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मैदान में लू और हिमालय पर लपटें, धू-धू कर जल रहे जंगल

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Thu, 06 Jun 2019 12:37 PM IST
पहाड़ों के जंगलों में आग
पहाड़ों के जंगलों में आग - फोटो : सोशल मीडिया
ग्रीष्म ऋतु में आसमान से आग बरसने से लगभग आधा हिन्दुस्तान झुलस रहा है। राजस्थान जैसे कुछ राज्यों में पारा 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और सम्पूर्ण एशिया के मौसम चक्र को नियंत्रित करने वाला हिमसागर, हिमालय प्रचण्ड गर्मी का मुकाबला करने के बजाय स्वयं ही जल रहा है। जम्मू कश्मीर से लेकर उत्तर पूर्व तक के जंगल इन दिनों प्रचण्ड वनाग्नि की चपेट में हैं। लू और वनाग्नि से उत्तर भारत के लोग तो त्रस्त हैं ही लेकिन इस आपदा से वन्य जीव संसार महाविनाश के संकट में फंसा हुआ है।
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जैव विविधता के लिये दुनिया के सबसे सम्पन्न हाॅट स्पाॅट्स में से एक हिमालय के उत्तर पूर्वी राज्यों की स्थिति तो और भी अधिक विकट है। नौकरशाही का ध्यान वृक्षों और वन संपदा को हो रहे नुकसान की ओर तो जाता है मगर जीव संसार के महाविनाश और हिमालय की लोकल वार्मिंग के साथ ही वहां से पैदा हो रही कार्बन डाइऑक्साइड पर नहीं जाता। चूंकि अब जंगल सरकार के हैं और उनसे जुड़े स्थानीय समुदायों के साथ घुसपैठियों का जैसा बर्ताव किया जाता है तो वे भी हिमालय के जंगलों को बचाने का प्रयास क्यों करेंगे?

शीतलता देने वाला हिमालय स्वयं ही झुलसा
ग्रीष्म ऋतु अपने चरम पर है। महाराष्ट्र, राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर प्रदेश को लू के थपेड़ों ने झुलसा रखा है। गत 19 मई को राजस्थान के फलोदी में तो हद ही हो गयी। वहां उस दिन तापमान 51 डिग्री सेल्सियस यानी कि 123.8 डिग्री फाॅरेनहाइट तक पहुंच गया। राजस्थान के ही श्रीगंगानगर में तापमान 49.6 डिग्री तक पहले ही छू चुका है और अभी मानसून की प्रतीक्षा ही है। ऐसी स्थिति में सामान्यतः नागाधिराज हिमालय का ही सहारा होता है जो कि भारत ही नहीं अपितु समूचे ऐशिया के ऋतु चक्र को नियंत्रित करता है और उसकी बर्फीली चोटियों को चूम कर चलने वाली ठण्डी हवायें उत्तर भारत के तापमान को नियंत्रित करती हैं। 

हिमालय अपने आप में एक हिमसागर है जिसमें बर्फ के रूप में एक महासागर से अधिक पानी जमा रहता है। हवायें महासागर से पानी लाकर बर्फ के रूप में हिमालय पर उंडेल देती हैं और वह बर्फ साल भर पिघल कर फिर पानी के रूप में गंगा, यमुना, सिन्धु और ब्रह्मपुत्र जैसी सदावाहिनियों के रूप में प्रवाहित होकर मनुष्यों, जीव-जन्तुओं और धरती की प्यास बुझाता है। लेकिन जब यह बर्फ का महासागर स्वयं ही जल रहा हो तो वह सूरज की अग्निवर्षा का क्या मुकाबला करेगा? वनों से भरपूर जो हिमालय धरती के बड़े हिस्से से कार्बनडाइ ऑक्साइड सोख कर ऑक्सीजन देता है वही हिमालय अगर वनों में लगी भीषण आग के कारण ताप देने के साथ ही धुआं ही धुआं देता हो तो उससे स्वास्थ्य वर्धक और जीवन रक्षक आबोहवा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। 
 
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