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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Who Gave the Slogan 'Inquilab Zindabad'? The Untold Story Behind India's Revolutionary Call

क्रांति और आंदोलनों की अलख इंकलाब-जिंदाबाद

Wed, 05 Aug 2026 03:01 PM IST
Dr.Naaz Parveen डॉ. नाज परवीन
Updated Wed, 05 Aug 2026 03:01 PM IST
सार

भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत के बाद इस इंकलाबी नारे ने अपने सफर को कारवां में तब्दील किया और जल्द ही ऐसी रफ़्तार भरी की भारतीयों का यह सबसे पसंदीदा नारा बनकर उभरा।

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Who Gave the Slogan 'Inquilab Zindabad'? The Untold Story Behind India's Revolutionary Call
इंकलाब जिंदाबाद - फोटो : AI

विस्तार

इंकलाब जिंदाबाद का इंकलाबी नारा। जिसे सन् 1921 में हसरत मोहानी ने अपनी क्रांतिकारी कलम से पहली बार लिखा था। इस इंकलाबी नारे को विश्व प्रसिद्ध किया भगत सिंह, अशफ़ाक उल्ला खां और राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी जैसे भारत मां के बहादुर बेटों ने। जब-जब इंकलाब जिंदाबाद की गूंज सुनाई देती है शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर दत्त, अशफ़ाक़ उल्ला खां,  रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद जैसे महानायक युवाओं को प्रेरित करने के लिए आगे आ जाते हैं।

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इतिहास इनके अदम्य साहसिक  बलिदान को सुनहरे अक्षरों में सहेजे है। कुछ संघर्ष की कहानियां नहीं होती वो ऐसी वीर गाथाएं होती हैं जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता।  इतिहास की हर सदी उनकी कर्जदार रहती है। भारत माता के इन सपूतों की आवाज़ में वो दम था जिस से अंग्रेजी हुकूमत का सिंहासन इंकलाब जिंदाबाद के नारे से थर्रा उठता था। इंकलाब जिंदाबाद जिसका अर्थ है 'क्रांति अमर रहे' ने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इंकलाबी असर दिखाया।
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यूं तो स्वतंत्रता के संघर्ष में भारत के आसमान का रंग सुर्ख लाल 1905 से ही होना आरंभ हो चुका था और देश की युवा पीढ़ी ने आगे बढ़कर अंग्रेजों से लोहा लेने का काम शुरू कर दिया था। इस मोर्चे पर गरम दल गर्मजोशी से सबसे आगे रहा।  
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इंकलाब जिंदाबाद आम लोगों की जुबां तक तब पहुंचा जब

हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन ने अपने  सदस्यों भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को 8 अप्रैल 1929 ई. को केंद्रीय विधानसभा में उस समय दो बम तथा कुछ पर्चे फेंकने को कहा जब सभा में सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक (पब्लिक सेफ्टी बिल) तथा व्यापार विवाद विधेयक ( ट्रेड डिस्प्यूट बिल) पर बहस चल रही थी। फेंके गए पर्चों पर लिखा हुआ था, "बहरों को सुनाने के लिए बमों की आवश्यकता है।"  

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को ब्रिटिश हुकूमत ने गिरफ्तार कर लिया और उन पर केंद्रीय एसेंबली बम कांड और लाहौर षड्यंत्र कांड (1929) के तहत मुकदमा चलाया गया। अपनी गिरफ्तारी के दौरान भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त ने इंकलाब जिंदाबाद के नारे बुलंदी से लगाए और इंक़लाब जिंदाबाद के इस इंकलाबी नारे ने जल्द ही भारत के नौजवानों में अपना इंकलाबी वज़ूद कायम कर लिया।

उस इंकलाबी दौर में हर बच्चा, युवा और वयस्क की क्रांतिकारी भावना को और रफ्तार देने का काम किया इस इंकलाब जिंदाबाद के नारे ने। आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र कांड में अधिकांश क्रांतिकारियों को दोषी पाया गया। जिनमें से भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को 23 मार्च 1931 ई. को फांसी दे दी गई।

शायद ब्रिटिश हुकूमत ने इस क्रांति की ज्वाला को शांत कराने के लिए यह रास्ता सबसे आसान समझा होगा लेकिन उन्हें इन क्रांतिकारियों के हौसले नहीं मालूम थे। ब्रिटिश हुकूमत की जड़ें अब उखड़ने वाली थीं। फांसी के फंदे को चूमते हुए ये क्रांतिकारी नौजवान इंकलाब जिंदाबाद के नारे के साथ मुस्कुराते हुए गा रहे थे।

 

"दिल से निकलेगी न मर कर भी वतन की उल्फ़त,
मेरी मिट्टी से भी ख़ुश्बू - ए - वतन आएगी।

इंकलाब जिंदाबाद!

 


भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत के बाद इस इंकलाबी नारे ने अपने सफर को कारवां में तब्दील किया और जल्द ही ऐसी रफ़्तार भरी की भारतीयों का यह सबसे पसंदीदा नारा बनकर उभरा। हर वो युवा जो क्रांतिकारियों की श्रेणी में शामिल हुआ उसकी पहचान इंकलाब जिंदाबाद से हुई। भगत सिंह की शहादत के बाद इस इंकलाबी नारे ने भारतीयों को सोने न दिया। नारे की गूंज के साथ शहीदे आजम भगत सिंह और उस दौर के तमाम क्रांतिकारियों के क्रांतिकारी विचारों को देश के कोने कोने तक पहुंचाया।

इसका असर हमें तब भी दिखाई देता है जब 1931 में कराची में हुए कांग्रेस के विशेष अधिवेशन में महात्मा गांधी को काले झंडे दिखाकर भारतीयों ने अपना विरोध दर्ज कराया। संपूर्ण भारतवर्ष में भगत सिंह जिंदाबाद के साथ इंकलाब जिंदाबाद की गूंज सुनाई दी। सन 1929 से लेकर 1947 तक के आंदोलनों में इंकलाब जिंदाबाद का नारा सबसे क्रांतिकारी बना रहा।

फिर चाहे वो भारत छोड़ो आंदोलन (1942) हो या 1946 का रॉयल इंडियन नेवी विद्रोह या फिर तेभागा आंदोलन 1946-47, हो या जेपी आंदोलन 1974-75, इन आंदोलनों में विद्रोही नौसैनिकों, किसानों, छात्र छात्राओं और उनके समर्थकों द्वारा "इंकलाब जिंदाबाद" तथा "जय हिंद" के नारों में वही इंकलाबी जोश देखा जा सकता है। जो 1929 के दौर में रहा।


आज भी विभिन्न किसान, छात्र और श्रमिक आंदोलनों सहित अनेक लोकतांत्रिक आंदोलनों में यह नारा समय-समय पर बुलंद होता दिखाई देता है। क्रांति का पर्याय बने इस इंकलाबी नारे ने लोगों को अपने अधिकारों के प्रति जगाये रखने का काम आज भी जारी रखा है। निःसंदेह भविष्य की पीढ़ियां भी इस इंकलाबी नारे से प्रेरित होती रहेंगी।


इंकलाब जिंदाबाद!

जय हिंद!

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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