साथ यूपीआई के जरिये बीस से 25 फीसदी ज्यादा की आय हुई।
नाबार्ड के तहत भारत सरकार आत्मनिर्भर भारत अभियान के हिस्से के रूप में एक हजार से ज्यादा एग्री-टेक कंपनियों में 5,000 करोड़ रुपये का निवेश करने पर विचार कर सकती है, जिससे किसानों को बाजारों और आपूर्ति शृंखला से जोड़ने के लिए तकनीक-सक्षम रणनीति विकसित हो सकती है। इससे किसानों की आय दोगुनी करने में भी मदद मिल सकती है।
कृषि रणनीति में विविधता- किसान अपनी आय बढ़ाने, जोखिम कम करने और निर्यात बाजारों तक पहुंचने के लिए अपने उत्पादों में विविधता ला सकते हैं। पूरे राज्य या जिले के लिए एक कृषि नीति बनाना व्यावहारिक नहीं है। प्रत्येक तालुके में जलवायु और फसल की स्थिति, भंडारण सुविधाओं और बाजार संपर्क के आधार पर अलग योजना होनी चाहिए, और हर किसान को अलग रणनीति को आगे बढ़ाने में सक्षम होना चाहिए।
अनुमानित रूप से उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और राजस्थान जैसे राज्यों के 7.2 करोड़ प्रवासी श्रमिक दिल्ली, दक्षिण व पश्चिम के विकसित राज्यों में काम करते थे। लेकिन लॉकडाउन के चलते वे अपने गृह राज्य लौट गए। अब भविष्य की तैयारी के लिए निवेश एजेंडा को शुरू करने का वक्त है, जो इस विपरीत प्रवासन का लाभ उठा सकता है।
श्रम प्रधान उद्योग- ज्यादातर उद्योग भारत के कुछ शहरी क्षेत्रों के पास स्थित हैं, जबकि उन्हें श्रमिक बहुल क्षेत्रों के निकट होना चाहिए। हम पूरे भारत में से 5,000 शहरों को चुनकर (विशेष रूप से श्रम-बहुल क्षेत्रों में) उसके आसपास उद्योगों को स्थानांतरित कर सकते हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने वादा किया है कि लौटने वाले श्रमिकों में से किसी को भी फिर से बाहर नौकरी खोजने की जरूरत नहीं है। श्रम-प्रधान उद्योग इस वादे को पूरा करने का एक बेहतर तरीका है।
सेज मॉडल- भारत के 725 जिलों में से 400 को नए विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है, जहां श्रम प्रधान उद्योगों को स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन दिया जा सकता है। पूरे भारत में इसे स्थापित करने के लिए प्रोत्साहन और नकद निवेश की आवश्यकता है।
कौशल विकास-भारत सरकार के पास कौशल विकास के लिए 3,000 करोड़ रुपये का वार्षिक बजट है। प्रवासी मजदूरों के संकट को देखते हुए इसे 15,000 करोड़ रुपये वार्षिक किया जा सकता है। उद्यमशीलता को बढ़ावा- लौटने वाले प्रवासी श्रमिकों में से उद्यमी मानसिकता वाले लोगों को यदि मुद्रा और अन्य योजनाओं से पूंजी मिलेगी, तो वे अपने घर, कस्बों और गांवों में उद्यम स्थापित कर सकते हैं।
महामारी और प्रवासी संकट ने दुनिया की सबसे बड़ी उद्यमशीलता और कौशल विकास अभियान का मौका दिया है। कनेक्टिविटी- एनडीए-1 के दौरान 1.4 लाख ग्राम पंचायतों को ऑप्टिक फाइबर कनेक्टिविटी में सक्षम बनाया गया है। भारत सरकार बैंकिंग जरूरतों, किसानों, शिल्पकारों व अन्य ग्रामीण उत्पादकों को बाजार, वितरण व आपूर्ति शृंखला से जोड़ने के लिए टेल्को को पूरे देश में 4 जी नेटवर्किंग में तेजी लाने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है।
अगली पीढ़ी का सशक्तीकरण- किसानों, शिल्पकारों, आदि के बच्चों को व्यापक प्रौद्योगिकी प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। उत्तर कर्नाटक के देशपांडे फाउंडेशन ने हुबली-धारवाड़ क्षेत्र में किसानों और शिल्पकारों के बच्चों को प्रौद्योगिकी का उपयोग करना सिखाया है। वे बच्चे अब ऑनलाइन व्यवसाय के लिए प्रौद्योगिकी का उपयोग कर रहे हैं। इसे देश के पूरे ग्रामीण क्षेत्र में आसानी से लागू किया जा सकता है।
कुल मिलाकर भारत को एक नए सौदे की आवश्यकता है।
तकनीक-सक्षम 21 वीं सदी की तैयारी हमारे किसानों, ग्रामीण श्रमिकों, कारीगरों, प्रवासी श्रमिकों और अन्य लोगों को अपना भविष्य बनाने और सफलता के लिए प्रयास करने के लिए सशक्त करेगी। लंबे समय से हमारी विशाल आबादी सब्सिडी पर निर्भर है। यह उस चक्र से बाहर निकलने और राष्ट्र की वास्तविक क्षमता को खोलने का वक्त है तथा आत्मनिर्भर शब्द को उसके तार्किक निष्कर्ष पर ले जाने का वक्त है।