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वैलेंटाइन डे विशेष: प्रेम-उपहार से इतर वैलेंटाइन डे की दारुण-क्रूर कथा

Sat, 14 Feb 2026 12:16 PM IST
Dr. Vijay Sharma डॉ. विजय शर्मा
Updated Sat, 14 Feb 2026 12:16 PM IST
सार

आधुनिक ‘वैलेंटाइन डे’ समारोह बाजार की उपज है, पर लोग इसकी वास्तविक दारुण-क्रूर कहानी को याद नहीं करना चाहते हैं। क्या है इसके पीछे की कहानी...

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valentine day special dark origins of Valentine Day saint valentine role
वैलेंटाइन डे और इसके पीछे की कहानी - फोटो : adobe stock

विस्तार

उत्सवधर्मी जीव प्रतिदिन समारोह का कोई-न-कोई अवसर खोज लेता है। फरवरी आते वह प्रेम, गुलाब, गुलाबी उपहार, चॉकलेट, आभूषण के सपनों में खो जाता है। आधुनिक ‘वैलेंटाइन डे’ समारोह बाजार की उपज है। अब यह हुए एक दिन से खिंचते हुए एक सप्ताह का बन गया है, कल शायद और लंबा हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं।

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इसके पीछे स्टेनरी, चॉकलेट, फूल एवं आभूषण जैसे उपहारों के करोड़ों के बाजार का खेल है। लोग इसकी वास्तविक दारुण-क्रूर कहानी को याद नहीं करना चाहते हैं। आज उसी की बात पहले की जाए।
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बच्चे पैदा होना मतलब जीवन की निरंतरता। अगली पीढ़ी का मतलब है, विरासत का सुरक्षित रहना। अगर आज के नारों के विरुद्ध सरकारी आदेश बच्चे न पैदा करने का हो, तो समाज का क्या होगा? अतीत में एक बार ऐसा हुआ। रोम में क्लाउडियस द्वितीय (268-270) ने सेनिकों के लिए विवाह-निषेध कर दिया था, हलचल मच गई। राजाज्ञा को न मानने का मतलब था, जिंदगी से हाथ धोना, लेकिन प्रतिवाद हुआ। एक युवा पादरी ने इस निषेधाज्ञा के विरुद्ध काम किया। पादरी वैलेन्टाइन ने इसका विरोध किया। प्रेमियों की बन आई। चोरी-छिपे विवाह होने लगे। पर इश्क-मुश्क छिपाए नहीं छिपता है, बात खुल गई।
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क्लाउडियस द्वितीय का हुक्म हुआ, वैलेंटाइन को गिरफ्तार कर उसकी संगसारी हो, उसका सिर धड़ से जुदा कर दिया जाए। पैगन राज था, जेलर एस्टेरियुस ने वैलेंटाइन की ईसाई आस्था की परख हेतु वैलेंटाइन को चुनौती दी। वैलेंटाइन को अपनी जन्मजात अंधी बेटी जुलिया की आंखें ठीक करने को कहा। आश्चर्य! और लो जादू हुआ! लड़की को दृष्टि मिल गई! वैलेंटाइन की आस्था ने कमाल किया।

मगर खूनी कहानी यहीं समाप्त नहीं होती है। जूलिया को जिंदगी देखने की आंखें मिलीं, उन्हीं आंखों से उसने नव-जीवन, आंखें देने वाले वैलेंटाइन को देखा। न केवल देखा, आंखों के एवज में उसे अपना दिल दे बैठी। पर वैलेंटाइन की किस्मत तो लिखी जा चुकी थी। सम्राट के हुक्म से उसकी हत्या हुई।

14 फरवरी 269 एडी को उसे पत्थरों से कुचल डाला गया, उसका सिर धड़ से जुदा कर दिया गया। मरने के पहले उसने जूलिया को विदा-पत्र लिखा। जिसका अंत था, ‘तुम्हारा वैलेंटाइन।’ जूलिया ने वैलेंटाइन की स्मृति में गुलाबी फूलों वाला बादाम का पेड़ लगाया, तब से गुलाबी फूल विशुद्ध प्रेम का प्रतीक बन गए।

वैलेंटाइन डे से जुड़ी कहानी

‘वैलेंटाइन डे’ से जुड़ी एक अन्य कहानी भी प्रचलित है। कहा जाता है, पहले क्लौडियस द्वितीय रोम के वैलेंटाइन को खूब पसंद करता था, बाद में जब उसने सम्राट के धर्म परिवर्तन का प्रयास किया, तो उसे रोम का कानून तोड़ने के लिए मरवा दिया। इसी से मिलती-जुलती कहानी टेर्नि (इटली) के बिशप के बारे में भी खूब प्रचलित है।

वह भी क्लाउडियस द्वितीय काल में हुआ था, उसने भी बीमार को अपने जादूई स्पर्श से चंगा किया, उसे भी मरवा दिया गया। शायद यह पैगन और ईसाई के द्वंद्व का नतीजा था। दोनों वैलेंटाइन ईसाई धर्म प्रचारक थे।

