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World Sparrow Day 2020: ओ री चिड़ैया, नन्ही-सी चिड़िया, अंगना में फिर आजा रे

Fri, 20 Mar 2020 01:48 PM IST
Nilesh Kumar निलेश कुमार
Updated Fri, 20 Mar 2020 01:48 PM IST
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world sparrow day how the importance of this day for bird conservancy
sparrow

हमारे बचपन की यादें गौरैया बिन अधूरी होती है। वर्षों पहले जब आंगन में फुदकती-कूदती नन्ही-सी चिड़िया चोंच में दाना दबाए फुर्र होती थी, तो उसके पंखों की फड़फड़ाहट और चीं-चीं की चहचहाहट हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन चुकी थी। बचपन में ‘बी’ फॉर बर्ड, बर्ड मने चिड़ैया सीखा था और चिड़ैया का मतलब ही गौरैया होती थी। खाने की थाली में परोसे चावल का दाना ले भागने का भी बुरा नहीं मानते थे हम, बल्कि कुछ हिस्सा निकाल कर बगल में बिखरा देते और कटोरी में पानी भी निकाल देते थे।

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शहरी जीवनशैली में ये बातें अतीत की यादें हो चुकी है। आधुनिक से अत्याधुनिक होती जीवनशैली में हम सुख-सुविधा सम्पन्न तो होते गये, लेकिन काफी कुछ खोया भी। शहरों में बिल्डिंग बनती गईं, सड़क पर वाहनों का शोर बढ़ता गया, लेकिन घर-आंगन में चिड़ियों की चहचहाहट खत्म-सी हो गई। सिमटते आंगन के साथ चिड़ियों का संसार भी सिमटता चला गया। पक्षी और वन्यजीव विशेषज्ञ दीपक कुमार बताते हैं कि आज आधुनिक बिल्डिंग में पुराने घरों की तरह छज्जे, टाइलों व कोनों के लिए जगह ही शेष नहीं होती, जहां गौरैया घोंसला बना सके। आज टाइल्स व मार्बल के मकानों में पिंजरे हैं और उनमें देशी-विदेशी खुबसूरत दिखती चिड़िया भी, लेकिन पिंजरे की रंगीन चिड़ियों में गौरैया की चिंचियाहट-सा सुकून कहां?
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हमारे कारण ही हमसे दूर हुई हमारी चिड़ैया

  • आधुनिक शहरी जीवनशैली से इनके घोंसले बनाने की जगह व दाना-पानी कम होना
  • माइक्रोवेव जैसे उपकरण व गंदी नालियों के पानी
  • पेट्रोल जलने से निकलने वाले मेथाइल नाइट्राइट से भी खतरा
  • इनके अंडों को नष्ट कर देने की क्षमता वाली मोबाइल फोन व टावरों की तरंगे
  • खेतों व पेड़-पौधों में अंधाधुंध कीट-नाशक का प्रयोग(इनका भोजन कीट-पतंग होते हैं)


आज न केवल शहरों में, बल्कि गांवों में भी गौरैयों की संख्या काफी कम हो गई है। हमारे बचपन की हंसी-खुशी, उत्साह-उल्लास में रची-बसी और हमारी परंपरा, संस्कृति की संवाहक गौरैया हमारे बीच से गायब होती जा रही है। बिहार के इस राजकीय पक्षी की संख्या 60 से 80 फीसदी कम हो गई है। पक्षी प्रेमियों के प्रयास से साल 2010 से विश्व गौरैया दिवस मनाया जा रहा है। हालांकि इसकी सफलता तभी है, जब हम इसके संरक्षण को लेकर जागरूक हों। 

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sparrow

आइए करें प्रयास ताकि फिर से चहक उठे अंगना 

  • मकानो में कुछ खुली जगहों पर गड्ढेनुमा आकृतियां बनाएं
  • घर के बाहर लकड़ी के छोटे-छोटे बक्से बनाएं, जिनमें गौरैया घोसला बना सकें
  • घर के बचे खाद्य पदार्थों, भोजन को फेंकने की जगह खुली जगह पर बिखरा दें
  • लॉन, बड़े गमले या बगीचे में देसी पेड़-पौधे लगायें
  • कटोरे, आधे घड़े या ऐसे ही किसी पात्र में पानीं रखें
  • कृत्रिम घोसला बनायें व पात्र में खाद्य पदार्थ रखें
  • घर की छत, टेरेस पर भी अनाज के दाने बिखेरें
  • अंधाधुंध कीटनाशक का प्रयोग न करें

महादेवी वर्मा ने अपनी कहानी गौरैया में कामना भी की है कि हमारी शहरी जीवन को समृद्ध करने गौरैया वापस हमारे घर-आंगन लौटेगी। तो आइए कुछ प्रयास हम भी करें, ताकि फिर से हमारे घर-आंगन में हमारी प्यारी चिड़ैया मेहमान बन कर लौटे और परिवार बन कर बस जाए।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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