2024 में भी संभावनाएं बेहतर नहीं, ताइवान के चुनाव परिणामों के बाद बहुत कुछ दांव पर
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
विस्तार
जहां तक वैश्विक दृष्टिकोण का सवाल है, यदि 2023 एक मुश्किल वर्ष था, तो 2024 में भी संभावनाएं बेहतर नहीं दिख रही हैं। जैसा कि हम साफ देख सकते हैं, ऐसा लगता है कि दुनिया कम सुरक्षित होगी, क्योंकि तनाव के कई और कारण सामने आने वाले हैं। भू-रणनीतिक नजरिये से उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती। यूक्रेन युद्ध में फिलहाल गतिरोध दिखाई दे रहा है, लेकिन यह 'महत्वपूर्ण मोड़' पर प्रतीत होता है। दो वर्षों के संघर्ष के बाद रूस और पश्चिम, दोनों थके हुए दिखाई देते हैं, जिससे इसके खत्म होने के कुछ संकेत दिखाई देते हैं। रणनीतिकारों को चिंता है कि एक या दूसरा पक्ष मामले को बढ़ाने का फैसला कर सकता है और युद्ध को अपने पक्ष में निपटाने के लिए और भी अधिक खतरनाक हथियारों का इस्तेमाल कर सकता है, जैसे अंतिम हथियार के रूप में परमाणु हथियारों का। इस बीच यूक्रेन के नेता लगातार भड़काऊ बयान दे रहे हैं, जिससे संघर्ष की आग और भड़क रही है।
उतनी ही खतरनाक स्थिति पश्चिम एशिया में है। इस्राइल-हमास संघर्ष एक बड़े संघर्ष में तब्दील हो रहा है, जिसमें परोक्ष रूप से एक तरफ इस्राइल, अमेरिका और पश्चिम है, तो दूसरी तरफ पूरा अरब जगत है। स्थिति बेहद विस्फोटक होती जा रही है, लेकिन इसका कोई सबूत नहीं है कि कोई भी पक्ष विवेकपूर्ण आवाजों को सुन रहा है या समाधान तलाशने की कोशिश कर रहा है। ज्यादा से ज्यादा देश खुलेआम इस्राइल पर नरसंहार का आरोप लगा रहे हैं, लेकिन इस्राइल के मौजूदा नेता पर इसका कोई असर नहीं हो रहा है। भारत जैसे देश, जिन्हें आम तौर पर मध्यस्थ की भूमिका निभानी चाहिए, खुद को हाशिये पर पाते हैं।
उपरोक्त दोनों क्षेत्रों के मुकाबले हिंद-प्रशांत क्षेत्र ज्यादा शांत लग सकता है, लेकिन ताइवान का मुद्दा जिस तरह बढ़ रहा है, उसमें इसके तीसरे विश्वयुद्ध में बदलने की बड़ी आशंका है। अब तक हालांकि चीन ने संयम दिखाया था, लेकिन ताइवान में कट्टर चीन विरोधी के चुनाव जीतने के बाद चीन न सिर्फ ज्यादा आक्रामक हुआ है, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए और भी आक्रामक हो सकता है कि ताइवान उसकी नाक के नीचे एक शत्रुतापूर्ण क्षेत्र न बन जाए। यह संघर्ष इतना बड़ा और जटिल है, जो विभिन्न देशों को चीन समर्थक या चीन विरोधी बनने के लिए मजबूर कर रहा है।
हालांकि एशिया के अधिकांश देश इस संघर्ष में नहीं पड़ना चाहेंगे। भारत भले ही चीन समर्थक या चीन-विरोधी रुख न अपनाना चाहे, लेकिन इस मामले में उसकी स्थिति बेहद असहज हो सकती है। लेकिन चीन को लगता है कि क्वाड का सदस्य होने, और चतुष्कोणीय सुरक्षा संवाद में शामिल होने के कारण भारत प्रबल चीन-विरोधी और अमेरिका समर्थक है। यह स्थिति पहले से ही भारत को अधिकांश अन्य एशियाई देशों, खासकर दक्षिण पूर्व व पूर्वी एशिया के देशों के साथ मुश्किल में डाल रही है, जिससे भारत निश्चित रूप से बचना चाहेगा।
