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आग से सिर्फ जंगल ही नहीं जलते

Thu, 26 May 2016 07:27 PM IST
त्रेपन सिंह चौहान
त्रेपन सिंह चौहान Updated Thu, 26 May 2016 07:27 PM IST
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fire in Uttarakhand forests
त्रेपन सिंह चौहान

उत्तराखंड के जंगलों में दोबारा लगी आग भले ही अब बारिश के कारण बुझने लगी है, लेकिन चीड़ के पेड़ हर एक महीने के भीतर इतने पिरूल बिखेर देते हंै कि आग का खतरा यथावत बना रहता है। इससे पहले भी जंगल में लगी भीषण आग अंततः वर्षा के कारण ही बुझ पाई थी। तब केंद्र तथा राज्य सरकार ने आग बुझाने के जो उपक्रम इस्तेमाल किए थे, वे नाकाफी थे। सवाल यह है कि अगर आगे जंगलों में फिर आग भड़कती है, तो क्या सरकारें अपने बूते पर आग बुझा पाएंगी।

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जंगल की आग का मुख्य कारण चीड़ के वनों को माना जाता है। हाल के दशकों में चीड़ के वनों में भी एक अजीब बदलाव देखने को मिल रहा है। चीड़ के पेड़ मुख्यतः 1,500 से 4,000 फीट की ऊंचाई तक पाए जाते रहे हैं। पर अब इसका विस्तार कई जगाहों पर 7,000 फीट से अधिक ऊंचाई तक हो गया है। पिछले दिनों मध्य हिमालय के कुछ उच्च शिखरों तक आग का पहली बार पहुंचना गंभीर चुनौतियों के साथ कई सवाल खड़े करता है।
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वन विभाग कहता है कि गांव के लोग हरी घास के लिए जंगल में आग लगा देते हैं। दूसरा कारण विभाग बताता है कि जंगल के पास के खेतों में जो खर-पतवार निकल आता है, ग्रामीणों द्वारा उसे जलाते वक्त आग जंगल में फैल जाती है। पर ग्रामीणों के लालच और लापरवाही से औसत 500 हेक्टेयर ही प्रभावित होता है। बाकी आग लगने की आम धारणा यह है कि विभाग के बेईमान कर्मचारी और अधिकारी लकड़ी और लीसा माफियाओं के साथ मिलकर जंगल में हर साल आग लगा देते हैं। इससे लीसा भी मिलता है, और लकड़ियां भी प्राप्त हो जाती हैं।
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पर आग की इन भीषण घटनाओं को रोकने के लिए स्थानीय लोग अब आगे क्यों नहीं आते? वन विभाग तो मुनाफे के लिए वनों को पाल रहा है, पर स्थानीय समाज के लिए तो वन जीवन रेखा हैं। दरअसल राज्य बनने के बाद सरकार ने सबसे पहली चोट यहां के वन पंचायतों की स्वायत्तता को पहुंचाई है। इससे जंगलों में वन और राजस्व विभाग का हस्तक्षेप बढ़ा। लोगों के दैनिक उपयोग में आने वाली वनोपज पर भी वन विभाग परेशानी खड़ी कर रहा है। इससे जंगल के प्रति लोगों की उदासीनता बढ़ती गई। पहाड़ों के लोकगीतों और लोककथाओं में वन विभाग एक खलनायक के रूप में आज भी मौजूद है।

चीड़ के वनों का विभाग के लिए व्यावसायिक इस्तेमाल ज्यादा रहा है। इसलिए पर्वतीय समाज ने उसे कभी अपना नहीं माना। राज्य बनने के बाद जितनी सरकारें अस्तित्व में आईं, सबने गांवों की घनघोर उपेक्षा की है। जंगल के नजदीक की खेती जहां जंगली जानवरों ने नष्ट कर दी है, वहीं बंदरों का आतंक इतना बढ़ गया हैं कि वे गांवों में घुसकर फसलों और फलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। वन विभाग जानवरों के खिलाफ उतनी कार्रवाई नहीं करता।


आग जंगल के साथ-साथ पूरी पारिस्थितिकी पर तो असर डालती ही है, इसके कई दूसरे नतीजे भी देखने को मिलते हैं। जंगल की आग जहां मिट्टी को भुरभुरी कर कमजोर कर देती हैं, वहीं पत्थरों और मलबों को थामे रहने वाली जड़ें जब जल जाती हैं, तो मामूली वर्षा भी बड़े भूस्खलन का कारण बन जाती है। हाल ही में चमोली जिले के दिवाल और थराली में ऐसा देखने को मिला। सरकारें अगर सच में वनों के प्रति संवेदनशील हैं, तो वन विभाग की भूमिका कम कर वनों के संरक्षण, संवर्द्धन और व्यावसायिक उपयोग की जिम्मेदारी ग्रामसभा को देनी चाहिए। तभी जंगल बचे रह सकते हैं।

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