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एक राष्ट्र, एक कर, एक बाजार

Sat, 29 Apr 2017 10:22 AM IST
देवेंद्र सिंह असवाल
देवेंद्र सिंह असवाल Updated Sat, 29 Apr 2017 10:22 AM IST
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A nation, a tax, a market
देवेंद्र सिंह असवाल

कौटिल्य की अमूल्य रचना अर्थशास्त्र के अनुसार, कर ऐसा हो कि व्यापार और उद्यम पर अंकुश न लगे, वाणिज्य में सुगमता हो और कर दो बार न लगे। कौटिल्य ने चेतावनी दी थी कि यदि इन सिद्धांतों का पालन नहीं हुआ, तो व्यापारी दूसरे राज्यों में चले जाएंगे। वैश्वीकरण के युग में तो कौटिल्य की नसीहत और भी सार्थक है। भारतीय संविधान में व्यवस्था है कि पूरे देश में व्यापार और वाणिज्य अबाध हो और संसद इस संबंध में कानून बनाने के लिए सक्षम है। लेकिन संविधान में वैधानिक शक्तियों का वितरण ऐसा है कि अपनी वैधानिक परिधि में रहकर संसद और विधानसभाएं कर लगा सकती हैं। अतः वस्तुओं, उत्पादों और सेवाओं पर संसद और विधानसभाएं,हुईं दोनों अप्रत्यक्ष कर लगा रही हैं।

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फलस्वरूप उपभोक्ता कर पर कर (दोहरा कराधान) चुकाने को बाध्य होते हैं। इससे वस्तुएं और सेवाएं महंगी होती हैं, उद्यमियों और व्यापारियों को वित्तीय, प्रशासनिक और व्यापारिक अड़चनें उठानी पड़ती हैं, जिनका प्रतिकूल असर सरकार के राजस्व, उपभोक्ताओं और व्यापार पर पड़ता है, राष्ट्र में क्षेत्रीय और आर्थिक असंतुलन पैदा होते हैं और प्रतिस्पर्धा कम होती है। कर के ऊपर कर न हो या कम से कम हो, उपभोक्ता लाभान्वित हों और व्यापार बढ़े, इस दिशा में विश्वनाथ प्रताप सिंह ने वित्त मंत्री रहते हुए ऐतिहासिक कदम उठाया था। उन्होंने मॉडवैट कर लगाया तथा एक्साइज कानून में रिफंड की व्यवस्था की गई, ताकि एक्साइज उसी वस्तु पर दोबारा न लगे। उसके बाद भी कर व्यवस्था को सुधारने की निरंतर कोशिशें हुईं।
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वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने वर्तमान करों को हटाकर वस्तु एवं सेवा कर कानून (जीएसटी) का मॉडल तैयार करने के लिए राज्यों के वित्त मंत्रियों की सशक्त समिति (एम्पावर्ड कमेटी) बनाई। पश्चिम बंगाल के वित्त और एक्साइज मंत्री असीम दासगुप्त उस समिति के अध्यक्ष थे। यूपीए सरकार के वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने आर्थिक सुधार की इस मुहिम को आगे बढ़ाया। वर्ष 2006-07 के बजट में उन्होंने घोषणा कि जीएसटी कानून को एक अप्रैल, 2010 से लागू किया जाएगा। फिर राज्यों के वित्त मंत्रियों की एक समिति बनी और उस समिति ने जाने-माने अर्थशास्त्री केलकर की अध्यक्षता में एक संयुक्त कार्य बल बनाया। गहन चर्चा और विचार-विमर्श के बाद जीएसटी कानून का मसौदा तैयार हुआ, पर आर्थिक सुधार की यह बड़ी पहल राजनीतिक भंवर से बाहर न आ सकी।
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सोलहवीं लोकसभा में इस मुद्दे पर फिर मंथन हुआ। राज्यों की चिंताओं का समाधान यह निकाला गया कि जिन राज्यों को संभावित राजस्व हानि होगी, उन्हें केंद्र सरकार मुआवजा देगी। इससे राज्यों में सहमति बनी। विगत 29 मार्च को लोकसभा और पांच अप्रैल को राज्यसभा ने चार जीएसटी कानून पारित किए। एक कर का मतलब यह नहीं है कि आम जरूरत की वस्तुओं, सेवाओं और विलासिता की वस्तुओं पर टैक्स की एक ही दर होगी। वस्तुओं और सेवाओं की प्रकृति और उपभोक्ताओं को देखते हुए कर की भिन्न-भिन्न दरें शून्य, 5, 12,18 और 28 प्रतिशत है। विलासिता की वस्तुओं तथा स्वास्थ्य और वातावरण के लिए हानिकारक चीजों पर दर उससे भी अधिक है। केंद्रीय वित्त मंत्री, सारे राज्यों के वित्त मंत्री तथा राजनीतिक दल प्रशंसा के पात्र हैं कि उन्होंने अभूतपूर्व निर्णय लेकर राष्ट्र को एक कर सूत्र में बांधने की अनुकरणीय मिसाल पेश की।

