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Varahamihir Observatory: डोंगला स्थित वराहमिहिर वेधशाला अद्भुत और अकल्पनीय खगोलीय केंद्र

Fri, 20 Jun 2025 03:44 PM IST
Anil Vaishya Anil Vaishya
Updated Fri, 20 Jun 2025 03:44 PM IST
सार

डोंगला को खगोल विज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करने में कई संस्थानों का योगदान है। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय ने भी अपने खगोल एवं भौतिकी विभाग को इस वेधशाला से जोड़ा।

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Varahamihir Observatory located in Dongla is a wonderful and unimaginable astronomical center
डोंगला स्थित वराहमिहिर वेधशाला (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

मध्यप्रदेश की धार्मिक और ऐतिहासिक नगरी उज्जैन के डोंगला में स्थित वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला कोई साधारण लैबोरेट्री नहीं बल्कि यह अद्भुत और अकल्पनीय खगोलीय केंद्र है। इसे मध्यप्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद (MPCST) ने स्थापित किया था। इस वेधशाला में 20-इंच व्यास वाली ऑटोमेटिक प्लेनवेव (PlaneWave) दूरबीन लगाई गई।

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यह प्लेनवेव सौर, तारों का विशेष अध्ययन करती है। इसमें बड़े प्रारूप के सीसीडी कैमरे जैसे आधुनिक उपकरण लगे हैं। यह छोटी से छोटी खगोलीय घटना को भी पकड़ लेते हैं। इस वेधशाला के परिसर में परम्परागत् भारतीय ज्योतिषीय यंत्रों के साथ-साथ एक ऊंचा टावर, गुंबद वाला आधुनिक दूरबीन गृह भी है। 
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इस वेधशाला की एक और खास बात है कि यह कर्क रेखा और प्राचीन शून्य देशांतर रेखा के विचलन बिंदु के पास है। इससे इसका महत्व और भी बढ़ जाता है। इसी वजह से खगोलशास्त्री यहां आना पसंद करते हैं। बता दें, इस वैधशाला का श्रेय प्रसिद्ध पुरातत्वविद् डॉ. विष्णु श्रीधर वाकणकर को जाता है। उनका ही मानना था कि पृथ्वी की दीर्घकालीन घूर्णन धुरी में परिवर्तन हो गया है, इसलिए उज्जैन में होने वाला शून्य देशांतर-रेखा और कर्क रेखा का मिलन उत्तर की खिसककर डोंगला में होने लगा है। इसी वजह से इस वेधशाला का निर्माण डोंगला में किया गया। डॉ. वाकणकर (1919–1988) ने उज्जैन क्षेत्र में गहन सर्वेक्षण किया था।
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उन्होंने अपनी टीम के सदस्यों को “शंकु” (छड़ी जैसे खगोलीय यंत्र) लेकर विभिन्न स्थानों पर भेजा था। ताकि, इस नए बिंदु का सटीक निर्धारण किया जा सके। शंकु की सहायता से उन्होंने कर्क रेखा की नई स्थिति का पता लगाया। इसके बाद उन्होंने डोंगला में आकर घोषणा की थी- 

“मैंने वह स्थान खोज लिया है जिसे मैं खोज रहा था”। उनकी इस खोज ने साबित किया कि कालांतर में उज्जैन का प्राचीन खगोलीय गौरव डोंगला के रूप में पुनर्स्थापित हो रहा है। 

 


अद्भुत यंत्रों से सजी वेधशाला

डोंगला को खगोल विज्ञान केंद्र के रूप में स्थापित करने में कई संस्थानों का योगदान है। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय ने भी अपने खगोल एवं भौतिकी विभाग को इस वेधशाला से जोड़ा। साल 2023-24 में आज़ादी के 75 वर्ष (आजादी का अमृत महोत्सव) के उपलक्ष्य में भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय ने डोंगला वेधशाला को विशिष्ट केंद्र के रूप में रेखांकित किया।

साल 2024 में मध्यप्रदेश सरकार ने एक राष्ट्रीय संगोष्ठी भी आयोजित की थी। इसमें डोंगला वेधशाला के उपकरणों को और उन्नत बनाने तथा उसे शोध एवं शिक्षा के व्यापक मंच के रूप में विकसित करने पर चर्चा हुई। वराहमिहिर खगोलीय वेधशाला की में भास्कर, शंकु और भित्ति जैसे परंपरागत यंत्रों की स्थापित किया गया। बता दें, इस वेधशाला को जयपुर के महाराजा सवाई जयसिंह ने 18वीं सदी में निर्मित किया था।

उन्होंने यहां “सम्राट यंत्र” (विशाल सूर्य घड़ी), “नाड़ी वलय यंत्र”, “दिगंश यंत्र” एवं “भित्ति यंत्र” जैसे उपकरण स्थापित किए थे। वेधशाला में स्थित भास्कर यंत्र गोलाकार यंत्र है। इसके केंद्र से होकर एक रॉड गुजरती है, जो पृथ्वी के अक्षीय झुकाव के समकोण पर सेट है।

यह धुरी ध्रुव तारे की सीध में दर्शाई गई है। ताकि, रात को इसमें से देखने पर ध्रुव तारा दिखाई देता है। भास्कर यंत्र का प्रयोग पृथ्वी के अक्षीय झुकाव को प्रदर्शित करने और ध्रुव तारे की स्थिति दर्शाने के लिए किया जाता है। यह यंत्र खगोलीय गोलांश (Celestial sphere) की अवधारणा को प्रायोगिक रूप में समझने में सहायक है। इसकी रॉड पृथ्वी के अक्ष के झुकाव (लगभग 23.5°) के कोण पर स्थापित की गई है। 


क्या करता है शंकु यंत्र?

