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टंकार मारकर परखा गुरु को

Mon, 03 Sep 2012 12:00 PM IST
Yashwant Vyas
Yashwant Vyas Updated Mon, 03 Sep 2012 12:00 PM IST
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धर्मग्रंथों में यह सीख दी जाती है कि किसी भी व्यक्ति को खुद से छोटा नहीं समझना चाहिए, बल्कि उसे भी ईश्वर का रूप मानकर सम्मान करना चाहिए। इसी से जुड़ा एक प्रसंग संत दादू जी का है, जिनकी साधना तथा त्याग-तपस्या की ख्याति सुनकर दो भक्तों ने उनसे दीक्षा लेने का निर्णय लिया। दोनों दादू जी के गांव की ओर चल पड़े। गांव से बाहर ही उन्हें एक व्यक्ति नदी में स्नान करने के बाद गांव की ओर जाता दिखाई दिया। उसका सिर घुटा हुआ था। दोनों ने गंजे सिर वाले उस व्यक्ति को रास्ते में देखा, तो अपशकुन मानकर उसके सिर पर टोहका लगा दिया। टोहका लगाने के बाद उससे पूछा, दादू जी महाराज की कुटिया कहां है? उसने संकेत से बताया, सामने है।
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दोनों कुटिया पर पहुंचे। कुछ ही देर बाद दादू जी आए, तो दोनों ने देखा कि दादू जी तो वही हैं, जिनके घुटे सिर पर उन दोनों ने टोहका लगाया था। इसके बावजूद दादू जी को तनिक भी क्रोध नहीं आया था। दोनों दादू जी के चरणों में गिर पड़े तथा सिर पर टोहका लगाने के लिए क्षमा मांगने लगे।
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दादू जी ने कहा, भइया कोई व्यक्ति मिट्टी का घड़ा भी खरीदता है, तो उसमें टंकार मार कर देख लेता है कि कहीं फूटा हुआ तो नहीं है। तुम गुरु बनाने आए थे, अतः तुमने मेरे सिर पर टंकार मारकर परखा कि कहीं मैं क्रोधाग्नि से अपवित्र तो नहीं हूं। दोनों दादू जी के वचन सुनकर हतप्रभ रह गए।
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