आईआईएमसी की रिपोर्ट और पश्चिमी मीडिया: कोविड काल की रिपोर्टिंग और नजरिया

Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Thu, 15 Jul 2021 11:59 AM IST

सार

भारतीय जनसंचार संस्थान के एक ऑनलाइन सर्वेक्षण एवं शोध के नतीजे बताते हैं कि भारत में अधिसंख्य चेतन लोग इस बात को समझ रहे हैं कि यूरोप,अमेरिका और अन्य देशों की मीडिया एजेंसियों ने कोरोना को लेकर अतिरंजित, गैर जिम्मेदाराना और दहशतमूलक खबरें प्रकाशित कीं।

इन खबरों के मूल में भारत के प्रति एक औपनिवेशिक मानसिकता भी इस दरमियान किसी दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इबारत की तरह पढ़ी जा सकती हैं।
पश्चिमी मीडिया ने भारत की छवि को दुनिया बहुत अलग तरह से पेश किया है।
पश्चिमी मीडिया ने भारत की छवि को दुनिया बहुत अलग तरह से पेश किया है। - फोटो : Pixabay
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विस्तार

भारतीय जनसंचार संस्थान के एक ऑनलाइन सर्वेक्षण एवं शोध के नतीजे बताते है कि भारत में अधिसंख्य चेतन लोग इस बात को समझ रहे हैं कि यूरोप,अमेरिका और अन्य देशों की मीडिया एजेंसियों ने कोरोना को लेकर अतिरंजित, गैर जिम्मेदाराना और दहशतमूलक खबरें प्रकाशित की।
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इन खबरों के मूल में भारत के प्रति एक औपनिवेशिक मानसिकता भी इस दरमियान किसी दीवार पर मोटे हरूफ में लिखी इबारत की तरह पढ़ी जा सकती है। आईआईएमसी का यह विश्वसनीय सर्वे समवेत रूप से विदेशी मीडिया संस्थानों खासकर बीबीसी, द इकोनोमिस्ट, द गार्डियन, वाशिंगटन पोस्ट, न्यूयॉर्क टाइम्स, सीएनएन, की पक्षपातपूर्ण, झूठी रिपोर्टिंग को आमजन की दृष्टि में भी कटघरे में खड़ा कर रहा है।


पत्रकारिता के नैतिक मापदंडों पर जन्मना दोहरेपन का शिकार पश्चिमी मीडिया कोविड-19 को लेकर कैसे निष्पक्षता औऱ ईमानदारी का अबलंबन कर पाता। आईआईएमसी के सर्वेक्षण और शोध- विमर्श से एक बात और स्पष्ट होती है कि पश्चिमी जगत आज भी हमारे देश की छवि सांप सपेरे, जादू टोने, वाले देश से बाहर मानने के लिए तैयार नही है।

पश्चिमी दुनिया और भारत की छवि 
70 के दशक की तीसरी दुनिया या अल्पविकसित देशों में भारत को पिछड़ा देश माना जाता था, उसी अधिमान्यता पर पश्चिमी बौद्धिक जगत आज भी खड़ा हुआ है। चंद्रयान और गगनयान जैसे विज्ञान और तकनीकी सम्पन्न नवाचार हो या फार्मा इंडस्ट्री में हमारी बादशाहत पश्चिम इसे मान्यता देने को आज भी राजी नही है।

दरअसल, कोरोना की पहली लहर में जिस प्रमाणिकता से हमने दुनिया के सामने मिसाल पेश की, उसका कोई सकारात्मक उल्लेख विदेशी मीडिया संस्थानों में नजर नही आया। इस दौर में ब्रिटेन, अमेरिका, स्पेन, इटली, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया जैसे धनीमानी राष्ट्र पस्त हो चुके थे। इस नाकामी को प्रमुखता से उठाने की जगह इन मीडिया हाउस ने भारत मे प्रवासी मजदूरों को पहले पन्ने पर जगह दी। तब जबकि डब्लू एच ओ भारतीय कोविड प्रबंधन मॉडल को सराहा रहा था।
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