ऐसे में जब अधिकांश देशों के लिए वैश्विक दृष्टिकोण उतना अच्छा नहीं दिखता है, तब भारत का भी बहुत कुछ दांव पर है, क्योंकि तटस्थता और गुटनिरपेक्षता की उसकी नीति सवालों के घेरे में है। कई देशों द्वारा गुटनिरपेक्षता को एक विफल सिद्धांत के रूप में देखा जाने लगा है, जो हाल के वर्षों में तेज आर्थिक प्रगति करने वाले भारत के लिए ठीक नहीं है। ऐसे में, विदेशी संबंधों के मामले में 2024 भारत के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
चीन भी इसी तरह की दुविधा में हो सकता है, क्योंकि उसकी सैन्य शक्ति बरकरार रहने के बावजूद चीनी अर्थव्यवस्था जिस कठिन दौर से गुजर रही है, वह एशियाई क्षेत्र में भी अमेरिकी नेतृत्व वाले गठबंधन को चुनौती देने की उसकी क्षमता को सीमित कर देती है। भारत के नजरिये से एक खतरा यह है कि ऐसी स्थिति में चीन भारत-चीन सीमा पर विवाद को फिर से बढ़ाने जैसी ध्यान भटकाने वाली रणनीति का सहारा ले सकता है, ताकि यह प्रदर्शित कर सके कि वह अब भी अपनी ताकत दिखा सकता है।
फिर भी भारत के लिए वर्ष 2024 में कुछ हिस्सों के लिए अच्छा हो सकता है। इस साल के अप्रैल-मई में लोकसभा चुनाव होने वाले हैं और मौजूदा सत्तारूढ़ पार्टी के लिए अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं, लेकिन चुनाव के बाद का परिदृश्य ज्यादा संतोषजनक नहीं हो सकता है। सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्ष के बीच दूरियां न केवल बढ़ रही हैं, बल्कि तीव्र आंतरिक कलह और अशांति की आशंकाएं भी पैदा हो रही हैं। इसके अलावा, हालांकि आतंकी हमलों जैसा बड़े पैमाने पर हिंसा का कोई खतरा नहीं दिखता है, लेकिन मणिपुर जैसे परिधीय इलाके अशांत बने हुए हैं। इससे पहले की इस धारणा की दोबारा पुनरावृत्ति हो सकती है कि दिल्ली और देश के सीमावर्ती इलाकों के बीच दूरी बनी हुई है और शायद अधिक व्यापक हो सकती है।
इसलिए स्थिति पर सावधानी से नजर रखनी होगी, क्योंकि माहौल अत्यधिक तनावपूर्ण है। सतही शांति मौजूद भावनाओं की तीव्रता को छिपा देती है। इसके अलावा भी कुछ पहलू हैं, जिन पर सावधानी पूर्वक विचार करने की जरूरत है। जैसे, इस तर्क के साथ कि अनुच्छेद 370 एक संक्रमणकालीन प्रावधान था, लिहाजा उक्त अनुच्छेद को निरस्त करने की राष्ट्रपति की शक्ति को बरकरार रखने वाले सर्वोच्च न्यायालय के हालिया फैसले से उत्पन्न स्थिति को कैसे नियंत्रित किया जाता है, यह देखना होगा, जिससे कि इसे देशव्यापी आंदोलन का एक आधार बनने से रोका जा सके।
इस तथ्य पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि सामाजिक समूहों को विभाजित करने के लिए सोशल इंजीनियरिंग और सामाजिक विखंडन का किस हद तक उपयोग किया जा रहा है; लेकिन आम चिंता के प्रमुख मुद्दों पर बहुत कम बहस हो रही है या कोई बहस नहीं हो रही। इसके अलावा, यह भी आशंका है कि इस बार के चुनाव में कुछ समूहों की ताकत और गतिशीलता बढ़ाकर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) चुनाव परिणामों को निर्धारित करने में एक बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।