जीएसटी लागू होने के बाद वस्तुओं और सेवाओं पर अलग-अलग लगने वाले सभी कर एक ही में समाहित हो जाएंगे। इससे पूरे देश में वस्तुओं और सेवाओं की कीमत लगभग एक हो जाएगी। उपभोक्ताओं के लिए सामान और सेवाएं सस्ती हो जाएंगी। जीएसटी कीमत पर जुड़ा हुआ एक कर वैट यानी मूल्य वर्धित कर है, जो वस्तुओं और सेवाओं, दोनों पर लगेगा। जबकि अभी वैट सिर्फ वस्तुओं पर लगता है। जीएसटी दो स्तरों पर लगेगा। एक केंद्रीय जीएसटी होगा, जबकि दूसरा राज्य का। कर की दरों की अनुशंसा जीएसटी परिषद करेगी तथा संसद और विधानसभाएं इसे पारित कर वैधानिक स्वरूप देंगी। इससे पूरा देश एकीकृत बाजार में तब्दील हो जाएगा और ज्यादातर अप्रत्यक्ष कर जीएसटी में समाहित हो जाएंगी। उद्यमियों और व्यापारियों को कई बार टैक्स देने से छुटकारा मिलेगा। इससे कर वसूली करते समय कर में हेराफेरी करने की आशंका कम हो जाएगी। इसके अलावा जहां कई राज्यों में राजस्व बढ़ेगा, वहीं कई जगह कीमतों में कमी भी होगी। टैक्स ढांचा पारदर्शी होने से टैक्स विवाद कम हो जाएंगे।


जीएसटी लागू होने के बाद राज्यों को मिलने वाला वैट, मनोरंजन कर, विलासिता कर, लॉटरी टैक्स, चुंगी आदि खत्म हो जाएंगे। फिलहाल सामान खरीदते हुए  उपभोक्ताओं को 30 से 35 प्रतिशत टैक्स के रूप में चुकाना पड़ता है, जिसके घटकर 20-25 प्रतिशत पर आ जाने की संभावना है। चूंकि कर उगाही का सारा काम तकनीक आधारित होगा, ऐसे में, कम विकसित राज्यों को अधिक राजस्व की प्राप्ति होगी, छोटे व्यवसायों को सहारा मिलेगा, वाणिज्य-व्यापार को प्रोत्साहन मिलेगा तथा करदाताओं की संख्या बढ़ेगी। इसका आयात और निर्यात पर भी अच्छा असर पड़ेगा। जीएसटी को कुछ विचारक नए संपन्न भारत की संरचना की शुरुआत मानते हैं, तो कुछ इसे एक शिशु कदम बताते हैं। पर संविधान का 101वां संशोधन पारित होना, जीएसटी परिषद का गठन होना और परिषद द्वारा पूरे देश में एक कर व्यवस्था पर सर्वसम्मति बनाना राष्ट्रीय राजनीति की एक ऐतिहासिक पहल है। आर्थिक मामलों पर यदि इसी तरह राष्ट्रव्यापी सहमति बनती रही, तो जीएसटी के कार्यान्वयन में आनेवाली हर अड़चन का समाधान होगा तथा रियल एस्टेट, नशीले पेय तथा पेट्रोलियम उत्पाद पर भी अंततोगत्वा राष्ट्रीय सहमति बनेगी, ताकि पूरे देश में एक वस्तु का एक ही दाम हो। इससे हमारे संविधान निर्माताओं का वह सपना भी साकार होगा कि पूरे देश में व्यापार और वाणिज्य अबाध रूप से हो।

-लोकसभा के पूर्व अपर सचिव तथा संविधान व संसदीय मामलों के विशेषज्ञ

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