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क्या सही रास्ते पर है हमारी संसदीय प्रणाली?

Wed, 25 May 2016 09:22 PM IST
राहुल सांकृत्यायन/अमर उजाला,नई दिल्ली
राहुल सांकृत्यायन/अमर उजाला,नई दिल्ली Updated Wed, 25 May 2016 09:22 PM IST
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 is our parliamentary system is on the right track
- फोटो : PTI
हम हर चुनाव में वोट देते हैं, बहुत सारी उम्मीदों के साथ। न जाने कितनी उम्मीदें पूरी होती हैं, न जाने कितनी उम्मीदें फाइलों में दफ्न ही रह जाती हैं। हमारे देश की एक संसद है जिसे कई माननीय लोकतंत्र का मंदिर तक कहते हैं। वो ऐसा क्यों कहते हैं इसके पीछे का कारण वो स्वयं जानते होंगे लेकिन बीते कई दशकों में इस मंदिर के हालात इतने बदल चुके हैं कि शायद ही कोई धार्मिक भावनाओं वाला व्यक्ति संसद की तुलना मंदिर से करेगा।
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मैं जब 9वीं, दसवीं में पॉलिटिकल साइंस की बुक पढ़ता था तो उसमें हमें यह बताया जाता था कि कोई भी विधेयक पारित होने से पहले या पारित होने के बाद उस पर चर्चा की जाती है। यदि चर्चा में कोई ऐसी बात निकल कर सामने आई जो विधेयक में नहीं है तो उसे संशोधित कर विधेयक की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को नया आयाम दिया जाता था। हो सकता है कि ये सारी बातें आज भी पढ़ाई जाती हों और छात्र परीक्षा पास करने के लिए उसे रट कर लिख भी आते हों लेकिन यह सोचने वाली बात है कि क्या वाकई में अब ऐसा कुछ होता है? बीते संसदीय सत्र में राज्यसभा कुल 69 घंटे चली और मात्र 12 बिल पास किए जा सके। लोकसभा ने हालांकि इस बार कीर्तमान स्थापित किया और 13 बैठकों में एक बार भी स्थगित नहीं हुई। ये सदन 92 घंटे 21 मिनट चला।
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हालात ये हो चले हैं कि सदन में बवाल के चलते कई विधेयकों को सूची में ही स्थान ही नहीं मिल पाता तो वो पास कहां से हों? इस बार गुड्स एंड सर्विस टैक्स बिल के साथ तो यही हुआ। समय के इस द्रोह में लोकसभा सरकार बनाने की जगह बन चुकी है। राज्यसभा जिसे उच्च सदन कहा जाता है वो अब हारे हुए नेताओं और दलबदलुओं को उपहार देने का रास्ता बना हुआ है। संभवतः संसद के बारे में ऐसी बात कहना अवमानना हो सकती है लेकिन यह हकीकत है जिससे कोई इंकार नहीं कर सकता।
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आप खुद बताएं जिस मुल्क में 1970 के बाद से अब तक सांसदों का एक भी प्राइवेट बिल पास नहीं हुआ हो वो लोकतंत्र किस राह पर जा रहा है। 99 प्रतिशत विधेयक बिना चर्चा और संशोधन के पास हो जाते हैं। आश्चर्य तो तब होता है जब सत्ता बदलने के बाद कोई विधेयक पुरानी सरकार में अटका हो और सत्ता पक्ष के विपक्ष में बैठने के बाद उन्हें उसी विधेयक में खराबी नजर आने लगती हो तो क्या ऐसे लोकतंत्र और उसकी प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाना सही नहीं है? 


सदन और उसमें मौजूद हमारे जन प्रतिनिधि इस बात पर बहस तो नहीं करते कि कोई विधेयक ऐसे क्यों पास हो जा रहा है लेकिन वो इस बात पर अपनी राय या यूं कहें कि चेतावनी जरूर देते हैं कि न्यायपालिका अपनी लक्ष्मण रेखा न पार करे। सदन देश के आईने का वो अक्श होता है जिसमें हर कोई खुद को देखता है। हारे हुए लोगों का ठिकाना बन चुकी हमारी राज्यसभा अब तो विधेयक न पास कराने के लिए एक सस्ता हथियार बन चुकी है।

बात केवल संसद की ही क्यों करें? देश के 29 राज्यों में जहां कहीं भी विधानसभा के साथ-साथ विधानपरिषद का अस्तित्व है वहां भी यही हाल है। हमारे माननीय कहते हैं कि हम ब्रिटेन आधारित संसदीय प्रणाली का अनुसरण कर रहे हैं। ठीक है, अनुसरण में कोई बुराई नहीं है। एक बेहतर लोकतंत्र में हर उस अच्छे काम का अनुसरण होना चाहिए जिससे देश और वहां की जनता को लाभ हो सके। एक उदाहरण लेते हैं कि ब्रिटेन में तीन दल हैं लेबर पार्टी, कंजर्वेटिव पार्टी और उदार प्रजातंत्रवादी। दलों के विचार और काम करने की शैली अलग है लेकिन तीनों में एक अच्छाई है और वो ये कि सदन में अगर तीनों में से किसी का भी मेंबर बोल रहा है तो उसे ध्यान से सुना जाता है और फिर उस पर टीका टिप्पणी की जाती है। मेरी नजर में यह भारत में भी होना चाहिए क्योंकि हमें तो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र होने का गौरव प्राप्त है। आखिर यहां हम ब्रिटेन की संसदीय प्रणाली का अनुसरण क्यों नहीं करते? क्या यह अच्छी बात नहीं है? हमारे यहां तो विशिष्ट ज्ञान और अनुभव के आधार पर राज्यसभा सांसद मनोनीत किए जाते हैं और फिर सदन में अपनी निजी राजनीतिक खुन्नस निकालते हैं। क्या मतलब है इसका? क्या यही लोकतंत्र है?

बीते दिनों फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ रहा था जिसमें राज्यसभा की खाली हो रही सीटों पर चुनाव की चर्चा की गई थी और लिखा गया था कि किसी बाहरी व्यक्ति को लाकर वहां का राज्यसभा सांसद क्यों बनाया जाए? सवाल वाजिब है। ऐसा क्यों होता है? हम तो सुनते थे कि लोकतंत्र में जनता माई बाप होती है। जब माई बाप ने ही बेटे को घर से खदेड़ दिया तो फिर आप पड़ोसी हो कर भी बेटे को उसके घर में वापस भेजने वाले कौन होते हैं? मेरे हिसाब से राज्यसभा या राज्यों में उच्चसदन का गठन इसलिए तो नहीं ही किया गया था कि ये हारे हुए नेताओं का सहारा बन जाए?


कुल मिलाकर हमें यह सोचने पर आज नहीं तो कल मजबूर होना ही पड़ेगा कि क्या भारतीय लोकतंत्र और उसकी संसदीय प्रणाली अपने सही रास्ते पर है? अगर नहीं है तो क्यों नहीं है? इसे सही करने का तरीका क्या है? सवाल केवल राज्यसभा और विधानपरिषदों पर ही नहीं वरन लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं पर भी है।
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