फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   tradition of india and indian cinema

भारतीय कला-संस्कृति को कैसे देखें

Sun, 24 Feb 2019 10:14 AM IST
प्रशांत राय गौतम चटर्जी
गौतम चटर्जी Published by: प्रशांत राय Updated Sun, 24 Feb 2019 10:14 AM IST
विज्ञापन
tradition of india and indian cinema
बनारस

भारत ने पिछले तीन हजार साल में जितने तरह के दौर और शासन देखे हैं, दुनिया के किसी देश ने नहीं देखे। लेकिन नई सदी के इधर के दौर में अपनी कला और संस्कृति को देखने का जैसा रवैया पनपा है, उसे देखकर लगता है कि भारतीय संस्कृति मानो कोई अबूझ पहेली हो और उस पर कुछ भी वक्तव्य देने से पहेली को बूझना आ जाता हो। भारतीय कला और संस्कृति पर कही गई बातें यदि हम याद कर सकें, तो पाएंगे कि हमने अभी तक तय नहीं किया कि हम अपने इतिहास और समय को कैसे देखें, कला में व्यक्त उस इतिहास और समय के बारे में अपनी समझ कैसे विकसित करें और उस समझ की समीक्षा हम कैसे करें कि 21वीं सदी में देश का सचमुच कोई आधुनिक, संपूर्ण और सर्वजनसुखाय स्वरूप उभर कर सामने आ जाए, जिसका स्वीकार और सम्मान सभी भारतीय मन का गर्व हो और विश्व चेतना में वह एक सुसंस्कृत देश के रूप में चिह्नित हो, जिसका असर संस्कृति, समाज, राजनीति और अर्थनीति पर भी पड़े।

विज्ञापन


दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि स्वाधीनता के बाद हमने कभी ध्यान ही नहीं दिया कि देश की संस्कृति और इतिहास को देखने में सभ्य हम कैसे हों, इसकी पूरी व्यवस्था हमारे वैदिक इतिहासकारों ने पहले ही दे रखी है। वैदिक ऋषि महज ऋषि भर नहीं थे। वे ऐसे कवि, विज्ञानी, इतिहासकार और कलाकार थे, जिनकी दृष्टि समय के साथ-साथ समय के पार भी हुआ करती थी। उन्होंने इतिहास और संस्कृति को एक सुव्यवस्थित क्रम में देखने का आधार मनुष्य सभ्यता को बनाया था और सभ्यता का आधार उन्होंने विद्या और ज्ञान को बनाया था। विद्या की देवी की पूजा इसी आशय से कालांतर में विकसित हुई थी। इसी दृष्टि से कालखंडों का निर्धारण किया गया था, जैसे स्मृति काल, उपनिषद काल, शिक्षा काल आदि। हालांकि आज यह बहुत व्यावहारिक नहीं लग सकता है, क्योंकि हम ज्ञान और विद्या के मूल भारतीय स्वरूप से बहुत हट गए हैं। मूल स्वरूप में महाभारत, सुत्तनिपात और नाट्यशास्त्र जैसे ग्रंथ ही पंचम वेद हुआ करते थे और कलाकार ही इतिहास पुरुष कहलाते थे।

विज्ञापन

भारतीय गणतंत्र और लोक चेतना में सत्ता और विपक्ष दरअसल अद्वैत दृष्टि के ही दो पहलू होते थे, ताकि देश की शांति इस बात पर निर्भर करे कि उस देश के लोग कितने सभ्य, शिक्षित और सुसंस्कृत हैं। वे लोग सत्ता की रचना करते थे और सत्ता फिर-फिर देश और अपने समाज की पुनर्रचना करती रहती थी। आज यह भाषा यूटोपिया की भाषा लग सकती है। लेकिन समीक्षा की पूरी बात हमारे स्वाधीन देश में साहित्य और कला तक आकर सीमित हो गई है। हमने इस ओर ध्यान नहीं दिया कि गैर भारतीय देशों के संस्कार में किसी ग्रंथ की व्याख्या कमेंटरी है, लेकिन हमारे यहां इसके लिए एक नहीं, बल्कि छह तरीकों की व्यवस्था बनाई गई है, जैसे वृत्ति, टीका, भाष्य आदि। राजशेखर ने अपनी काव्यमीमांसा में छह प्रकार की कमेंटरी की विधिवत व्यवस्था दे रखी है। साहित्य और कलाओं में समीक्षा दृष्टि या समालोचना का स्तर आजाद भारत में कैसा रहा, इसे यदि इस मूल भारतीय ऋषि दृष्टि से देखें, तो आसानी से दिख जाएगा कि समीक्षा अभी आरंभ ही नहीं हुई है।

