नेताओं के रोने-धोने पर एक किताब
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साधो, जम्मू-कश्मीर में भाजपा के लिए सिर मुड़ाते ही ओले पड़ गए। मसर्रत वहां मुसीबत बनकर खोपड़ी पर आ चढ़े। हर कोई प्रह्लाद नहीं है, जो होलिका की गोद में बैठने पर भी जलने से बच जाए। मोदी के लिए उगलत निगलत पीर घनेरी है। शाह ने जिसे कबाब समझ कर खाया, वह उनके गले की हड्डी बन गया। अब अन्ना ने भी उनकी मुसीबत बढ़ा दी है। भूमि अधिग्रहण के किले को कैसे बचाया जाए। जेलें पहले से ही भरी हुई हैं, दूसरे गांधी उन्हें और भरेंगे। केजरीवाल इन दिनों बंगलूरू से अपनी खांसी का इलाज कराकर वापस दिल्ली लौट चुके हैं। पर मुसीबतें पीछा नहीं छोड़तीं। पहले शाजिया और किरण ने उनके गले की फांस बढ़ाई थी, अब योगेंद्र और प्रशांत ने उनके फेफड़ों में इंफेक्शन कर दिया है।
मुख्यमंत्री की कुर्सी का टोरेक्स कुछ काम नहीं आ रहा। राष्ट्रीय चिंता का विषय यह है कि बनारस की हार के बाद केजरीवाल रो पड़े थे। आशुतोष ने इस रुदन को किताब में दर्ज कर ऐतिहासिक बना दिया। जांच-पड़ताल जरूरी है कि केजरीवाल जीवन में कब-कब सिसके और जार-जार रोए थे। वैसे राष्ट्रीय नेताओं के रोने पर किताब लिखी जा सकती है। आडवाणी ने कब-कब रुदन किया, किस समय शाह की आंखों में आंसू झलके, मोदी की किन क्षणों में आंखें भर आईं, किरण बेदी दिल्ली के जुलूस में कैसे फफक पड़ीं, राज्यसभा में जया बच्चन के नयनों से कब पानी झरने लगा, आदि-आदि।
वैसे विपक्ष का सरकारों पर और सरकारों का विपक्ष के लिए रोना-पीटना लोकतंत्र का स्थायी भाव है। साध्वियों को तीन खानों के नाम पर सियापा करने का मौका इन दिनों भाजपाई लोकतंत्र खूब मुहैया करा रहा है। अब तो चार बच्चे पैदा करो और खालिस हिंदू कहलाओ या देशद्रोही पाकिस्तान चले जाएं, जैसे जुमलों ने पुराने रोने-सियापा करने को बहुत पीछे छोड़ दिया है। भाजपाई पूरे बहुमत के साथ पहली बार सत्ता में पहुंचे हैं, सो इन दिनों नए मुल्ला की तरह प्याज ज्यादा खा रहे हैं। हाजमा दुरुस्त रखने का यह नुस्खा कहीं उल्टा न पड़ जाए। आमीन!