असम की भावी राजनीति का गणित
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असम में विधानसभा के मतदान संपन्न हो चुके हैं और अब नतीजे के इंतजार के साथ भावी सरकार के गठन की संभावनाओं पर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। अभी कोई निश्चित रूप से यह कहने की स्थिति में नहीं है कि असम में किसकी सरकार बनेगी, किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलेगा या त्रिशंकु विधानसभा होगी। अगर सत्ता-विरोधी रुझान के कारण कांग्रेस स्पष्ट बहुमत पाने में विफल रहती है, तो ऐसी संभावना भी नहीं दिखती कि भाजपा अपने दो क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल कर पाएगी। इसकी वजह यह है कि असम में 36 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं, जिनमें से ज्यादातर बांग्लादेशी मूल के हैं। इन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन को शायद ही वोट दिया हो। मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में बेशक कांग्रेस और एआईयूडीएफ के बीच कांटे की टक्कर थी। पर कांग्रेस और एआईयूडीएफ की लड़ाई में भाजपा को लाभ होने की संभावना नहीं है।
राजनीति चूंकि संभावनाओं की कला है, ऐसे में सरकार गठन की तमाम संभावनाओं के बीच एक समीकरण यह भी है कि चुनाव पूर्व भाजपा के नेतृत्व में बना गठबंधन पहले तो निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल करना चाहेगा। फिर भी आवश्यक संख्या बल हासिल करने में वह नाकाम रहता है, तो संभवतः जम्मू-कश्मीर की तर्ज पर अपने धुर विरोधी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के साथ चुनाव बाद गठजोड़ कर सरकार बनाने की कोशिश करे।
भाजपा के एक शीर्ष नेता नाम उजागर न करने की शर्त पर बताते हैं कि सबसे पहले तो हम निर्दलीय विधायकों का समर्थन हासिल करना चाहेंगे, फिर भी अगर हमें जरूरत पड़ी, तो एआईयूडीएफ से हम समर्थन की अपेक्षा करेंगे। एक वरिष्ठ एआईयूडीएफ नेता ने नाम उजागर न करने की शर्त पर बताया कि उनके नेता मौलाना बदरुद्दीन अजमल से भाजपा के शीर्ष नेता हेमंत बिस्वा शर्मा ने संपर्क किया था और लगता है कि वह कांग्रेस के बजाय भाजपा के साथ जाने का फैसला कर सकते हैं।
हालांकि भाजपा और एआईयूडीएफ, दोनों आधिकारिक तौर पर गोपनीय बातचीत से इन्कार कर रहे हैं, पर मानने का कारण है कि दोनों के बीच बातचीत जारी है। अजमल ने इन पंक्तियों के लेखक को मात्र इतना कहा कि सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि किसको कितनी सीटें मिलती हैं। चुनाव से पूर्व हालांकि उन्होंने कहा था कि भाजपा को समर्थन देने का सवाल ही नहीं है; और कांग्रेस को समर्थन देने पर तभी विचार किया जाएगा, जब वह तरुण गोगोई को मुख्यमंत्री के रूप में पेश नहीं करेगी।
