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पूत के पांव और सौ दिन सरकार के

Tue, 02 Sep 2014 07:49 PM IST
योगेन्द्र यादव
योगेन्द्र यादव Updated Tue, 02 Sep 2014 07:49 PM IST
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100 days of modi government

पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं वाली कहावत सुनकर मैं अक्सर सोचता हूं कि पालने में नामुराद पांव ही क्यों देखे जाते हैं? शायद, इसलिए कि पांव देखने से भान होता है कि आगे पूत के पांव किस ओर जाएंगे, कहां रुकेंगे-टिकेंगे और कहां फिसलेंगे। चूंकि नई सरकार और उसके मुखिया ने अभी बस सौ दिन पूरे किए हैं, सो उनके बारे में कुछ कहना पूत के पांव देखने जैसा ही मामला है। तो भी कहावत की पूंछ पकड़कर यह तो कहा ही जा सकता है कि लक्षण शुभ नहीं दिखते।

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बेशक कामकाज के मामले में सन्निपात की शिकार यूपीए-2 की तुलना में प्रधानमंत्री के कदम सधे हुए हैं। मगर असल सवाल दिशाबोध का है। न जाने क्यों सरकार विदेश नीति के मोर्चे पर तेजी से कदम बढ़ा रही है। कुछ कदम सराहनीय हैं। शपथ-ग्रहण समारोह में दक्षेस देशों के नेताओं को न्योता गया, नेपाल के प्रति धौंसपट्टी का अंदाज नरम पड़ा और विश्व व्यापार संगठन में विकसित देशों की बदमाशियों के आगे तनकर खड़े होने की इच्छाशक्ति के दर्शन हुए। पर इसी सरकार ने फलस्तीन के मामले में ढुलमुल रवैया अपनाया। ब्रिक्स को लेकर उसके मन में ऊहापोह है, तो पाकिस्तान के लिए कभी हां, तो कभी ना की स्थिति। यानी विदेश नीति के मोर्चे पर मोदी सरकार के कदम-ताल गायब लगते हैं।
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हरेक की झोली भरने के वायदे से बनी नई सरकार से आर्थिक मोर्चे पर ढेरों उम्मीदें लगाई गई हैं। इस मोर्चे पर मोदी सरकार के पांव अभी से फिसल रहे हैं। रक्षा-मामले, रेलवे और बीमा-क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को नकारने की अपनी टेक से भाजपा ने सरकार बनने के बाद मुंह मोड़ लिया। मोदी जी ने महंगाई रोकने और सबको रोजगार देने का वायदा किया था। आम आदमी के इन सरोकारों की अनदेखी मोदी सरकार के इकबाल के लिए ठीक नहीं। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि उसकी सरकार स्वामीनाथन आयोग के सुझावों पर चलते हुए न्यूनतम समर्थन मूल्य में इजाफा करेगी। स्वामीनाथन आयोग में कृषि-लागत के ऊपर 50 प्रतिशत और जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य तय करने की बात कही गई है, लेकिन भाजपा अपने इस वायदे से पीछे हट चुकी है। भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास विधेयक को कमजोर करने की तैयारियों को देखते हुए नहीं लगता कि नई सरकार के पांव किसानों के हित में उठने वाले हैं।
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सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने और केन-बेतवा नदी लिंक परियोजना को हरी झंडी देने में जो जल्दबाजी दिखाई गई, उससे संकेत मिलते हैं कि पर्यावरण सुरक्षा के लिए किए गए उपायों को धता बताना जारी ही नहीं रहेगा, बल्कि और तेज होगा। इसी तरह, शिक्षा के मोर्चे पर ऐसा नहीं लगता कि सरकार को इस क्षेत्र की भारी-भरकम चुनौतियों का भान भी है। शिक्षा के अधिकार कानून के लागू होने के बाद जरूरत शिक्षा की गुणवत्ता की है। शिक्षा की गुणवत्ता बहाल करने का तरीका यह तो नहीं हो सकता कि बच्चों को प्रधानमंत्री का भाषण सुनाया जाए। इसी तरह बिना नाक-नक्शा बनाए उच्च शिक्षा के क्षेत्र में खुरपेंच करने से स्थिति ज्यादा बिगड़ती है। आधिकारिक तौर पर सरकार ने पाठ्यक्रम को बदलने की घोषणा नहीं की है, फिर भी खबर उड़ रही है कि स्कूली पाठ्यक्रम की रचनात्मकता और नवाचार के पर कतरे जाएंगे।

