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नई पीढ़ी के युवा उपदेशक और समाज: आखिर संतन को कहां सीकरी से काम?

Wed, 30 Oct 2024 03:53 PM IST
Amiya bhushan अमिय भूषण
Updated Wed, 30 Oct 2024 03:53 PM IST
सार

अभिनव और उसके अभिभावकों ने इस पूरे प्रसंग के लिए सोशल मीडिया पर अपनी प्रभावी उपस्थिति रखने वाले कुछेक यूट्यूबर को दोषी ठहराते हुए उनपे कानूनी कार्यवाही की बात की है। वही खुद को प्रेरक वक्ता बताने वाली जया किशोरी ने बैग प्रसंग को व्यक्तिगत पसंद का मामला बताते हुए विराम देने की कोशिश की है।

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Young preachers jaya kishori and abhinav arora of the new generation and society
जया किशोरी और अभिनव अरोड़ा। - फोटो : Amar Ujala and ANI

विस्तार

धर्म आस्था एवं विश्वास का मुद्दा है जिसकी प्राणवायु श्रद्धा है। किंतु यह सदैव भावनाओं से ही पुष्ट प्राप्त करता है। ऐसे मे भावनाओं पर बाजार के वर्चस्व नाते धर्म कलंकित हो रहा है। हालिया प्रकरण तथाकथित बाल संत अभिनव अरोड़ा और चर्चित कथावाचिका जया किशोरी से संबंधित है। ये दोनों इन दिनों खबरों मे है। बात अभिनव की करे तो स्वामी रामभद्राचार्य ने उसे डॉट लगाते हुए अपने एक कथा मंच से उतरने को कहा था जिसके बाद इस पर उनका मंतव्य भी आ चुका है। जबकि जया किशोरी काताजातरीन मामला एक बैग के उपयोग से संबंधित है।

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इसे वो अपनी एक हवाई यात्रा क्रम मे उपयोग करती नजर आई है। उनकी यह यात्रा चंडीगढ़ मे आयोजित वृंदावन प्राकट्य महोत्सव नामक धार्मिक समागम का है। दरअसल, इस प्रसिद्ध थैले की निर्माणकर्ता कंपनी गाय के चमड़ी से अपने उत्पादों को बनाने के लिए मशहूर है। इस पूरे प्रसंग मे मीडिया द्वारा इन दोनों के पक्ष को जानने के प्रयास उपरांत लोगबाग मुखर हुए है। इनके तौर तरीके और अटपटे बोल पहले से भी सवालो के घेरे मे थे। किंतु प्रेस के समक्ष जिस अंदाज मे इन्होंने अपनी बात रखी उससे संतों को लेकर एक बनी बनाई छवि धूमिल हुई।
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अभिनव और उसके अभिभावकों ने इस पूरे प्रसंग के लिए सोशल मीडिया पर अपनी प्रभावी उपस्थिति रखने वाले कुछेक यूट्यूबर को दोषी ठहराते हुए उनपे कानूनी कार्यवाही की बात की है। वही खुद को प्रेरक वक्ता बताने वाली जया किशोरी ने बैग प्रसंग को व्यक्तिगत पसंद का मामला बताते हुए विराम देने की कोशिश की है। इनके इस वार्ता का अर्थ निकाला जाए तो इसके अनुसार इनकी सोच अधिकतम सुविधाओं के उपभोक्त की है। इसमें कोई बुराई भी नही है किंतु यह भारतीय मूल्यबोधो के ठीक उलट है।
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यह एक ऐसा समाज है जिसकी सोच सदियों से अतिथि और अभ्यागतों के सेवा तक ही धन संग्रह की रही है। ऐसे मे यहां के लिए ये विचार निश्चित ही अप्रासंगिक है। किंतु बात केवल यही तक सीमित नही है। इन्होंने मोह माया साधु संत संन्यास वैराग्य पर भी अपनी बेबाक बातें रखी है। इस क्रम मे उन्होंने खुद को इससे सर्वदा पृथक एक सामान्य लड़की कहा है। उनकी यह बात ही जन भावनाओं को सर्वाधिक आहत करने वाली है। आखिर फिर एक प्रेरक वक्त और भागवत कथाकार के तौर पर प्रवचन करने का क्या मतलब है? क्योंकि कथा और सत्संग का काम युगों युगों से समाज को दिशा दिखाने का रहा है।

भक्ति के जागरण द्वारा व्यक्तियों के रूपांतरण की गाथा ही तो प्रवचन है। एक ऐसा जीवन जो नैतिकता से ओतप्रोत हो। जहाँ मूल्य आदर्शों संग ईश्वर मे सदैव विश्वास वाली आस्था का निर्माण हो। उपदेश इसी नवनिर्माण के उपक्रम का तो एक नाम है। इस नाते ये काम सदैव से कुछेक लोगो के जिम्मे हुआ करता था। साधु संन्यासी, पुरोहित पाहन, गुरु और ओझा इसे अपने तौर तरीकों से जरूर किया करते थे। किंतु एक अनिवार्य शर्त थी उनका साधु स्वभाव होना था।

जहां ज्ञान के चिरंतन अभ्यास संग जीवन का भी धवल निर्मल और निर्दोष होना नितांत आवश्यक है। इसलिए रामचरित मानस मे साधु स्वभाव के लिए गोस्वामी तुलसीदास संत स्वभाव नवनीत समाना कहते है। वास्तव मे प्रवचन उद्बोधन का अधिकार केवल उन्ही को है जो स्वार्थ से रहित और परमार्थ से युक्त हो। जिनमे किंचित मात्र भी किसी सत्ता का भय नहीं हो तथा वे सदैव सत्य संभाषण करने वाले हो। इनके मुख और मन दोनों मे ही सर्वदा भगवत नाम की अनुगूंज हो। अन्यथा मतांध मुगलों के सामने सीन चौड़ा कर कुंभन दास संत स्वभाव का परिचय नही देते।

उनकी ही प्रसिद्ध वाणी है संतन को कहाँ सीकरी सो काम'। ज्ञान तथा भगवान की चर्चा करने वालों को राजसी ठाठ बाट से क्या और क्यों लेना देना होना चाहिए?संत कवि कुंभन दास अपनी इसी रचना में कहते है आवत जात पनहिया टूटे बिखर जात हरि नाम। इसका अभिप्राय है की तुम जैसे ऐश्वर्यशाली मदांध से मिलने के नाते न केवल मेरी चप्पल टूट गई अपितु हरि नाम भी भूल जाता हूं।

इसके उलट अब बदलते दौर मे हमारी  आध्यात्मिक विरासत को बढ़ाने की महत्ती जिम्मेदारी केवल बाजार के कंधों पर है। इसलिए बाजार ने अभिनव जैसे रील बॉय को बालसंत तो कुमार विश्वास से कवि को राम कथा मर्मज्ञ बना दिया है। जया किशोरी और देवी चित्रलेखा सी केवल सुंदर काया कोमल कंठ वाली नारियां सफल  भगवत कथावाचिकायें है। 

इस बदलते दौर ने अली मौला के पैरोकार मुरारी बापू को श्रद्धये संत बनाया है। ऐसे ही उदाहरणों ने हिंदी फिल्मों के प्रसिद्धि लेखक एवं कवि मनोज मुंतशिर को भी मनमाने रचनात्मकता की असीमित छूट दी है। जिस नाते न केवल उन्होंने रामकथा का अमर्यादित  चित्रण किया अपितु  पौराणिक कथाओं के एक वक्ता के तौर पर वो भी अब सामने है। इनमे से कोई भी सनातन परंपरा के अधिकृत आचार्य अथवा प्रवक्ता नही है। 

इन्होंने ना तो किसी गुरु की संगति की है और ना ही कथा पूर्व कोई प्रशिक्षण अथवा गहन अध्ययन ही पूर्ण किया है। यहां तक की इनमें से किसी ने एक स्वतंत्रत व्यक्ति के रूप मे  अभ्यास अथवा यात्राओं के द्वारा भी कुछ आध्यात्मिक नही प्राप्त किया है। अन्यथा ये प्रसिद्ध यायावर राहुल सांकृत्यायन अन्यथा गौतम बुद्ध एवं महावीर के मार्ग के पथिक होते। ये सारी बातें आप इनके रहन सहन और उपदेशों से समझ सकते है। जया किशोरी अपने सुविधानुसार कभी परंपरावादी तो कभी नारीवादी और कभी प्रगतिशील हो जाती है।

कुमार विश्वास अकसर यह भूल जाते है की वो राम और सीता की महागाथा रामायण सुना रहे है। अन्यथा वो रावण एवं सूर्पनखा के आदर्श चरित्र की कपोलकथा हर मंच से नही बांचते। बात अभिनव अरोड़ा जैसे बाल संत अथवा बाल व्यासों की करे तो इनमें से अधिकांश के इस रूपांतरण के पीछे उनका परिवार है। इनके अभिभावकों को लगता है की अपने बच्चों के माध्यम से वो प्रसिद्धि और पैसा दोनों प्राप्त कर सकते है। अन्यथा अगर भक्ति होती तो ये बच्चे किसी गुरुकुल में अपनी सेवायें देते हुए शास्त्रों की शिक्षा ग्रहण करते नजर आते।

बजाय कृष्ण को छोटा भाई कहने उन संग खेलने पढ़ने और अयोध्या में रामजी के साक्षात् दर्शन की झूठी कहानी नही सुनाते। अतः ऐसे में आवश्यक है की मीडिया के साथ ही समाज भी बाजारी सोच वाले ऐसे हर तथाकथित सनातन संस्कृति प्रवक्ता से परहेज करें। अन्यथा ऐसे ही इनका कारोबार बढ़ता रहेगा और बारंबार सनातन धर्म संस्कृति की हानि ग्लानि तथा ह्रास होता रहेगा। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं।  आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।  अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं।  लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 

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