हिंदी साहित्य में समीक्षा या आलोचना के नाम पर काफी कुछ लिखा गया है। प्रेमचंद के साहित्य पर ही पिछले करीब सत्तर साल और स्वयं प्रेमचंद के समय में भी काफी कुछ लिखा गया है। लेकिन वह लिखना परवर्ती समय में एक भी ऐसी रचना नहीं दे सका है, जो प्रेमचंद की कोटि की एक कहानी भारतीय पाठक मानस को उपहारस्वरूप दे सके। देश को एक स्वस्थ सत्ता कैसे मिल सकती है भला! भारतीय कलाओं की समीक्षा का हाल और भी निराशापूर्ण, क्षुब्ध और इकहरा है। लगता है कि आजाद भाारत में रंगमंच, सिनेमा, संगीत या चित्रकला की समीक्षा हुई ही नहीं। हिंदी में संगीत समीक्षा के नाम पर प्रायः ऐसा कुछ प्रकाशित होता रहा कि संगीत साधक अपनी संगीत प्रस्तुति के अगले दिन ऐसी कोई भी प्रकाशित सामग्री लेकर अपने शहर लौट सकने की स्थिति में नहीं आ सके, जो किसी को दिखाने लायक हो। हां मूर्ख कलाविदों की अहंमन्यता मुखर होती चली गई। उन्होंने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिलाया कि पं. हरिशंकर मिश्र के बाद कभी बनारस में ध्रुपद गायन पनपा ही नहीं, जबकि बनारस एकमात्र शहर है, जहां इस विशेष शास्त्रीय शैली का वार्षिक मेला पिछले चवालीस साल से होता चला आ रहा।

tradition of india and indian cinema
भारतीय सिनेमा

रंगमंच की भी ऐसी समीक्षाएं आती रहीं कि हिंदी के रंगकर्मी के लिए यह देखना दुष्कर हो गया कि वे आगे नहीं बढ़ रहे, पीछे छूट रहे। सिनेमा के बारे में तो राज्यसभा टीवी के गुफ्तगू कार्यक्रम की सौवीं कड़ी में जया बच्चन को कहना पड़ा कि हिंदी में फिल्म समीक्षक ही नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हमें ऐसे फिल्म समीक्षकों की जरूरत है, जिन्हें फिल्म के तकनीकी पक्षों की जानकारी हो, ऐसे समीक्षक जो हमें भी सिखाएं। दरअसल वह कहना चाहती थीं कि फिल्म भाषा की समझ रखने वाले समीक्षकों की कमी है, जरूरत है। समाधान बहुत आसान है। पंचमवैदिक ऋषि ने अपने ग्रंथ के सिद्धि अध्याय में वर्णित चार कारिकाओं में समीक्षकों के गुण बताए हैं, और यह भी कि यह यानी समीक्षा नाट्य या संगीत परिवेश का ही तीसरा रूप हो सकता है, जो संगीत साधक को उन्नत करेगा। संगीत समीक्षक यदि संगीत समाज स्वयं नहीं बनाता और स्तरीय समीक्षा की उम्मीद यदि प्रकाशन जगत से करता है, तो यह ऐसे देश के संस्कार को बताता है, जो संस्कृति और सभ्यता को बहुत पीछे छोड़ आया है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed