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भारत-अमेरिका के बीच आखिर क्यों बदल रहे हैं संबंध?

Thu, 27 Jun 2019 01:12 PM IST
Niranjan Marjani निरंजन मार्जनी
Updated Thu, 27 Jun 2019 01:12 PM IST
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US Secretary of State Mike Pompeo in India PM Modi India america relations china trade in Asia
अमेरिका के राज्य सचिव माइक पोम्पिओ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी - फोटो : पीएमओ

अमेरिका के विदेश मंत्री माइक पोम्पिओ ने 24 जून से हिन्द-प्रशांत क्षेत्र के देशों की यात्रा की शुरुआत भारत से की है। एक हफ़्ते के इस दौरे में वे भारत के अलावा जापान और दक्षिण कोरिया भी जाएंगे। पोम्पिओ के भारत दौरे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जापान के ओसाका में 28-29 जून को जी-20 शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। इस सम्मेलन में मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बीच द्विपक्षीय बैठक भी होगी।

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भारत अमेरिका के लिए क्यों खास है ये दौरा?  
बदलाव के दौर से गुज़र रहे भारत-अमेरिका संबंधों की दृष्टि से पोम्पिओ का यह दौरा महत्त्वपूर्ण है। द्विपक्षीय स्तर पर आर्थिक और क्षेत्रीय स्तर पर सामरिक संबंध भारत की अमेरिका और हिन्द-प्रशांत के बारे में भूमिका तय करेंगे। एक तरफ अमेरिका का चीन के साथ व्यापार युद्ध चल रहा है तो वहीं दूसरी तरफ अमेरिका ने भारत को जनरलाइज़्ड सिस्टिम ऑफ़ प्रेफरेन्सेस (जीएसपी) से निलंबित कर दिया है। यह एक ऐसी प्रणाली है जो विकासशील देशों को अमेरिका में अपने उत्पाद निर्यात करने पर लगने वाले शुल्कों में छूट देती है।
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अमेरिका उन देशों में से है जिसके साथ भारत का व्यापार अधिशेष है। हाल ही में अमेरिका भारत का इस साल का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार बना है। इस साल भारत का अमेरिका के साथ हुए व्यापार का आंकड़ा 87956.24 मिलियन डॉलर रहा है। 

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US Secretary of State Mike Pompeo in India PM Modi India america relations china trade in Asia
वर्ष 2018 में भारत का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार था। - फोटो : फाइल फोटो

इस आंकड़े के साथ ही अमेरिका ने चीन को पीछे छोड़ दिया है, जो वर्ष 2018 में भारत का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार था। जीएसपी की सूची में से भारत को हटाने का असर भारत से अमेरिका में होने वाले निर्यात पर पड़ेगा। कुछ दिन पहले ही डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा था की इस नीति में बदलाव होने की कोई संभावना नहीं है। 2017 में 5.7 बिलियन डॉलर की छूट मिलने से भारत जीएसपी का सबसे बड़ा लाभार्थी बना था।

दरअसल, पोम्पिओ का भारत दौरा, मोदी-ट्रम्प वार्ता और जी-20 शिखर सम्मेलन में कितना प्रभावी होगा यह देखने वाली बात होगी। विशेष रूप से भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों पर सकारात्मक नतीजे के संदर्भ में। साथ ही यह भी देखना होगा की क्या अमेरिका और चीन के बीच चल रहे व्यापार युद्ध का फ़ायदा भारत उठा सकता है।

अमेरिका और भारत के बीच सामरिक संबंध
भारत और अमेरिका के बीच दूसरा मुद्दा सामरिक संबंधों का है। हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिए अमेरिका भारत को अपना रणनीतिक साझेदार मानता है, लेकिन हिन्द-प्रशांत क्षेत्र पर दोनों देशों की नीतियां अलग है। अमेरिका की नीति सीधे चीन से मुक़ाबला करने की है, वहीं भारत अपने हितों की रक्षा करने के साथ ही अकेले चीन को निशाना बनाने के ख़िलाफ़ है।

भारत का मानना है की चीन को निशाना बनाने से इस क्षेत्र में ध्रुवीकरण और बढ़ जाएगा और युद्ध जैसे हालात भी पैदा हो सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने कई बार हिन्द-प्रशांत में बहुध्रुवीय व्यवस्था की बात कही है जिसमें सभी के हितों की रक्षा हो।

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दक्षिण चीन सागर में चीन और उसके पड़ोसियों के बीच समुद्री सीमा विवाद चल रहा है। - फोटो : फाइल फोटो

बहुध्रुवीय व्यवस्था और भारत की सफलता 
हिन्द-प्रशांत के बारे में एक और महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, जिस बहुध्रुवीय व्यवस्था की भारत बात करता है, उसमें कुछ हद तक भारत को सफ़लता भी मिली है। ईरान के चाबहार बंदरगाह का संचालन भारत करता है। इस बंदरगाह से भारत कोअफ़ग़ानिस्तान और मध्य एशिया तक अपनी पहुंच बढ़ाने में मदद होगी।

इसी तरह भारत ने ओमान के दुक़्म बंदरगाह में अपना सैन्य अड्डा स्थापित किया है। हाल ही में श्रीलंका ने भारत और जापान से कोलोंबो बंदरगाह विकसित करने का समझौता किया है। भौगोलिक दृष्टि से भारत ने पश्चिम हिन्द महासागर में अपने हितों की रक्षा करने की लिए यह कदम उठाए हैं। 

दूसरी ओर दक्षिण पूर्व और पूर्व एशियाई देशों के साथ भारत के संबंध पिछले कुछ वर्षों में मज़बूत हुए हैं। एक्ट ईस्ट पॉलिसी के तहत प्रधानमंत्री मोदी ने अपने प्रथम कार्यकाल में दक्षिण पूर्व एशिया को प्राथमिकता दी। हालांकि इस क्षेत्र में कुछ चुनौतियां हैं।

दक्षिण चीन सागर में चीन और उसके पड़ोसियों के बीच समुद्री सीमा विवाद चल रहा है। इसके आलावा कोरियाई प्रायद्वीप में अमेरिका और जापान का उत्तर कोरिया के साथ भी विवाद है। भारत दक्षिण पूर्व एशिया में क्या भूमिका निभाता है यह अभी स्पष्ट होना बाकी है। भारत और अमेरिका के चीन के प्रति अलग-अलग दृष्टिकोण दोनों देशों के बीच सामरिक सहयोग के लिए चुनौती है। पश्चिम हिन्द महासागर में भी अमेरिका का ईरान के साथ टकराव भारत के लिए मुश्क़िल स्थिति पैदा करता है।

हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में उभरती हुई स्थिति भारत और अमेरिका के संबंधों में भी बदलाव का इशारा करती है। पिछले लगभग तीन दशकों से भारत और अमेरिका के संबंधों में लगातार मज़बूती आयी है। लेकिन अमेरिका की कुछ समय से अपने ही दोस्तों से, जैसे के यूरोपीय संघ, अनबन चलती आ रही है। ऐसे में भारत के साथ कुछ मुद्दों पर पैदा हुए मतभेदों को ज़्यादा बढ़ने न देना ही फ़िलहाल अमेरिका के हित में है। 
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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