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गांधीवादी पोशाक में एक दलित लेखक
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माता प्रसाद।
- फोटो : amar ujala
हाल ही में पूर्व राज्यपाल एवं वरिष्ठ साहित्यकार माता प्रसाद जी गुजर गए। वह अनुसूचित जाति की पृष्ठभूमि से आईएएस तक का सफर तय करने वाले शुरुआती लोगों में से तो थे ही, उत्तर प्रदेश के सचिव के तौर पर राज्य की नौकरशाही का नेतृत्व करने वाले अनुसूचित जाति के पहले व्यक्ति थे।
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राजनेता के रूप में उनका अतीत भले सरकारी दस्तावेजों में दब जाए, पर एक सहृदय लेखक के रूप में उनकी मौजूदगी न रहे, यह मुमकिन नहीं है। वह पांच बार विधायक रहने के अलावा दो बार विधान परिषद के भी सदस्य रहे तथा बहुत ही नम्र, गंभीर, सहज और अध्ययनशील प्राणी थे। माता प्रसाद की गांधीवादी पोशाक के भीतर एक दलित लेखक जी रहा था। एक प्राथमिक शिक्षक के जीवन से उठकर उन्होंने जब राजनीति में प्रवेश किया, तब कांग्रेस का दौर था। उनके आदर्श बाबू जगजीवन राम ने दलित समस्या पर हरिजन समस्या नाम से पुस्तक लिखी थी। खुद माता प्रसाद ने 1948 में हरिजन ग्राम्य गीत संग्रह प्रकाशित कराया था। पर 1982 के बाद जब कांशीराम की बहुजन राजनीति ने पांव पसारने आरंभ किए, 1991 के शताब्दी वर्ष में आंबेडकर रचनावली छपकर आने लगी, शोध कार्य होने लगे, मूकनायक और बहिष्कृत भारत के संपादकीय विचारों का फैलाव हुआ, दलित लेखन की सोद्देश्यता स्पष्ट होने लगी, तब माता प्रसाद ने भी अपने लेखन को गांधीवाद से आंबेडकरवाद की ओर मोड़ दिया।
राजभवन की विशेष सुविधाएं भोगने वाले माता प्रसाद पैदल चलकर, रिक्शे पर बैठकर साहित्यिक आयोजनों में पहुंचते थे। बिना किसी मानदेय की अपेक्षा किए वह वहां अपने मूल्यवान विचार व्यक्त किया करते थे, नए लेखन का संज्ञान लेते थे और उन्हें सम्मान- प्रोत्साहन भी देते थे। पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर ने 1998 में कबीर पर एक राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की थी। आयोजन के बाद हम निकले, तो माता प्रसाद जी ने इन पंक्तियों के लेखक से कहा, 'मेरा घर यहां पास ही मछली शहर में है। मैं चाहता हूं आप मेरे साथ मेरे घर चलें और आज रात रुकें।' उनका आग्रह टाला नहीं जा सका। अगले दिन उनकी आत्मकथा झोपड़ी से राजभवन का जिक्र करते हुए मैंने जब पूछा कि 'वह झोपड़ी कहां है', तो उन्होंने कहा, 'मेरी तो झोपड़ी भी नहीं है। यह घर मेरे पिता की ननिहाल है।' माता प्रसाद का परिवार चमड़ा कारीगर था।
आत्मकथा में उन्होंने अपनी पारिवारिक, सामाजिक गरीबी का जिक्र किया है। माता प्रसाद को जनाब रउफ जाफरी साहब ने अध्यापन छोड़कर हरिजन समाज कल्याण विभाग में ‘सोशल वर्कर’ बनने की सलाह दी थी, और यही रास्ता उन्हें बाबू जगजीवन राम की मार्फत कांग्रेसी राजनीति की ओर ले गया। ऐसा ही मोड़ डॉ. धर्मवीर के जीवन में भी आया था। माता प्रसाद की तरह डॉ. धर्मवीर भी बाबू जगजीवन राम के पास गए थे, पर टिकट के लिए नहीं, बल्कि यह कहने के लिए कि 'आप ऐसी कोई संस्था खड़ी कर दें, जिससे मेरी रोटी-रोजी चल जाए, तो मैं आईएएस की नौकरी छोड़ ताउम्र साहित्य सेवा करूं।'
माता प्रसाद जैसे शिखर व्यक्तित्व के साथ हमारे समाज ने किस तरह का व्यवहार किया, वह यहां वर्णित दो घटनाओं से समझ में आ जाएगा। पहली घटना का जिक्र डॉ. एन सिंह द्वारा तैयार किए गए माता प्रसाद के अभिनंदन ग्रंथ में है। बतौर विधायक वह एक बार अपने क्षेत्र के दौरे पर थे। एक गांव में उनका रात्रि विश्राम एक सवर्ण कार्यकर्ता के घर पर था। भोजन बने, तब तक वह जन संपर्क के लिए पास की दलित बस्ती में चले गए। एक परिवार के बच्चों, खासकर लड़कियों को, उन्होंने अध्ययन और साफ-सफाई के बारे में बताया। वहां उन्होंने एक युवक से पूछा कि तुम्हारा दूसरा भाई कहां है? उसने बताया कि आज हमारे गांव में कांग्रेस का एक बड़ा नेता आया है। वह नेता हमारी जाति का है। वह पंडित जी के घर खाना खाएगा, सो भाई नेता जी के खाने के लिए बर्तन पहुंचाने गया है! दूसरी घटना वर्ष 2000 के इंग्लैंड दौरे की है, जिसका गवाह इन पंक्तियों का लेखक भी था।
प्रवासी भारतीयों की एक संस्था ने बर्मिंघम में मायावती के व्याख्यान का आयोजन किया था। प्रतिनिधि बस में सवार होकर लंदन से बर्मिघम रवाना हुए। रास्ते में हमने शेक्सपियर का जन्म स्थान देखा। बर्मिंघम में मायावती बगैर पर्चे के ढाई घंटे तक बोलती रहीं। माता प्रसाद दर्शक दीर्घा की पहली पंक्ति में बैठे थे। भाषण में मायावती ने वीपी सिंह और रामविलास पासवान जैसे अपने राजनीतिक विरोधियों पर करारे कटाक्ष किए। चूंकि कांग्रेस के टिकट पर घोसी सीट से मायावती के खिलाफ चुनाव लड़ चुके माता प्रसाद कांग्रेसी वेशभूषा में सामने ही बैठे थे, लिहाजा मायावती ने उनकी ओर उंगली उठाते हुए बेहद आपत्तिजनक भाषा में उन्हें भी खरी-खोटी सुनाई। यही नहीं, भाषण के बाद रात्रि भोजन के दौरान सुरक्षा गार्डों से घिरी मायावती ने वहां मौजूद दलित लेखकों से बातचीत करने की इच्छा भी नहीं दिखाई।