फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Hardness for wishfull defaulter

सख्ती बरतेंगे, तभी वसूल पाएंगे कर्ज

Tue, 03 May 2016 08:18 PM IST
अश्विनी महाजन
अश्विनी महाजन Updated Tue, 03 May 2016 08:18 PM IST
विज्ञापन
Hardness for wishfull defaulter
अश्विनी महाजन

पिछले कुछ समय से बैंकों के एनपीए यानी नॉन परफार्मिंग एसेट्स की लगातार बढ़ती मात्रा ने बैंकों की ही नहीं, सरकार की भी नींद उड़ा रखी है। ऐसी आशंका है कि यदि इस समस्या का सही निदान नहीं निकला, तो देश के बैंकों की आर्थिक स्थिति डगमगा ही सकती है। आज बैंक एनपीए की समस्या के चलते नए ऋण देने में भी संकोच कर रहे हैं और अपने सरप्लस को वे सरकारी बॉन्डों में लगाकर ही संतुष्ट हैं। यही वजह है कि पिछले कुछ समय से सरकार, न्यायालय और प्रवर्तन एजेंसियां सख्ती दिखा रही हैं।

विज्ञापन


जब किसी कर्ज की वापसी एक निश्चित समय (सामान्यतः तीन महीने) तक बाधित रहती है, तो उन्हें एनपीए (गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों) की श्रेणी में डाल दिया जाता है। लेकिन कई बार ऐसे कर्जों को पुनर्व्यवस्थित (रिस्ट्रक्चर) करके अदायगी आगे टाल दी जाती है। एनपीए ऋण और रिस्ट्रक्चर ऋण वास्तव में ऐसे कर्ज हैं, जिन्हें दबावग्रस्त कर्ज कहा जाता है। ताजा आंकड़ों के अनुसार आज बैंकों के 2.67 लाख करोड़ के कुल ऋण इसी श्रेणी में आते हैं और इनमें लगातार इजाफा हो रहा है। गौरतलब है कि मार्च, 2015 में सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंकों के 11.1 प्रतिशत कर्ज दबावग्रस्त थे, जो सितंबर 2015 तक 11.3 प्रतिशत हो गए। कहा जा रहा है कि यदि स्थितियों में सुधार नहीं हुआ, तो एक लाख 14 हजार करोड़ रुपये के ऋण डूब जाएंगे।
विज्ञापन


दबावग्रस्त कर्ज सामान्यतः दो तरह के होते हैं। एक वे, जिन्हें जान-बूझकर नहीं चुकाया जाता। ऐसे कर्जधारक को विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है। दूसरे वे ऋण हैं, जिनकी अदायगी अर्थव्यवस्था में सुस्ती के माहौल के कारण नहीं हो पाती। दुनिया भर में मंदी के चलते धातुओं की कीमतें लगातार गिरी हैं, जिसके कारण उन उद्योगों को नुकसान हो रहा है। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर उनके ऋणों की अदायगी में अनिश्चितता आ गई है। हमारे पास ऐसे उदाहरण भी हैं, जहां डिफॉल्टरों के साथ सख्ती की गई है। लेकिन विजय माल्या से पैसा वसूलना बाकी है। विदेश भागे विजय माल्या का पासपोर्ट रद्द करके उनकी परिसंपत्तियों का हिसाब-किताब लगाना शुरू हो गया है।
विज्ञापन
विज्ञापन


बैंकों की बढ़ती मुश्किलों के मद्देनजर 2016-17 के बजट में सरकार ने 25,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है, जिस बैंक पुनर्वित्तीयकरण कोष का नाम दिया गया है। सरकार ने कहा है कि बैंक अपने कर्जों को वसूलने के काम को पहले अंजाम दें, तभी वे इस कोष से पैसा पाने के अधिकारी होंगे।

बड़ी संख्या में ऐसे ‘विलफुल डिफॉल्टर’ हैं, जिनके पास पर्याप्त संसाधन हैं, पर वे कर्ज अदा नहीं करते हैं। ऐसे लोगों के नाम प्रकाशित किए जाने चाहिए या उसका डर दिखाया जाना चाहिए। संभव है कि तब वे अपनी संपत्ति बेचकर ऋण चुकाएं। सरकार द्वारा खुद को दिवालिया घोषित करने वालों के खिलाफ नया विधेयक लाया जा रहा है, जिसे संसदीय समिति की हरी झंडी भी मिल गई है। माना जा रहा है कि नया कानून बनने के बाद कर्जदारों के दिवालिया होने पर विदेश में उनकी परिसंपत्तियों को भी नीलाम किया जा सकेगा।


देश की अर्थव्यवस्था को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए सख्त कदम उठाने ही होंगे। जरूरी है कि ‘विलफुल डिफॉल्टरों’ के नाम घोषित हों और सख्ती से उनसे कर्ज वसूला जाए।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed