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अंधविश्वास की आड़ में कब तक होते रहेंगे अपराध? हम क्यों बाहर नहीं निकल पा रहे इस गर्त से

Devendra Sutharदेवेंद्र सुथार Updated Thu, 10 Oct 2019 10:07 AM IST
चिंताजनक है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारा समाज अंधविश्वास के गर्त से बाहर नहीं निकल पाए हैं।
चिंताजनक है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारा समाज अंधविश्वास के गर्त से बाहर नहीं निकल पाए हैं। - फोटो : pixabay
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अंधविश्वास के नाम पर दी जाने वाली नरबलियों और डायन-बिसही के नाम पर किए जाने वाले उत्पीड़न-हत्याओं की खबरें आए दिन मीडिया में छायी रहती हैं। देश के तमाम हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आती रहती हैं। हाल में ही ओडिशा के गंजम जनपद में एक ऐसा ही मामला सामने आया। जहां जादू-टोना करने के शक में कुछ लोगों ने 6 दलित बुजुर्ग व्यक्तियों के दांत तोड़ दिए और उन्हें मानव मलमूत्र खाने को मजबूर किया।
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वहीं थोड़े दिनों पहले ओडिशा में ही एक गरीब महिला को चुड़ैल कहकर मौत के घाट उतार दिया गया था। एक ओर हमारा देश न्यू इंडिया के नारे के साथ तरक्की के नए सोपान तय कर रहा है, तो दूसरी ओर देश में महिला सशक्तिकरण के बावजूद महिलाओं को डायन बताकर मारने व पीटने से लेकर उनकी हत्या करने तक की घटनाओं में कमी नहीं आ रही है। समाज का दोहरा मापदंड है कि एक ओर तो वह नारी को देवी बताकर उनकी पूजा करते नहीं थकता, तो दूसरी ओर डायन बताकर उनके साथ दुर्व्यवहार करने से भी पीछे नहीं हटता। सच्चाई है कि समाज एक तबका आज भी पुराने जमाने के जादू-टोने की गलफत भरी दुनिया में ही जी रहा है। 

आजादी के सात दशक बाद भी हम अंधविश्वास की गर्त से बाहर नहीं निकल पाए
चिंताजनक है कि आजादी के सात दशक बाद भी हमारा समाज अंधविश्वास के गर्त से बाहर नहीं निकल पाए हैं। कहने को तो हमारे देश की साक्षरता 74 प्रतिशत है लेकिन इसके विपरीत आए दिन अंधविश्वास के नाम पर घटित होने वाली प्रताड़ना व मारपीट की घटनाएं हमारे देश के खोखले विकास की पोल खोलकर रख देती है। ये अजीब कशमकश है जिसमें हमारा समाज और देश पीसता जा रहा है।

सोचने की बात तो यह है कि समय के साथ विज्ञान के विकास के बाद जिस आडंबर और अंधविश्वास का अंत होना चाहिए था, वो अब तक नहीं हो सका है। दुःख इस बात का है कि आधुनिक व शिक्षित पीढ़ी भी इसका अंधानुकरण करती जा रही है। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो की रिपोर्ट बताती है कि 2001 से लेकर 2014 तक देश में 2290 महिलाओं की हत्या डायन बताकर कर दी गई। 2001 से 2014 तक डायन हत्या के मामलों में 464 हत्याओं में झारखंड अव्वल रहा तो ओडिशा 415 हत्याओं के साथ दूसरे स्थान पर है। वहीं 383 हत्याओं के साथ आंध्र प्रदेश तीसरे स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, 1987 से लेकर 2003 तक 2556 महिलाओं की हत्या डायन के शक पर कर दी गई है। रिपोर्ट बताती है कि हर साल कम से कम 100 से लेकर 240 महिलाएं डायन बताकर मार दी जाती हैं। 
 
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