फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Womens Day 2025 is Women's Day enough to eliminate inequality

Womens Day 2025: क्या महिला दिवस ही काफी है असमानता दूर करने के लिए?

Thu, 06 Mar 2025 01:55 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 06 Mar 2025 01:55 PM IST
सार

भारत में किए गए समय उपयोग सर्वेक्षण (TUS, 2024) के अनुसार, 15-59 वर्ष की महिलाओं ने प्रतिदिन औसतन 305 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्यों में लगाए, जबकि पुरुषों ने केवल 74 मिनट।

विज्ञापन
Womens Day 2025 is Women's Day enough to eliminate inequality
International Women's Day 2025: महिला दिवस विशेष। - फोटो : अमर उजाला, ग्राफिक

विस्तार

हर साल 8 मार्च को अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन महिलाओं की उपलब्धियों, उनके संघर्षों और समाज में उनकी भूमिका को सम्मान देने के लिए समर्पित है। लेकिन क्या केवल यह दिन मनाने से महिलाओं की स्थिति में कोई वास्तविक सुधार होता है? क्या यह असमानता मिटाने का कोई ठोस समाधान है, या फिर यह केवल एक औपचारिकता बनकर रह गया है?

विज्ञापन


वास्तविकता यह है कि महिलाओं की स्थिति में अब भी असमानता बनी हुई है, चाहे वह घरेलू कार्यों में हो, वेतन में हो, रोजगार में हो या फिर नेतृत्व में। आंकड़े बताते हैं कि महिलाएं आज भी अपने पुरुष समकक्षों की तुलना में कई गुना अधिक अवैतनिक घरेलू कार्यों में समय खर्च कर रही हैं, जिससे उनके लिए आर्थिक स्वतंत्रता और आत्मनिर्भरता की राह मुश्किल हो जाती है।
विज्ञापन


भारत में किए गए समय उपयोग सर्वेक्षण (TUS, 2024) के अनुसार, 15-59 वर्ष की महिलाओं ने प्रतिदिन औसतन 305 मिनट अवैतनिक घरेलू कार्यों में लगाए, जबकि पुरुषों ने केवल 74 मिनट। यह आंकड़ा स्पष्ट रूप से दिखाता है कि घरेलू कार्यों की ज़िम्मेदारी अब भी मुख्य रूप से महिलाओं के कंधों पर है। वर्ष 2019 में महिलाओं द्वारा इन कार्यों में बिताया गया समय 315 मिनट था, जो 2024 में थोड़ा घटा है, लेकिन यह कमी इतनी नगण्य है कि इसे ठोस प्रगति नहीं कहा जा सकता।
विज्ञापन
विज्ञापन


इसका एक कारण यह हो सकता है कि महिलाएं अब धीरे-धीरे सशुल्क कार्यों की ओर बढ़ रही हैं, लेकिन यह बदलाव बहुत धीमा है और व्यापक पैमाने पर दिखाई नहीं देता। इसके उलट, पुरुषों द्वारा घरेलू कार्यों में बिताया गया समय अब भी उतना ही सीमित है, जिससे यह साबित होता है कि घरेलू जिम्मेदारियों को साझा करने की मानसिकता अभी भी समाज में नहीं आई है।

घरेलू कार्यों के अलावा, महिलाओं की देखभाल संबंधी ज़िम्मेदारियां भी अत्यधिक हैं। 15-59 वर्ष की 41% महिलाएं अपने घर के सदस्यों की देखभाल में संलग्न थीं, जबकि पुरुषों में यह भागीदारी मात्र 21.4% थी। यह दर्शाता है कि घर में बच्चों, बुजुर्गों और बीमार सदस्यों की देखभाल की प्राथमिक जिम्मेदारी अब भी महिलाओं की ही है।

यहां तक कि जब पुरुष देखभाल कार्यों में भाग लेते भी हैं, तब भी उनका योगदान सीमित रहता है। पुरुषों ने देखभाल संबंधी कार्यों में औसतन 74 मिनट बिताए, जबकि महिलाएं इसमें 140 मिनट तक लगी रहीं। यह विषमता महिलाओं के आर्थिक और पेशेवर विकास में एक बड़ी बाधा बनती है, क्योंकि वे अपने करियर और व्यक्तिगत विकास के लिए उतना समय नहीं निकाल पातीं, जितना पुरुष निकाल सकते हैं।

अगर रोजगार की बात करें, तो महिलाओं की स्थिति अब भी काफी असमान बनी हुई है। वर्ष 2024 के समय उपयोग सर्वेक्षण के अनुसार, 15-59 वर्ष की केवल 25% महिलाएं ही सशुल्क रोजगार में शामिल हैं, जबकि पुरुषों की भागीदारी 75% है। वर्ष 2019 में महिलाओं की भागीदारी 21.8% थी, यानी इसमें मामूली वृद्धि हुई है, लेकिन यह अब भी बहुत कम है।