नई सरकार के बारे में शुरुआती तौर पर सबसे बड़ी आशंका थी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति उसका रुख क्या होगा। प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ भी नहीं कहा, जिससे इस आशंका को खाद-पानी मिले। मगर यहां असल मुश्किल तो स्वयं प्रधानमंत्री की छवि से जुड़ी अल्पसंख्यकों को असहज करने वाली यादें हैं। उन यादों के कायम रहते प्रधानमंत्री का इफ्तार पार्टी न देना, सांप्रदायिक सद्भाव कायम रखने की उनकी सिखावन से कहीं ज्यादा बड़ा अर्थ हासिल कर लेता है। जिन राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं, वहां बढ़ते सांप्रदायिक तनाव को देखकर लगता है कि राज्यसत्ता ने इस तनाव को रोकने से अपने हाथ खींच रखे हैं।

मोदी जी के लिए बड़ी परीक्षा गवर्नेंस के मोर्चे पर होनी है। भ्रष्टाचार और नकारेपन से वैधता खो चुकी यूपीए-2 की तुलना में मोदी सरकार का आगाज अच्छा होना ही था। ऐसे में प्रधानमंत्री जब कहते हैं कि कर्मचारियों-अधिकारियों को काम पर हर हाल में आना होगा और वे चौदह घंटे काम करेंगे, तो मैं पंद्रह घंटे काम करूंगा जैसी उनकी बातें निश्चित ही ताली बटोरेंगी। लेकिन मुश्किल तब खड़ी होगी, जब लोग पूछेंगे कि आपके काम का नतीजा क्या निकला? नई सरकार ने काले धन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट आदेशित एसआईटी को जरूर हरी झंडी दी, लेकिन सौ दिन के भीतर कालाधन वापस लाने की डींग को निभाने के नाम पर उसके हाथ-पांव हिलने अभी बाकी हैं। जिस तरह एम्स के ईमानदार अधिकारी संजीव चतुर्वेदी को हटाया गया, उसे देखते हुए गवर्नेंस के मार्चे पर सरकार का चाल-चलन संदेहास्पद प्रतीत होता है।

आशंकाओं को निर्मूल करने के लिए गलतियों से सीखना और स्वयं को बदलना जरूरी है। लेकिन मजबूत नेता के तर्क ने नई सरकार को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया है, जहां प्रधानमंत्री ही पार्टी सुप्रीमो हैं और प्रधानमंत्री ही सत्ताधारी पार्टी की नैया के मुख्य खेवनहार भी। ऐसे में जब टोकने वाला कोई बचा ही नहीं, तो सीखने और बदलने की बात ही बेमानी हो जाती है।


सत्ताधारी पार्टी के लक्षण शुभ नहीं दिखते, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि विपक्ष की उम्मीदों को पंख लग गए हैं। सौ दिनों में हमने सरकार और उसके तेवर तो देखे, लेकिन विपक्ष कहीं नहीं दिखा। लिहाजा आने वाला वक्त एक सच्चा, सिद्धांतनिष्ठ और वैकल्पिक विपक्ष का खुद को गढ़ने और दिखाने का अवसर हो सकता है।

(लेखक आम आदमी पार्टी की कार्यकारिणी और राजनीतिक मामलों की राष्ट्रीय समिति के सदस्य हैं)

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