फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Women played a decisive role in the Quit India Movement

Quit India Movement: महिलाओं की निर्णायक भूमिका थी भारत छोड़ो आंदोलन में

Fri, 08 Aug 2025 05:32 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Fri, 08 Aug 2025 05:32 PM IST
सार

क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद ही गांधीजी और कांग्रेस ने ब्रिटिश राज को पूरी तरह समाप्त करने का ऐलान किया। इस आंदोलन ने अंततः 1946 में कैबिनेट मिशन के आगमन और 1947 में भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।

विज्ञापन
Women played a decisive role in the Quit India Movement
भारत छोड़ो आंदोलन। - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

8 अगस्त 1942 को महात्मा गांधी ने 'करो या मरो' का आह्वान करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत की। यह आंदोलन केवल एक जनांदोलन नहीं था, बल्कि वही निर्णायक मोड़ था जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी और उन्हें भारत को स्वतंत्र करने के लिए मजबूर कर दिया।

विज्ञापन


यह वही क्षण था, जिसने अंग्रेजों को यह महसूस करा दिया कि अब भारत पर शासन करना असंभव है। भारत छोड़ो आंदोलन की पृष्ठभूमि में कई घटनाएँ थीं। 1942 की शुरुआत में ही ब्रिटेन ने क्रिप्स मिशन के जरिए भारत को कुछ सीमित स्वायत्तता देने का प्रयास किया, लेकिन यह प्रस्ताव कांग्रेस और आम जनता के लिए अस्वीकार्य था क्योंकि इसमें पूर्ण स्वतंत्रता की कोई गारंटी नहीं थी।
विज्ञापन


क्रिप्स मिशन की असफलता के बाद ही गांधीजी और कांग्रेस ने ब्रिटिश राज को पूरी तरह समाप्त करने का ऐलान किया। इस आंदोलन ने अंततः 1946 में कैबिनेट मिशन के आगमन और 1947 में भारत की स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त किया।
विज्ञापन
विज्ञापन


यह आंदोलन स्वतंत्रता संग्राम का वह चरण था जिसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी हुई, और महिलाओं की भागीदारी तो न केवल प्रेरणादायक थी, बल्कि निर्णायक भी। उस समय जब समाज में महिलाओं की भूमिका सीमित थी, उन्होंने न केवल इस क्रांति में भाग लिया, बल्कि कई स्थानों पर उसका नेतृत्व भी किया।

नेतृत्व संभालती महिलाएं

भारत छोड़ो आंदोलन की शुरुआत के साथ ही ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के लगभग सभी शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था। ऐसी स्थिति में आंदोलन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी जनता पर आ गई और इसमें महिलाएं अग्रणी रहीं। अरुणा आसफ अली ने मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान (अब अगस्त क्रांति मैदान) में राष्ट्रीय ध्वज फहराकर अंग्रेजों को खुली चुनौती दी।

यह कार्य केवल प्रतीकात्मक नहीं था, बल्कि एक जनक्रांति की चिंगारी थी। सुचेता कृपलानी ने भूमिगत कार्यों का संचालन किया। वे कार्यकर्ताओं को संगठित करती रहीं और संदेशों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने का जोखिम भरा कार्य करती थीं।

उषा मेहता द्वारा स्थापित ‘कांग्रेस रेडियो’ एक ऐसा माध्यम बना, जिसने सेंसरशिप के युग में सच्ची आवाज को लोगों तक पहुंचाया। इसके अलावा, अनेक स्थानीय महिलाओं ने भी नेतृत्व संभाला—जैसे कि कस्तूरबा गांधी, जिन्हें आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किया गया और वे जेल में ही गंभीर रूप से बीमार होकर चल बसीं।

विविध सामाजिक पृष्ठभूमि की महिलाओं की भागीदारी

इस आंदोलन में भाग लेने वाली महिलाएं केवल शहरी, शिक्षित और उच्च वर्ग की नहीं थीं, बल्कि गाँव-देहात की आम स्त्रियाँ भी थीं, जिनके पास ना शिक्षा थी, ना राजनीतिक प्रशिक्षण, फिर भी उनमें आजादी की भूख थी। शहरी महिलाओं में सरोजिनी नायडू, विजयलक्ष्मी पंडित, कमला नेहरू, दुर्गा बाई देशमुख जैसी नेताओं ने भाषणों, जुलूसों और सत्याग्रहों के माध्यम से आंदोलन को धार दी। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण भारत की अनपढ़ लेकिन जागरूक महिलाएं भी आंदोलन का हिस्सा बनीं।

उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र और असम के गांवों में स्त्रियों ने सरकारी इमारतों पर झंडा फहराया, रेल लाइनों को बाधित किया और ब्रिटिश अधिकारियों का सामाजिक बहिष्कार किया। उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र की भीमा बाई होल्कर ने ब्रिटिश टुकड़ी पर सीधे हमला किया। इसी तरह असम की कनकलता बरुआ ने 17 साल की उम्र में जुलूस की अगुवाई करते हुए तिरंगा फहराते समय गोली खाई।