इस तुलना से स्पष्ट होता है कि महिलाएं अब भी बड़ी संख्या में घर की चारदीवारी तक सीमित हैं और आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हो पा रही हैं। इसके पीछे एक मुख्य कारण यह है कि घरेलू कार्यों की ज़िम्मेदारी उन्हें रोजगार के अवसरों का पूरा लाभ उठाने नहीं देती। अगर समाज में यह धारणा बनी रहती है कि घरेलू काम और देखभाल का दायित्व सिर्फ महिलाओं का है, तो उनकी आर्थिक स्वतंत्रता का सपना कभी भी पूरी तरह साकार नहीं हो पाएगा।

भारत में महिलाओं के लिए एक और बड़ी चुनौती वेतन असमानता है। ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2023 के अनुसार, भारत वेतन समानता में 146 देशों में 135वें स्थान पर है। यह इंगित करता है कि समान कार्य करने के बावजूद महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम वेतन मिलता है।

इस वेतन अंतर की मुख्य वजह यह है कि महिलाएं मुख्य रूप से कम वेतन वाले क्षेत्रों में कार्यरत हैं और कई बार उन्हें कार्यस्थल पर भेदभाव का सामना भी करना पड़ता है। महिलाओं के लिए पदोन्नति और उच्च पदों पर पहुँचने की राह भी पुरुषों की तुलना में अधिक कठिन होती है।

राजनीति और प्रशासन में भी महिलाओं की भागीदारी सीमित है। संसद में महिला सांसदों का प्रतिनिधित्व केवल 15% है, जबकि स्थानीय निकायों में आरक्षण के कारण महिलाओं की भागीदारी ज़रूर बढ़ी है, लेकिन उच्च स्तर की राजनीति में वे अब भी पीछे हैं।

इसी तरह, कॉरपोरेट क्षेत्र में भी शीर्ष प्रबंधन और सीईओ पदों पर महिलाओं की संख्या पुरुषों की तुलना में बहुत कम है। जब तक महिलाओं को नेतृत्व और निर्णय-निर्माण में समान अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक लैंगिक समानता की दिशा में वास्तविक बदलाव संभव नहीं होगा।

महिलाओं की सुरक्षा भी एक गंभीर चिंता का विषय है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB, 2022) के आंकड़ों के अनुसार, भारत में प्रति दिन औसतन 86 बलात्कार के मामले दर्ज होते हैं। घरेलू हिंसा, यौन उत्पीड़न और कार्यस्थलों पर भेदभाव जैसी समस्याएँ अब भी महिलाओं के जीवन को प्रभावित कर रही हैं। कई महिलाएं भय, सामाजिक दबाव और कानूनी प्रक्रियाओं की जटिलता के कारण अपने साथ हुई हिंसा को रिपोर्ट नहीं कर पातीं, जिससे अपराधियों को खुली छूट मिल जाती है।

मिस वर्ल्ड 2017 की विजेता मानुषी छिल्लर ने भी इस विषय पर एक महत्वपूर्ण बयान दिया था। उनसे पूछा गया था कि कौन सा पेशा सबसे अधिक वेतन का हकदार है, और क्यों? उन्होंने उत्तर दिया, "मां का काम सबसे अधिक सम्मान और वेतन का हकदार है। यह केवल पैसों की बात नहीं है, बल्कि प्यार और सम्मान के बारे में है जो कोई भी मां अपने बच्चों को देती है।" यह उत्तर दर्शाता है कि समाज में घरेलू श्रम का मूल्यांकन नहीं किया जाता, जबकि यह सबसे आवश्यक कार्यों में से एक है।

निष्कर्षतः, महिला दिवस केवल एक प्रतीकात्मक पहल है। इसे वास्तविक परिवर्तन के लिए एक अवसर के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए, न कि केवल औपचारिकता के रूप में। जब तक समाज, सरकार और व्यक्ति स्तर पर ठोस कदम नहीं उठाए जाते, तब तक महिला सशक्तिकरण और लैंगिक समानता एक दूर का सपना ही बनी रहेगी।

महिलाओं को उनके अधिकार तभी मिलेंगे जब घर, कार्यस्थल और समाज में उन्हें समान अवसर और सम्मान दिया जाएगा। महिला दिवस का सही उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब हर दिन महिलाओं के लिए समानता और स्वतंत्रता की दिशा में काम किया जाएगा, न कि केवल 8 मार्च को।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed