विदेश नीति में टूटी जड़ता, सुधरे रिश्ते
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भाजपा नीत एनडीए सरकार की विदेश नीति की बात करें, तो कई विषय सामने आते हैं। जहां बड़े स्तर पर अमेरिका, जापान के साथ हमारी वार्ता सकारात्मक रही, वहीं प्रवासी भारतीयों में यह संदेश गया कि उनके हितों के लिए भारत सरकार प्रतिबद्ध होकर सोच रही है। बेशक पाकिस्तान और नेपाल के साथ रिश्ते इस बीच अनिश्चित रहे हैं, लेकिन इसके लिए इन देशों की अपनी जटिल स्थितियां ज्यादा जिम्मेदार हैं। अपनी तरफ से भारत ने रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिश की ही है। विदेश नीति के मामले में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी सफलता यही है कि इस दौरान विश्व बिरादरी के सामने भारत का रुतबा बढ़ा है।
प्रधानमत्री मोदी की शुरुआती ताबड़तोड़ विदेश यात्राओं के बाद सहसा यह सवाल उठने लगा था कि आखिर इतनी विदेश यात्राएं किसलिए। लेकिन सरकार के सामने एक साफ दृष्टिकोण था कि देश में बाहरी निवेश को आकर्षित करना है। वह प्रवासी भारतीयों को विश्वास में तो लेना ही चाहते थे, उनके जरिये रिश्तों की नई जमीन भी टटोल रहे थे।
जहां तक पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को सुधारने की बात है, तो यह इतना आसान भी नहीं है। पड़ोसियों के साथ रिश्तों की डोर बहुत नाजुक होती है। लेकिन रिश्तों को सुधारने के सतत प्रयास होते रहने चाहिए, भले ही ऐसे प्रयास विफल हो जाएं। हमें स्वीकार करना होगा कि पाकिस्तान के साथ हम बहुत आगे नहीं जा सके। एक कदम आगे, दो कदम पीछे चलते रहने के कारण सबंधों की नई जमीन नहीं बनी। इसकी एक बड़ी वजह पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का कमजोर होना भी है। वह चाहकर भी एक सीमा से आगे नहीं बढ़ पाते। वास्तव में पाकिस्तान कई दिशाओं से नियंत्रित होता है, इसलिए मुश्किलें भी ज्यादा आती हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शासन के शुरुआती दिनों में नेपाल की यात्रा की। नेपाल में उनका भाषण भारत-नेपाल के पारंपरिक-सांस्कृतिक-सामाजिक रिश्तों के परिप्रेक्ष्य में था। मगर नेपाल में जारी मधेसी आंदोलन और वहां की सरकार के रवैये के कारण रिश्तों की मजबूत जमीन तैयार नहीं हो पा रही है। नेपाल में माना जा रहा है कि मधेसियों को भारत प्रोत्साहित कर रहा है। मधेसी आंदोलन के दौरान नेपाल में खाने-पीने की चीजों की किल्लत पड़ गई, जिससे वहां भारत के विरोध में स्वर भी उठे। जबकि भारत सफाई देता रहा कि नेपाल की आंतरिक गतिविधियों से उसका कोई सबंध नहीं है।भारत जानता है कि पाकिस्तान और नेपाल, दोनों राष्ट्रों में लोकतांत्रिक प्रक्रिया कायम रहे, यही उसके हित में है।
जहां तक चीन की बात है, इस दौरान वहां की अर्थव्यवस्था अस्थिर रही है। चीन के साथ हमारे रिश्ते सुधरे नहीं हैं, तो बहुत खराब भी नहीं हुए हैं। पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह के विकास जैसे कदमों के जरिये वह भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है। इसी तरह चीन लगातार कोशिश कर रहा था कि ईरान के दक्षिण में चाबहार बंदरगाह पर वह समझौता करना चाहता था, लेकिन भारत ने बखूबी इसे अपने पक्ष में किया। इसका भारत के लिए काफी महत्व है।
इस सरकार की विदेश नीति का अच्छा पक्ष यह है कि वुनियादी संरचना, रेल, ऊर्जा , गैस लाइन, सौर ऊर्जा के लिए विदेशी निवेश की प्रतिबद्धता जताई गई है। अब इन प्रस्तावित नीतियों को क्रियान्वयन की दिशा में बढ़ना होगा। भारत ने कई देशों के साथ ऐसे समझौते किए हैं, जिससे सड़क, गैस पाइप लाइन, रेल आदि के क्षेत्र में हमें मदद मिलेगी। देश की बढ़ती विकास दर से भी विदेशी निवेशकों में भारत की सकारात्मक छवि बनी है। कुछ महत्वपूर्ण कमिटमेंट हुए हैं। लेकिन लालफीताशाही और राजनीतिक दांव-पेच को लेकर अब भी संदेह बना रहता है। इन स्थितियों से निपटने में थोड़ा वक्त लगेगा। लेकिन धीरे-धीरे विदेशी निवेश यहां आकर्षित हो रहा है। हमारी चुनौतियां अब बाहरी देशों को प्रभावित करने से ज्यादा अपनी व्यवस्था को और बेहतर बनाने की है। योजनाओं को साकार करने की है।
इसके अलावा हमारी चुनौती यह भी है कि अपने पड़ोसी देश की सीमाओं के आसपास लोगों को भरोसे में लें। सीमाओं से उजड़ते लोग राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से ठीक नहीं। अरुणाचल प्रदेश, असम, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर आदि सीमा क्षेत्र इस दृष्टि से संवेदनशील हैं।