उत्तराखण्ड की हलचल: 21 साल, 11 सीएम, आखिर कब मिलेगा हिमालयी राज्य को स्थिर सीएम?
9 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आने के बाद 21 सालों में उत्तराखण्ड में नित्यानन्द स्वामी से लेकर नवीनतम् पुष्कर सिंह धामी तक 11 मुख्यमंत्री बन गए हैं।
नारायण दत्त तिवारी के अलावा कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। उत्तराखण्ड के ही साथ अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसे नेता 15 साल तक निरन्तर शासन करते हैं।
लेकिन अब तो यहां चार महीने में ही मुख्यमत्रियों की कुर्सियां जाने लगी हैं। जबकि किसी भी सरकार से कम से कम पांच साल का कार्यकाल पूरा करने की अपेक्षा की जाती है ताकि उसे जनहित में काम करने का पर्याप्त समय मिल सके।
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निरन्तर और सुनियोजित विकास के लिए किसी भी प्रदेश के लिए एक स्थिर मजबूत सरकार की नितांत आवश्यकता होती है। लेकिन जहां मुख्यमंत्रियों का अपना ही भविष्य अनिश्चित हो और जिनका ध्यान अपनी कुर्सी बचाने पर ही केन्द्रित हो उनसे प्रदेश के बेहतर भविष्य के लिए दूरददर्शी, सुविचारित और सुदृढ़ निर्णय लेने की उम्मीद कैसे की की जा सकती है।
हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड के समक्ष हिमालय जैसी समस्याएं मुंह बांये खड़ी हैं, मगर उनसे पार पाने के लिए यह राज्य कम से कम पांच साल तक एक मजबूत इरादों वाली मजबूत सरकार के लिए तरस गया है।
नारायण दत्त तिवारी के अलावा कोई भी मुख्यमंत्री पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। उत्तराखण्ड के ही साथ अस्तित्व में आए छत्तीसगढ़ में रमन सिंह जैसे नेता 15 साल तक निरन्तर शासन करते हैं। लेकिन अब तो यहां चार महीने में ही मुख्यमत्रियों की कुर्सियां जाने लगी हैं। जबकि किसी भी सरकार से कम से कम पांच साल का कार्यकाल पूरा करने की अपेक्षा की जाती है ताकि उसे जनहित में काम करने का पर्याप्त समय मिल सके।
शतरंज की गोटियों की तरह चलाए गए मुख्यमंत्री
9 नवम्बर 2000 को अस्तित्व में आने के बाद 21 सालों में उत्तराखण्ड में नित्यानन्द स्वामी से लेकर नवीनतम् पुष्कर सिंह धामी तक 11 मुख्यमंत्री बन गए हैं। मजेदार बात तो यह है कि उत्तराखण्ड में सरकारों को विपक्ष से नहीं बल्कि सत्ताधारी दलों के अंदर से उत्पन्न हुआ। राज्य में भुवनचन्द्र खण्डूड़ी दो बार मुख्यमंत्री बने जबकि हरीश रावत एक बार शपथ लेने के बाद 2 बार आए-गए हुए। जबकि समकालीन राज्य छत्तीसगढ़ में इन 21 सालों में केवल दो नेताओं ने प्रदेश की बागडोरी संभाली है।
सवाल उठना स्वाभाविक ही है कि जब शासन ही स्थिर न हो तो उसका प्रशासन भी कैसे सुचारू रूप से चलेगा? इस साल राज्य में बजट त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने बनाया जिसे खर्च करने की जिम्मेदारी तीरथ रावत को सौंपी गई लेकिन जब तक वह प्रदेश के विकास की जरूरतें समझते तब तक उन्हें हटा कर शतरंज की गोटी की तरह पुश्कर धामी को मोर्चे पर लगा दिया।
हिमाचल में 50 साल में 6 मुख्यमंत्री
