बंगाल चुनाव परिणाम 2021: क्या अब ममता बनर्जी में वामपंथी अपना असली विकल्प देख रहे हैं?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
पश्चिम बंगाल को लेकर चर्चाएं बदस्तूर जारी हैं। एक अकेली और बेहद मजबूत महिला मुख्यमंत्री के खिलाफ 'दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी' ने अपनी पूरी ताकत झोंकी, कोई नेता बाकी नहीं रहा, शब्दों की कोई मर्यादा टूटनी बाकी नहीं रही, बंगाली अस्मिता, संस्कृति और भाषा को लेकर कोई 'खेला' बाकी नहीं रहा।
इस भीषण कोरोना काल में चुनावी सभाओं के दौरान ममता बनर्जी के बारे में तमाम आपत्तिजनक लहजे और भाषा का इस्तेमाल हुआ और पूरी मशीनरी लगी रही, लेकिन 200 सीटें जीतने का दावा करने वाली पार्टी को इस बात से खुश होना पड़ रहा है कि चलो सत्ताधारी नहीं, तो कम से कम मुख्य विपक्षी तो बने। जहां तीन थे वहां 25-30 गुना तो बढ़ गए। ये तरक्की भी कोई कम नहीं। कम्युनिस्टों की बची खुची जमीन तो खत्म कर दी। कैसे धीरे धीरे वामपंथ का सफाया कर दिया। अब तो मैदान में सिर्फ दो ही रहेंगे। अगली बार का अगली बार देखेंगे।
वामपंथ का भविष्य
तो क्या वामपंथ का सफाया हो गया? केरल को देखकर तो कम से कम ऐसा नहीं कहा जा सकता। बंगाल में 71 से 1 तक आ पहुंचा वामपंथ इस बार भी जब चुनावी रैलियां करता है तो सड़कें लाल झंडों से पट जाती हैं। हाल ही में देश ने देखा। कोलकाता की सड़कें किस तरह लाल दस्तों से पटी पड़ी थीं, लेकिन नतीजे तो कुछ और आए। कहां गए वो लाल दस्ते। क्या वो भीतर ही भीतर ममता बनर्जी के साथ चले गए।
जिस तरह तृणमूल का वोट प्रतिशत बढ़ा है उससे तो ये साफ हो ही गया है कि कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन बंगाल में महज एक रस्मी गठबंधन था। उनके भीतर की ख्वाहिश यही थी कि चाहे जो हो, दक्षिणपंथियों या यूं कहें कि भाजपा को बंगाल में नहीं आने देना है। वो देश का हाल देख रहे हैं। देश में विपक्ष का हाल देख रहे हैं।
ऐसे में बंगाल उनके लिए इस मायने में सबसे बड़ा और चुनौतीभरा बैटलफील्ड रहा है जहां कम से कम ममता बनर्जी के रूप में एक दमदार विपक्षी चेहरा है। एक ऐसा जुझारू चेहरा जिसके भीतर मजबूती के साथ लड़ने और अपने दम पर बड़े से बड़े नेताओं से टक्कर लेने की क्षमता है।
1970 में जब कोलकाता के जोगमाया देवी कॉलेज में वो पढ़ती थीं, तभी उन्होंने छात्र परिषद की स्थापना की। वैचारिक रूप से कांग्रेस से जुड़ी रही थीं और तब बंगाल में नक्सलबाड़ी आंदोलन का दौर था। तब ममता की उम्र थी महज पंद्रह साल। बचपन में पिता के जल्दी निधन के बाद संघर्ष कर मां की मदद की और भाई-बहन को पढ़ाया लिखाया और खुद भी पढ़ती रहीं।
मोदी जी चाय बेचने के लिए मशहूर हैं, लेकिन ममता बनर्जी ने बचपन में परिवार का खर्च चलाने के लिए दूध बेचने का काम किया, लेकिन उन्होंने कभी अपनी गरीबी और ऐसे कठिन जीवन की सार्वजनिक मंचों पर चर्चा नहीं की। सत्ता के शीर्ष पदों पर रहने, केन्द्रीय मंत्री रहने और दस साल से बंगाल की मुख्यमंत्री रहने के बावजूद उन्होंने कभी अपनी जीवनशैली में कोई बदलाव नहीं किया, एक सामान्य साड़ी, हवाई चप्पल और बेहद सादगी के साथ आम आदमी की तरह रहीं और अपने भीतर के संवेदनशील कवि और पेंटर के साथ ही एक कलाकार को जिंदा रखा।
जमीन से जुड़ी हैं ममता
जाहिर सी बात है आज जिस बंगाल की संस्कृति की बात होती है, वहां की परंपराओं की बात होती है, उससे ममता जिस गहराई और मजबूती से जुड़ी हैं और जीवन के संघर्षों से तपकर जिस तरह उन्होंने अपने जीवन में सही अर्थों में कम्युनिज्म को उतारा है, वह बड़े बड़े तथाकथित कम्युनिस्टों को प्रेरणा देता है।
इसलिए सवाल ये नहीं है कि ममता बनर्जी कांग्रेसी रही हैं या तृणमूल कांग्रेसी, मूल बात ये है कि उन्होंने बचपन से संघर्ष देखा है, जमीन से जुड़ी रही हैं, वामपंथ के मूल सिद्धांतों को समझा और पढ़ा है। बेशक कालेज के दिनों में उन्होंने छात्र परिषद बनाई हो, लेकिन उनके मूल में तबके वामपंथी छात्र संगठन का चेहरा भी था।
जाहिर है 1977 में पश्चिम बंगाल में ज्योति बसु की वामपंथी सरकार के आते आते ममता बनर्जी ने खूब पढ़ा, इतिहास में ऑनर्स किया, इस्लामी इतिहास में मास्टर्स किया, शिक्षा और कानून की डिग्री ली, पेंटिंग करती रहीं, कविताएं लिखती रहीं और राजनीति में एक मुखर नेता के तौर पर उभर कर सामने आईं। उन्होंने लेफ्ट को खूब पढ़ा, मार्क्स को पढ़ा, लेनिन को पढ़ा और भारतीय संदर्भों में वामपंथी आंदोलन का इतिहास और वर्तमान पढ़ा और देखा। उन्होंने काडर आधारित पार्टी की ताकत को समझा और लेफ्ट को उन्हीं की रणनीति से मात दी।
ऐसे रचा इतिहास
सबसे पहले 1984 में दिग्गज वामपंथी सोमनाथ चटर्जी को हराकर सबसे युवा महिला सांसद बनकर इतिहास रचा और फिर 2011 में उसी लेफ्ट की सत्ता को उखाड़ फेंका, जिसने 34 साल बंगाल पर राज किया, जिसके दिग्गजों में ज्योति बसु से लेकर बुद्धेव भट्टाचार्य रहे, लेकिन इस युवा और सबसे जुझारू नेता ने वामपंथ की निचली कतारों को हमेशा से प्रभावित किया।
इसी वजह से कांग्रेस से अलग होते ही नई पीढ़ी के वामपंथियों के लिए ममता भीतर ही भीतर आदर्श रहीं और चुनावों में परंपरागत लेफ्ट सिमटता चला गया। और इस बार तो ये एकदम साफ हो गया कि बंगाल ही नहीं इस वक्त केन्द्र की दक्षिणपंथी सरकार के खिलाफ अगर सचमुच कोई एक मजबूत विपक्ष बन सकता है तो वो ममता बनर्जी ही है।
जाहिर है दक्षिणपंथ के इस उभार से त्रस्त लेफ्ट के लिए और यहां तक कि बेबस हो चुकी कांग्रेस के लिए भी अब उनका साथ देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। सब फिलहाल अपनी वजूद की लड़ाई लड़ रहे हैं। कांग्रेसी, समाजवादी या विपक्ष के नाम पर सियासत करने वाली कोई भी पार्टी एक डरी सहमी सी हालत में है।
उनके भीतर अपने पुराने कुकर्मों और भ्रष्टाचार को लेकर मोदी सरकार ने पहले से ही एक डर बैठा दिया है, जाहिर है उनकी राजनीति इसलिए सिमटती चला जा रही है। लेकिन ममता बनर्जी बेदाग हैं, ईमानदार हैं और निडर हैं, ऐसे में वामपंथ भी उन्हें भीतर ही भीतर ही अपना चेहरा मानने लगा है। जाहिर है बंगाल की जीत का ये एक अहम मायना है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।