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Sharda Sinha: 'छठ कोकिला' का जाना गिरमिटिया कंट्री की भी बड़ी क्षति, आज लय, सुर और राग सब रो रहे हैं

Wed, 06 Nov 2024 05:49 AM IST
शिव शुक्ला मनोज भावुक
मनोज भावुक Published by: शिव शुक्ला Updated Wed, 06 Nov 2024 05:49 AM IST
सार

अश्लीलता और फूहड़ता के इस दौर में भी शारदा जी का एक अलग ही रंग था। वह इस बात को मानती थीं कि चारों तरफ अंधेरा हो, लेकिन उसमें एक दीया भी उजाला करे तो पूरे अंधेरे पर भारी पड़ता है। हमें ये नहीं सोचना है कि जब हम अच्छा गीत गा रहे हैं, अच्छा काम कर रहे हैं, लेकिन हमारी संख्या कम है। वो बड़ी ताकत देती थीं।

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Today everyone is crying on the demise of Sharda Sinha in rhythm, tune and melody
शारदा सिन्हा। - फोटो : इंस्टाग्राम @shardasinha_official

विस्तार

भोजपुरी लोक संगीत की एकमात्र लीविंग लिजेंड थीं, वो चली गईं। शारदा सिन्हा के होने का मतलब पूरा लोक राग, लोक संस्कृति, संस्कार और जीवनशैली उनके साथ चलता था उनकी गीतों में। छठ उसका एक हिस्सा है। चूंकि, उनकी पहचान छठ गीतों से बनी थी और उस समय आज की तरह एकसाथ हजारों गीत रिलीज नहीं थे। तब हर जगह सिर्फ शारदा सिन्हा के ही गीत बजते थे। छठ गीतों की पर्याय रही हैं और छठ के समय ही उनका निधन हो जाना...ऐसा लग रहा है मानो छठी मइया अपनी प्रिय बेटी को गोद में लेकर चली गईं।

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शारदा जी का जाना सिर्फ बिहार, यूपी और पूर्वांचल के लिए ही नहीं, बल्कि गिरमिटिया कंट्री की भी बड़ी क्षति है। चाहे फिजी हो, सूरीनाम हो या मॉरीशस, या फिर अमेरिका हो, जहां भी अपने लोग गए हैं, छठ के इस उत्सव पर हर जगह सन्नाटा पसरा हुआ है। इस वक्त उनके जाने से दुख जो है, दुना हो गया है। भोजपुरी के हर घर में लोक राग और लोक रंग का दीया बारने वाली गायिका पद्मभूषण शारदा जी के जाने से आज लय, सुर और राग सब रो रहे हैं।  
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बेटे की तरह प्रेम करती थीं
मेरा उनसे मां और बेटे जैसा संबंध रहा है। उनसे लगातार बातचीत होती रहती थी। मैंने उनके साथ 50 से अधिक कार्यक्रम और स्टेज शो किए। मैं सौभाग्यशाली रहा हूं कि पिछले साल लखनऊ में फिल्म फेयर और फेमिना ने एक अवाॅर्ड शो का आयोजन किया था। उसमें संगीत के लिए शारदा जी को सम्मानित किया गया और साहित्य के लिए मुझे। तब वो गोद में भरकर मुझे बहुत पुचकारीं और बोलीं तुम्हारे कंधे पर भोजपुरी का भविष्य है।
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चुनौतियों से जमकर लड़ीं
शारदा जी संभ्रांत परिवार से ताल्लुक रखती थीं। उस समय महिलाओं का स्टेज पर गाना अच्छा नहीं माना जाता था। तमाम चुनौतियों से लड़कर उन्होंने अपने गीतों के जरिये यह मुकाम हासिल किया। भोजपुरी में बिंध्यवासिनी देवी के बाद गीतों के जरिये लोक-संस्कृति को आगे लाने की हिम्मत शारदा जी ने ही दिखाई थी।

अपनी मिट्टी से रहा जुड़ाव
शारदा जी को कई बार रहने के लिए मुंबई से बुलावा आया। लेकिन, वह कभी नहीं गईं। उनका अपनी मिट्टी से गहरा जुड़ाव रहा था। पांच दशक की सफल यात्रा के बाद भी उनके मन में हमेशा एक टीस रही। वह हिंदी के उत्थान के लिए काफी कुछ करना चाहती थीं।

लगा मैं मायके आ गई हूं...
बड़ी गायिका होने के बावजूद शारदा जी का अपने रीति-रिवाजों से गहरा लगाव था। छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाती थीं। एक बार मॉरीशस में उनका कार्यक्रम था, जहां लोगों ने उनका खोइंछा (बेटी की विदाई के समय साड़ी के आंचल में अनाज, पैसा आदि डालना) भरा। इससे वह बड़ी खुश हुईं और कहने लगीं...लगता है जैसे मैं मायके आ गई हूं।

लोकगीत की प्रामाणिक हस्ताक्षर थीं शारदा
मशहूर नृत्यांगना शाेभना नारायण ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यकीन नहीं हो रहा है...शारदा सिन्हा हमारे बीच नहीं रहीं। करीब 11 महीने पहले उनसे लखनऊ में एक कार्यक्रम में मिलना हुआ था। हम लोग देर तक साथ रहे थे। जब भी हम सब मिलते थे, तो बहुत हंसी मजाक होता। बीते दिनों इसकी तो जानकारी थी कि वह बीमार थीं, लेकिन यकीन इसका भी था वह वापस लौट आएंगी। लेकिन छठी मइया ने हमारी प्यारी शारदा जी को अपने पास बुला लिया। आजकल लोक संगीत के नाम पर बहुत कुछ हो रहा है, लेकिन वह इसकी प्रामाणिक हस्ताक्षर थीं। शारदा जी पहली मुलाकात में वह सबको अपना बना लेती थीं।


लोक संस्कृति को युवाओं तक पहुंचाया
संतूर वादक अभय सोपोरी ने कहा कि शारदा जी ने भोजपुरी, मैथिली या दूसरी लोक भाषाओं में जो गीत दिए...वह हमेशा उनको हमारी यादों में बनाए रखेंगे। शारदा जी ने लोक संस्कृति को देश के युवाओं तक पहुंचाया है। छठ पर्व पर देश का शायद ही कोई कोना बचे, जहां उनके गीत न सुने जाएं। आप किसी भी छठ घाट पर चले जाइए, शारदा जी की मधुर आवाज आपके कानों में मिठास घोल देगी। छठ पूजा उनके गीतों के बगैर अधूरी है। आज वह बेशक शारीरिक रूप से हमसे दूर हुई हैं, लेकिन अपने संगीत के जरिये वो हमेशा हमारे साथ रहेंगी।

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