सन् 1971 से लेकर 2021 तक के 50 सालों में उत्तराखण्ड के पड़ोसी राज्य हिमाचल प्रदेश में केवल 6 मुख्यमंत्रियों का शासन रहा। इनमें डॉ. यशवन्तसिंह परमार, ठाकुर राम लाल, शान्ता कुमार एवं प्रेम कुमार धूमल दो-दो बार तथा वीरभद्र सिंह 5 बार हिमाचल के मुख्यमंत्री रहे। वर्तमान में जयराम ठाकुर हिमाचल के 13 वें मुख्यमंत्री अवश्य हैं, मगर वह यह पद सम्भालने वाले केवल छठे नेता हैं। जबकि उत्तराखण्ड में एक ही विधानसभा के पांच साल के कार्यकाल में तीन-तीन मुख्यमंत्रियों की सरकारें आ गईं।
नारायण दत्त तिवारी के अलावा कोई भी मुख्यमंत्री अब तक पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया। राष्ट्रीय दलों द्वारा निर्वाचित विधायकों के संवैधानिक अधिकारों का हनन कर शतरंज के मोहरों की तरह मुख्यमंत्री उतारे जा रहे हैं। राज्य में राजनीतिक अवसरवाद, पद लोलुपता तथा गिरगिट की तरह राजनीतिक सिद्धान्त और प्रतिबद्धता बदले जाने के कारण देवभूमि के नाम से भी पहचाने जाने वाला उत्तराखण्ड राजनीतिक अस्थिरता के दलदल में धंसता चला गया।
राज्य गठन के साथ ही शुरू हुई कुर्सी की खींचातानी
दरअसल, उत्तराखण्ड की राजनीति की जमीन पर अस्थिरता के बीज उसी दिन पड़ गए थे जबकि नित्यानन्द स्वामी ने पहली नवम्बर 2000 की पहली बेला पर नए राज्य की बागडोर संभालने के बाद 10 नवम्बर 2000 को अपने मंत्रिमण्डल का गठन किया था। उस दिन भगत सिंह कोश्यारी, नारायण रामदास और रमेश पोखरियाल निशंक जैसे वरिष्ठ नेताओं ने शपथग्रहण का वहिष्कार कर दिया था। हालांकि, उन तीनों के लिए अलग से 11 नवम्बर को दूसरी बार शपथ ग्रहण समारोह आयोजित करना पड़ा।
इन तीन नेताओं के अलावा टिहरी के विधायक लाखीराम जोशी भी मंत्रिमण्डल में उन्हें शामिल न किए जाने से मुख्यमंत्री का खुल कर विरोध कर रहे थे। यह असन्तोष नित्यानन्द स्वामी को पदच्युत कराने के बाद ही शांत हुआ था। हालांकि स्वामी ने जब 29 अक्टूबर 2001 को विधानसभा में जब अपने इस्तीफे की घोषणा की तो उन्होंने इस तख्ता पलट के लिए पार्टी नेताओं को परोक्ष तौर पर और शराब माफिया को अवश्य ही जिम्मेदार बताया। नित्यानन्द स्वामी केवल 354 दिन ही कुर्सी पर टिक पाए।
केवल तिवारी कर पाए पूरा कार्यकाल
राज्य विधानसभा के पहले चुनाव के बाद देश के वरिष्ठतम् नेता नारायण दत्त तिवारी ने जब पहली निर्वाचित सरकार की कमान संभाली तो तत्कालीन प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष हरीश रावत ने उनको चैन से जीने नहीं दिया। उनके समर्थकों का तर्क था कि उत्तरांचल में पूरे 12 साल के बनवास के बाद कांग्रेस ने हरीश रावत के नेतृत्व में चुनाव जीता है और और उस जीत का फल भोगने के लिए दिल्ली से नारायण दत्त तिवारी को भेज दिया गया। हालांकि तिवारी ने ही इस प्रदेश के विकास की नींव रखी। उनके बाद कोई मुख्यमंत्री पांच साल तक नहीं टिक सका।
मुख्यमंत्री चुने नहीं बल्कि थोपे गए
