सरकार और प्रशासन ही इनके दुश्मन हैं
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बीते सप्ताह मुंबई की मरीन ड्राइव में मैं शाम को घूम रही थी कि अचानक हल्ला-सा मच गया और कुछ बच्चे इधर-उधर भागते दिखे। नंगे पांवों और फटे कपड़ों में वे छोटे-छोटे बच्चे थे, जो अपने हाथों में रखे प्लास्टिक के सस्ते खिलौने छिपाने में लगे हुए थे। मैंने जब उनसे पूछा कि माजरा क्या है, तो उन्होंने एक बड़ी गाड़ी की तरफ इशारा करते हुए कहा कि 'मंचिपालिटी' (म्यूनिसिपैलिटी) के अधिकारी उनके खिलौने जब्त करने आए हैं। इतने में एक आदमी मेरे सामने आकर खड़ा हो गया। बच्चों की आंखों में डर देखकर मैं समझ गई कि उनके खिलौने छीनने वाला आदमी यही है। मैंने जब उससे पूछा कि वह गरीब बच्चों के खिलौने क्यों जब्त कर रहा है, तो उसने अकड़कर कहा, इन्हें स्कूल में होना चाहिए, धंधा नहीं करना चाहिए। कहां हैं इनके मां-बाप?
मैंने उस आला अधिकारी को समझाने की बहुत कोशिश की कि ये बच्चे दिन में स्कूल जाते हैं, लेकिन गरीबी के कारण शाम को थोड़ा-बहुत पैसा कमाने को मजबूर हैं। मेरी यह बात उस अधिकारी को अच्छी नहीं लगी, सो उसने तुरंत पुलिस को फोन किया। कुछ ही मिनटों में वहां एक वर्दीवाला आ पहुंचा। मैंने बड़ी मुश्किल से उन बच्चों को गिरफ्तार होने से बचाया, क्योंकि मैं उस जेल से परिचित हूं, जिसे मुंबई के बड़े सरकारी अधिकारी चिल्ड्रेन होम कहते हैं। डोंगरी स्थित बच्चों के इस जेल का इतना बुरा हाल है कि बच्चे मुंबई की सड़कों पर ज्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। ऊपर से समस्या यह भी है कि एक बार बंद होने के बाद उन्हें रिहा करना कठिन है और महंगा भी।
जिस देश में बच्चों के साथ ऐसा दुर्व्यवहार होता है, क्या उस देश को सभ्य कहलाने का हक है? इन बच्चों की सहायता के उद्देश्य से मैं पिछले कई वर्षों से नाश्ता नाम की एक संस्था चला रही हूं। इस संस्था के जरिये मैं इन बच्चों के मां-बाप से भी परिचित हो गई हूं। फुटपाथों पर इनकी बेहाल बस्तियां होती हैं और ये लोग दिहाड़ी में छोटे-मोटे काम करके किसी तरह अपना गुजारा करते हैं। ये लोग कभी अपना भी एक घर होने का सपना देखते हैं। सो, 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने परिवर्तन लाने के वायदे किए, तो लगा कि इनके जीवन में भी बदलाव आएगा। इस उम्मीद से इन्होंने भाजपा को वोट दिया।
महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद इन्होंने समुद्र किनारे बंजर जमीन पर अपनी झुग्गियां बनाईं, क्योंकि नई सरकार ने गरीबों को आवास दिलवाने के नए वायदे किए। लेकिन कुछ ही महीनों में नगरपालिका के अधिकारी पुलिस लेकर पहुंच गए और उनको यह कहकर उजाड़ दिया कि अपने गांव वापस चले जाओ।
समस्या यह है कि इनका गांव मुंबई है, सो वे वापस आ बसे हैं उन फुटपाथों पर, जहां उनकी सारी जिंदगी बीती है। पर अब ये लोग अच्छी तरह समझ गए हैं कि जिस परिवर्तन की उम्मीद कर इन्होंने मोदी को वोट दिया था, वह परिवर्तन अभी नहीं आने वाला। मरीन ड्राइव के आसपास ये लोग बड़ी-बड़ी इमारतों के साये में रहते हैं। सो इनकी कोशिश होती है कि रोज शाम को मरीन ड्राइव पहुंचकर शहर के अमीर लोगों को कुछ बेचकर अपना गुजारा चलाया जाए। भुट्टे सेंकते और नमकीन बेचते हुए भी जब कई बार इनका गुजारा नहीं चलता, तो ये अपने बच्चों से मदद लेते हैं। लेकिन इस पर भी नगरपालिका को ऐतराज है। जब तक इस पुरानी परंपरा में परिवर्तन के आसार नहीं दिखते, तब तक इस देश के गरीब, लाचार लोगों के लिए सरकार और प्रशासन ही उसके सबसे बड़े दुश्मन बने रहेंगे।