शंकु यंत्र मूलतः एक लंबी सीधी छड़ी है। इसका प्रयोग सूर्य की छाया से समय तथा स्थान-निर्धारण के लिए किया जाता है। इसे नोमोन (gnomon) भी कहते हैं। भारतीय ज्योतिषियों ने प्राचीन काल से शंकु का प्रयोग अपराह्न छाया के आधार पर दोपहर का समय, दिन का अंश तथा भू-स्थान का अक्षांश निर्धारित करने में किया है।

डॉ. वाकणकर ने कर्क रेखा की सही स्थिति मापने के लिए इसी यंत्र का सहारा लिया था। उन्होंने विभिन्न स्थानों पर दल भेजकर शंकु गाड़े और सूर्य छाया के अध्ययन से यह तय किया कि वर्ष के सबसे बड़े दिन (ग्रीष्म अयनांत) पर सूर्य किस स्थान पर सर्वोच्चाद्र्ध (ज़ेनिथ) पर आता है। शंकु यंत्र दिखने में अत्यंत सरल है, लेकिन इसका वैज्ञानिक महत्व गहरा है। 


पंचांग के लिए जरूरी सूचनाएं तैयार करता है यह यंत्र

भित्ति यंत्र: एक स्थिर दीवार के रूप में स्थित है। इसे सटीक उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थापित किया गया है। दीवार पर डिग्री और घड़ियों (Arc minutes) के सूक्ष्म चिन्ह अंकित हैं। दीवार के तल में समतल समकोण बना हुआ है। जब कोई खगोलीय पिंड (जैसे सूर्य, चन्द्रमा या कोई तारा) ठीक दक्षिण या उत्तर मेरिडियन पर आता है (यानि चरम ऊंचाई पर), तब उसकी छाया या प्रतिबिंब भित्ति यंत्र के पैमानों पर पड़कर उसकी ऊंचाई (Altitude) या अंतरिक्षीय दूरी मापी जाती है।

भित्ति यंत्र का मुख्य प्रयोग खगोलीय पिंडों की मध्याह्न उंचाई मापकर पंचांग के लिए जरूरी सूजनाएं तैयार करना है। इन प्रमुख यंत्रों के अतिरिक्त उज्जैन की वेधशाला में “सम्राट यंत्र” (सबसे बड़ा सूर्य घड़ी यंत्र) भी है। यह समय के घंटे, मिनट बताने में सक्षम है। इसका आकार विशाल त्रिभुजाकार संरचना है।

इसे हम इंसान की बनाई गई विशाल घड़ी भी कह सकते हैं। जैसे-जैसे सूर्य आसमान में चलता है, उसकी छाया सम्राट यंत्र के अंकित पैमानों पर सरकती जाती है। इस तरह यह स्थानीय सौर समय बताती है। डोंगला वेधशाला में छात्रों को ये यंत्र दिखाकर प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक पद्धति की शिक्षा दी जाती है।


यहां होता है शून्य देशांतर और कर्क रेखा का मिलन

देश में उज्जैन अपना एक अलग महत्व रखता है। खगोलशास्त्र में उज्जैन को भौगोलिक “शून्य” बिंदु माना गया है। यानी माना जाता है कि 0° देशांतर (प्राइम मेरिडियन) की रेखा उज्जैन से होकर गुजरती है। साथ ही, कर्क रेखा (23°26′ उ.अ.) को हिंदू ज्योतिष में विशेष महत्व प्राप्त है, क्योंकि इसी अक्षांश रेखा पर सूर्य वर्ष में एक बार शीर्ष पर आता है। स्कंदपुराण के अवन्ती खण्ड सहित कई ग्रंथों और ज्योतिष-ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि उज्जैन ऐसा स्थान है जहां कर्क रेखा और शून्य देशांतर रेखा एक-दूसरे को काटती हैं। उज्जैन स्थित “कर्क राजेश्वर” नामक एक प्राचीन मंदिर इसी खगोलीय संधि-स्थल के दैवीकरण का प्रतीक है।

कर्क राजेश्वर मंदिर उस बिंदु के निकट स्थित है जिसे परंपरागत् रूप से कर्क रेखा और शून्य देशांतर के प्रतिच्छेद के रूप में जाना जाता था। अयनचल (प्रीसेशन) की दीर्घकालीन प्रक्रिया के कारण सहस्राब्दियों में इस प्रतिच्छेद बिंदु की स्थिति बदलती रहती है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार समय के साथ कर्क रेखा थोड़ी उत्तर की ओर खिसक चुकी है। इसलिए वर्तमान युग में यह काल्पनिक मिलन बिंदु उज्जैन से लगभग 30 किमी उत्तर की ओर स्थानांतरित हो गया है।


पंचांग निर्माण में सहायक

डोंगला की यह वेधशाला राष्ट्रीय पंचांग निर्माण में सहायता करती है। साल 1942 से वेधशाला द्वारा हर साल राष्ट्रीय पंचांग प्रकाशित करती है। इसमें ग्रह-नक्षत्रों की स्थिति, पर्व-त्योहारों के सूचक तथा कालगणना के लिए आवश्यक विवरण होते हैं। हिंदू पंचांग आज भी उज्जैन को मानक मेरिडियन मानकर समय-अंतर की गणना करता है।

महाराष्ट्र सहित कई राज्यों में प्रचलित कैलेंडर “काल निर्धारण (कालनिर्णय)” भी उज्जैन आधारित समय और तिथियों का प्रयोग करता है। इन तथ्यों से स्पष्ट है उज्जैन की कालगणना परंपरा में सूर्य सिद्धांत का महत्व और उज्जैन मेरिडियन की व्यवहारिक भूमिका आज भी प्रासंगिक हैं।




डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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