2007 में जब भगत सिंह कोश्यारी के नेतृत्व में भाजपा सत्ता में आई तो ऐन वक्त पर पार्टी आला कमान ने नव-निर्वाचित विधायकों के बहुमत के विपरीत पौड़ी गढ़वाल के सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री भुवन चन्द्र खण्डूड़ी को विधायक दल का नेता चुनवा दिया। जबकि 34 सदस्यीय भाजपा विधायक दल में कम से कम 22 विधायक कोश्यारी के पक्ष में 7 रमेश पोखरियाल निशंक के तथा 4 विधायक खण्डूड़ी के पक्ष में माने जा रहे थे।
भाजपा नेतृत्व की इस जोर जबरदस्ती का खामियाजा कोश्यारी समर्थकों के असन्तोष के कारण बना जो कि खण्डूड़ी को भुगतना पड़ा और अन्ततः उनको 26 जून 2009 को पद छोड़ना पड़ा। राज्य में 27 जून को रमेश पोखरियाल निशंक की ताजपोशी हुई।
निशंक को खण्डूड़ी और कोश्यारी गुटों का विरोध झेलना पड़ा और अन्ततः उनकी भी 2 साल 75 दिन के बाद विदाई हो गई और भुवनचन्द्र खण्डूड़ी की 11 सितम्बर 2011 पुनः ताजपोशी हो गई। सन् 2012 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के पक्ष में गया तो मुख्यमंत्री की कुर्सी विजय बहुगुणा के हाथ चली गई और हरीश रावत हाथ मलते रह गए।
हरीश रावत के लिए यह दूसरा झटका था इसलिए उनके समर्थक चैन से नहीं बैठ सके और अन्ततः 31 जनवरी 2014 को 1 साल 324 दिन के शासन के बाद बहुगुणा भी चलते बने। विजय बहुगुणा केवल 690 दिन ही कुर्सी थाम सके। बहुगुणा के बाद हरीश रावत मुख्यमंत्री बन लेकिन विजय बहुगुणा गुट भी कहा चैन से बैठने वाला था। इस गुट के 9 विधायकों ने 18 मार्च 2016 को बजट पास होते समय विद्रोह कर हरीश रावत सरकार को संकट में डाल दिया। ऐसा राजनीतिक संकट भारत के संसदीय इतिहास में किसी अन्य के साथ नहीं हुआ था।
तीरथ की लंका तो आलाकमान ने ही ढहा दी
राज्य विधानसभा के 2017 में हुए चुनाव में भाजपा को 70 में से 57 सीटों पर असाधारण जीत मिली मगर इतने प्रचण्ड बहुमत के बाद भी भाजपा प्रदेश को स्थिर सरकार नहीं दे पाई। भाजपा ने त्रिवेन्द्र को चार के कार्यकाल का जश्न मनाने से ठीक एक सप्ताह पहले उनका चलता कर दिया। उनकी जगर 10 मार्च 2021 को तीरथ सिंह रावत को कुर्सी मिली तो संवैधानिक संकट से बचने के लिए उन्हें भी ठीक 115 दिन बाद हटा दिया गया। मजेदार बात यह है कि राज्य में किसी भी सरकार के लिए विपक्ष नहीं बल्कि सत्ताधारी दल ही जिम्मेदार रहा है।
2 जुलाई 2021 को तीरथ सिंह रावत का राजभवन जाकर इस्तीफा देना ही था कि देहरादून की डिफेंस कालोनी आतिशबाजी से गूंज उठी। पटाखों के ये धमाके कहीं और से नहीं बल्कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत के आवास से गूंज रहे थे। वास्तव में यहां जिनको कुर्सी नहीं मिली वे अपने ही दल के लोगों की कुर्सियां हिलाने में जुटे रहे।
तीरथसिंह रावत की लंका तो पार्टी नेतृत्व ने समय से उपचुनाव न करा कर संवैधानिक संकट के बहाने स्वयं ही ढहा दी। कैसे हो सकता है कि भाजपा नेतृत्च का संविधान के अनुच्छेद 164 (4) और जन प्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 151 ए की जानकारी न हो । अगर जानकारी नहीं थी तो निर्वाचन आयोग की विज्ञप्तियां जरूर पढ़ ली होती। लेकिन मामला ममता बनर्जी का भी था।
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