भाजपा एवं एआईयूडीएफ के समर्थकों का एक बड़ा तबका ऐसे गठबंधन को असंभव मानता है। असम की राजनीति को करीब से जानने वाले राजनीतिक विश्लेषक समीर पुरकायस्थ कहते हैं कि भाजपा वह पार्टी है, जो बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों को ढूंढने और निर्वासित करने के लिए प्रतिबद्ध है, जबकि एआईयूडीएफ को अवैध प्रवासियों की पार्टी के रूप में ही देखा जाता है। जाहिर है, भाजपा और एआईयूडीएफ का गठबंधन तभी होगा, जब दोनों दल अपने प्रमुख मुद्दों से पीछे हट जाएंगे। लेकिन पुरकायस्थ बताते हैं कि एआईयूडीएफ, कम से कम अजमल और उसकी अंतरंग मंडली के लोग कांग्रेस के साथ गठजोड़ नहीं करना चाहते, क्योंकि अल्पसंख्यक मतों के लिए दोनों के बीच आपसी प्रतिद्वंद्विता है। जबकि अल्पसंख्यकों का समर्थन पाने के लिए भाजपा पूरी तरह एआईयूडीएफ पर निर्भर है। कांग्रेस उसके अल्पसंख्यक जनाधार को हड़पने की कोशिश करेगी, जैसा कि उसने 1980 के दशक में यूनाइटेड माइनॉरिटी फ्रंट के साथ किया था।
हेमंत बिस्वा शर्मा के साथ अजमल के गोगोई कैबिनेट में उनके आखिरी दिनों से गहरे रिश्ते रहे हैं। शर्मा अजमल के साथ अपनी दोस्ती का इस्तेमाल कर सकते हैं। भाजपा नेता सर्वानंद सोनोवाल असम के विभिन्न स्थानीय समूहों और जनजातियों के बीच अपने उस कानूनी चुनौती के लिए लोकप्रिय हैं, जिसके कारण अवैध प्रवासियों को संरक्षण देने वाले आईएमडीटी ऐक्ट, 1983 को हटाया गया। असम की राजनीति के विश्लेषक अमरज्योति बोरा कहते हैं, वह हमारे राष्ट्रीय नायक और युवा उत्साही नेता हैं, पर उनके हेमंत बिस्वा शर्मा से छले जाने का खतरा है, जो बहुत चतुर नेता है।
पुरकायस्थ के मुताबिक, यदि भाजपा मुख्यमंत्री पद के लिए सोनोवाल पर अडिग रहती है, तब अजमल गठबंधन के लिए राजी नहीं होंगे, क्योंकि सोनोवाल को अल्पसंख्यक विरोधी माना जाता है। ऐसे में शर्मा के लिए संभावनाएं बढ़ जाएंगी। यही वजह है कि मतदान संपन्न होने के तुरंत बाद शर्मा और अजमल ने बातचीत शुरू कर दी। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, अजमल अल्पसंख्यकों को स्वीकार्य मुख्यमंत्री, गठबंधन सरकार में एआईयूडीएफ को पर्याप्त प्रतिनिधित्व (उप मुख्यमंत्री और गृह मंत्रालय जैसे अहम पद) और घुसपैठियों की खोज के लिए गठित ट्रिब्यूनल को भंग करने अथवा निष्क्रिय करने पर जोर डालेंगे।
एआईयूडीएफ के संस्थापक हाफिज रशीद चौधरी, जो अब समता पार्टी के साथ हैं, कहते हैं कि यदि अजमल भाजपा के साथ जाते हैं, तो वह असम में अल्पसंख्यक राजनीति की मूल भावना के साथ विश्वासघात होगा। पर एआईयूडीएफ के कई नेता और कार्यकर्ता इससे सहमत नहीं हैं। अबू सूफियां नामक एक कार्यकर्ता कहते हैं कि यदि हम एक ऐसी पार्टी के साथ गठजोड़ करते हैं, जो केंद्र में सत्ता में है, तो असम को विकास के लिए काफी पैसा मिलेगा।
जहां तक भाजपा की बात है, तो उसके लिए घुसपैठ-विरोधी बयानबाजी से सुशासन और विकास की की तरफ झुकाव पारंपरिक राजधर्म है। हालांकि कांग्रेस भी एआईयूडीएफ के साथ गठजोड़ करना चाहती है, पर यह तभी संभव होगा, जब वह 50 के आसपास और एआईयूडीएफ पंद्रह से अधिक सीटें जीतने में सफल हों। अजमल अगर यह कह रहे हैं कि सब कुछ अंतिम नतीजे पर निर्भर करेगा, तो इसकी वजह यही है।
पूर्वोत्तर की राजनीति के जानकार वरिष्ठ पत्रकार