आखिर कब पूरी तरह से खत्म होंगे तीन तलाक के मामले?
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यह सही है कि तीन तलाक के शब्द बोलने से महिलाओं को जो जिस पीड़ा, व्यथा और आर्थिक संघर्ष से गुजरना पड़ता था उसके लिए उन्हें कानून के सहारे की बहुत आवश्यकता थी। दरअसल, धर्म के साथ किसी भी महिला के किसी भी संघर्ष को जोड़कर नहीं देखा जा सकता। यदि कहीं भी कोई भी महिला किसी अप्रिय स्थिति का किसी भी कारण से सामना कर रही है तो उसे राहत मिलनी ही चाहिए।
औरत भी एक व्यक्ति है उसके सुख-दुख सबको दिखने और समझने चाहिए। उसकी चिंता व दुश्चिंता भी सबकी साझी चिंता होना चाहिए, इसलिए यदि महिलाओं को तलाक-तलाक-तलाक के तीन शब्दों से दुख और परेशानी से गुजरने के लिए मजबूर होना पड़ता रहा है तो इन शब्दों के अस्तित्व को मिटाना बहुत जरूरी था। शासन की ओर से अन्तत: यह कदम उठा ही लिया गया कि यदि किसी महिला को बेवजह इस त्रासदी से गुजरना पड़े तो वह अपनी शिकायत के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटा सकती है।
फिलहाल क्या है तीन तलाक की स्थिति
इस कानून के बनने के बाद महिलाओं की आज की स्थिति को जानना बहुत आवश्यक है। पहले तलाक दिए जाने की खबरें इस तरह से सामने नहीं आती थीं। महिलाओं को तलाक मिलता और वह चुपचाप इसे सहन करके अपने मायके लौट जाती थी या फिर अकेले इस स्थिति से जूझने की कोशिश करती जो कि बहुत ही कड़ी और कठिन होती।
हम सब जानते हैं कि यह आज तक भी जारी है कि मुस्लिम महिलाओं में अधिकांशत: तालीमयाफ्ता महिलाएं नहीं होती और न हीं उन्हें इस काबिल बनाया जाता है कि वह अपने पैरों पर किसी मुसीबत के पड़ने पर खड़ी हो सकें।
इस स्थिति को सुधारने के लिए महिलाओं के हक में जो कानून बना है उसकी सहायता लेकर महिलाएं शिकायत दर्ज करवाने पहुंच रहीं हैं। पर, इन शिकायतों की जो खबरें कानून बन जाने के बावजूद आ रहीं हैं वह बहुत हैरान और परेशान करने वाली हैं।
एक खबर यह थी कि खाविंद ने इसलिए तलाक दे दिया कि बच्ची बहुत रो रही थी और उसकी बीवी बच्ची को चुप नहीं करवा पा रही थी। इसी पर खाविंद ने तलाक-तलाक कह दिया। एक अन्य केस में बीवी ने शौहर से बच्चे की दवाई के लिए केवल 30 रुपए मांग लिए तो उसे तलाक मिल गया।
एक घर में बीवी ने दाल पका दी थी तो उसे तलाक मिल गया। जब शौहर पैसे ही नहीं देता तो बीवी पकवान कहां से बनाए? वॉट्स ऐप पर तलाक का मैसेज देने की बात तो बहुत कॉमन हो गई है। यूं तो कॉल करके भी तलाक दिए जा रहे हैं। एक दिलचस्प खबर यह है कि शौहर को बीवी के पहने हुए कपड़े या यूं कहें वेशभूषा बहुत दकियानूसी लगी तो उसने तलाक दे दिया।
इससे क्या मतलब निकाला जाए? तलाक के लिए महिलाओं के हित में बनाए गए कानून से पुरुषों की मानसिकता में कोई फर्क नहीं आया या फिर वह इस कानून के बन जाने से चिढ़कर बेतुकी बातों को आधार बनाकर तलाक दे रहे हैं।
दअरसल, जिन अन्य देशों में तलाक के विरुद्ध कानून बने हुए हैं उनके बारे में हमें कोई जानकारी नहीं है कि वहां भी क्या ऐसी मामूली खीझ को लेकर भी तलाक दिए जाते हैं? या कि महिलाओं को वहां न्याय मिलता है? यह तो साफ पुरुष मानसिकता का वह प्रदर्शन है जिसमें वह बेवजह दिखाना चाहता है कि कानून बनाने से क्या होता है और अभी भी वहीं मालिक है और वह जब चाहे औरत को एक वस्तु समझकर एक ओर फेंक सकता है तथा वह भी बच्चों सहित जिनका वह खुद बाप है।
अभी भी जो तलाक देने के किस्से सुनाई दे रहे हैं उनसे यह नतीजा तो नहीं निकाला जाना चाहिए कि कानून बनने से क्या फर्क पड़ेगा। कानून तो बनाया ही जाना चाहिए था। उसकी अपनी हैसियत है शायद धीरे-धीरे इसका प्रभाव व इसके परिणाम सामने आएंगे।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।