आगे की रोचक कहानी भी जानिए। वैलेंटाइन की कब्र रोम के बाहर विआ फ्लामिनिआ नामक स्थान पर है, उसे ‘सेंट वैलेंटाइन’स गेट’ के नाम से जाना जाता है। मध्य काल में यह कब्र तीर्थ स्थान बन गई। लेकिन हाल में पोप पॉल छठवें ने 1969 में फिर बाद में दूसरे वतिकन कौंसिल के समय सेंट वैलेंटाइन को कैथोलिक कैलेंडर से हटा दिया गया। कारण थे, वैलेंटाइन के पैगन मूल इतिहास की शंकाएं। चर्च यहीं नहीं रुका, उसने 14 फरवरी को विभिन्न संत के आह्वान केलिए समर्पित कर इसे ‘संत तिथि’ बना दिया। साथ ही यह भी तय हुआ कि इससे जुड़ कर कोई उत्सव-समारोह नहीं होना चाहिए।

वैलेंटाइन एवं वैलेंटीना नाम ईसाइयों में बहुत प्रचलित है। चर्च करीब 12-14 संत वैलेंटाइन को मान्यता देता है। इसमें क्लौडियस द्वितीय के काल रोम के दो वैलेंटाइन भी शामिल हैं। और स्पेनिश साधु, वैलेंटीना नामक एक स्त्री तथा अफ्रीका का बहुत कम चर्चित वैलेंटाइन भी शामिल है।

आज प्राचीन रोमन शहीद वैलेंटाइन के नाम पर एक खोपड़ी प्रदर्शित है। अब यह खोपड़ी उसकी है, या नहीं यह विवाद का विषय रहा है। हम अपनी कहानी को और आगे बढ़ाते हैं। हुआ यूं कि बाद में पोप गेलासियस प्रथम ने उसकी शहादत के दिन 14 फरवरी को ‘वैलेंटाइन’स डे’ घोषित कर दिया। और इस तरह आज का यह प्रचलित त्योहार उत्सुकता, रहस्य, किंवदंती का मिलाजुला रूप है। थोड़ा और आगे बढ़ें।

कुछ साल पहले पोप फ्रांसिस ने चर्च का वैलेंटाइन से समझौता कराते हुए, दुनिया भर के जोड़ों को शादी का दावा करने केलिए प्रतीकात्मक रूप से 14 फरवरी का आयोजन किया। जोड़े इसे मनाने लगे। अब सब मनाते हैं।

इस तरह पैगन लोगों केलिए एक ईसाई ‘वैलेंटाइन’स डे’ की परम्परा प्रारंभ हुई और आज सारी दुनिया इसकी गिरफ्त में है। आज उन देशों में, उन लोगों द्वारा भी यह दिन मनाया जाता है, जो क्रिश्चिनिटी को जी-जान से खारिज करते हैं। भारत में मनाया जा रहा है। सउदी अरबिया में जहां छुट्टी गैरकानूनी है, वहां भी फरवरी में चोर बाजार लाल गुलाब, दिल के आकार के चॉकलेट, आभूषणों से गुलजार रहता है। इस दिन फिलिपींस में सरकार प्रायोजित मास वेडिंग होती है।

धर्म से उठ कर यह साहित्य में भी आ गया। साहित्य में इसे लाने का श्रेय जेफ्री चौसर को जाता है। चौसर का इन रोमन शहीदों से कुछ लेना-देना नहीं है। उसका संबंध इंग्लिश भाषा एवं साहित्य से है। उसने 14वीं सदी में अपनी कविता ‘पार्लेमेंट ऑफ फौउल्स’ (पक्षी-सभा) में सेंट वैलेंटाइन तथा प्रेमोत्सव को जोड़ दिया।

उसकी कविता की प्रसिद्द पंक्ति है, ‘For this was on Saint Valentine's Day, / When every fowl cometh there to choose his mate’ (यह हुआ सेंट वैलेंटाइन’स डे को/ जब हर पक्षी आया चुनने मिलन को)। इसके पूर्व यह समारोह न था, अब यह रोमांटिक प्रेम का दिन बन गया। माना जाता है, यह उसने यह कविता इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द्वितीय एवं बोहेमिया की एन की सगाई के सम्मान पर रची थी।

भारतीय तो वैसे भी उत्सव प्रिय लोग हैं। प्रेमी-प्रेमिका हों, न हों, खूब मनाइए रोज़ डे! प्रपोज़ डे! चॉकलेट डे! टेडी डे! प्रॉमिस डे! हग डे! एवं किस डे! वैलेंटाइअन डे! खूब खुश रहिए! दूसरों को खूब खुश रखिए। सकारात्मकता फैलाइए!


सबको वैलेंटाइन’स डे की शुभकामनाएं!


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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