सामाजिक बेड़ियां टूटीं, आत्मबल जगा

भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान महिलाओं ने उन सामाजिक बेड़ियों को भी तोड़ा जो सदियों से उनकी स्वतंत्रता को बाधित कर रही थीं। पर्दा प्रथा, जातिगत भेदभाव और लिंग आधारित रूढ़ियां उस समय आम थीं, लेकिन आंदोलन में भागीदारी ने उनमें आत्मबल और आत्मविश्वास की भावना को जन्म दिया। कॉलेजों और विद्यालयों की छात्राओं ने अपनी पढ़ाई छोड़कर जुलूसों में भाग लिया, पर्चे बाँटे, भाषण दिए और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।

गृहिणियां, जो आमतौर पर घर के चूल्हे-चौके तक सीमित थीं, अब जेलों तक पहुँच गईं। यह परिवर्तन केवल आंदोलन तक सीमित नहीं रहा। स्वतंत्रता के बाद कई महिलाएँ सामाजिक और राजनीतिक नेतृत्व में आगे आईं। यह परिवर्तन उस समय के लिए एक सामाजिक क्रांति से कम नहीं था।

कठिनाइयां और बलिदान

इस आंदोलन में महिलाओं को सामाजिक ही नहीं, शारीरिक और मानसिक दमन का भी सामना करना पड़ा। हजारों महिलाएं गिरफ्तार हुईं। उन्हें जेल में रखा गया, जहाँ अमानवीय व्यवहार, बीमारी और यातना आम बात थी। कस्तूरबा गांधी की जेल में हुई मृत्यु एक ऐसा बलिदान था, जो दिखाता है कि यह लड़ाई कितनी कठोर थी।

मातंगिनी हाजरा, जिनकी उम्र 73 वर्ष थी, बंगाल के तामलुक में तिरंगा लिए मार्च करते हुए पुलिस की गोली का शिकार बनीं। कनकलता बरुआ असम में गोली खाकर शहीद हो गईं। इसके अतिरिक्त, कई महिलाएँ पुलिस की बर्बरता की शिकार बनीं, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। इन बलिदानों ने आंदोलन को नैतिक बल प्रदान किया और जनमानस में स्वतंत्रता के प्रति भावना को और प्रबल किया।

अंतरराष्ट्रीय प्रभाव और रणनीतिक दृष्टि

भारत छोड़ो आंदोलन द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान शुरू हुआ, जब ब्रिटेन पहले से ही दबाव में था। महिलाओं की भागीदारी ने इस आंदोलन को और अधिक नैतिक बल दिया। अंतरराष्ट्रीय मीडिया में भी इसकी गूंज सुनाई दी। महिलाओं द्वारा अपनाई गई रणनीतियां – जैसे गुप्त संचार, वैकल्पिक संगठन खड़ा करना, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार और स्थानीय स्तर पर आंदोलन का संचालन – आंदोलन को गतिशील बनाए रखने में कारगर सिद्ध हुईं।

आधुनिक संदर्भ में प्रासंगिकता

आज जब हम महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक समानता और नेतृत्व की भागीदारी की बात करते हैं, तो भारत छोड़ो आंदोलन की ये नायिकाएँ प्रेरणा का स्रोत बनती हैं। यह आंदोलन महिलाओं के लिए उस दरवाजे की तरह था, जिससे वे सार्वजनिक जीवन में प्रवेश कर सकीं। स्वतंत्रता के बाद सुचेता कृपलानी भारत की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं।

इसके अलावा, राज्यसभा और लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी में जो वृद्धि हुई, उसकी नींव इसी आंदोलन में रखी गई थी। आज की हर महिला नेता, चाहे वह संसद में हो या पंचायत में, चाहे वह सामाजिक कार्यकर्ता हो या शिक्षिक – कहीं न कहीं उन महिलाओं की उत्तराधिकारी है, जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध डटकर मुकाबला किया।

यह सामाजिक जागरूकता और लैंगिक मुक्ति

भारत छोड़ो आंदोलन केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह सामाजिक जागरूकता और लैंगिक मुक्ति की दिशा में एक बड़ा कदम था। इस आंदोलन ने यह सिद्ध किया कि देशभक्ति केवल पुरुषों की परिभाषा नहीं है। महिलाएं भी जब अवसर और उद्देश्य पाती हैं, तो वे इतिहास बदल सकती हैं।

अरुणा आसफ अली का तिरंगा फहराना, उषा मेहता का कांग्रेस रेडियो, मातंगिनी हाजरा और कनकलता बरुआ की शहादत – ये सभी घटनाएं एक ऐसे साहस और संकल्प की प्रतीक हैं, जो हर भारतीय के लिए प्रेरणा हैं। इन वीरांगनाओं की विरासत हमें आज यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हम उनके सपनों के भारत की ओर अग्रसर हैं? क्या हमारी आज की महिलाएं वही आत्मबल, स्वतंत्रता और नेतृत्व अनुभव कर रही हैं, जिसके बीज उन आंदोलनों में पड़े थे?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed