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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   The significance of the political red line drawn in India over Ali Khamenei death

खामेनेई की मौत पर भारत में खिंची सियासी रेडलाइन के मायने

Tue, 03 Mar 2026 04:36 PM IST
Ajay Bokil अजय बोकिल
Updated Tue, 03 Mar 2026 04:36 PM IST
सार

मोदी सरकार पर आरोप है कि उसने एक ऐसे देश, जिसके साथ भारत के सदियों से मित्रतापूर्ण रिश्ते रहे हैं, के सर्वोच्च धार्मिक नेता की मौत पर राजकीय शोक घोषित करना तो दूर, सामान्य दुख तक नहीं जताया। परोक्ष  रूप से यह भारत में रह रहे तमाम शिया मुसलमानों की भावनाओं की अनदेखी है।

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The significance of the political red line drawn in India over Ali Khamenei death
अली खामनेई - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता और दुनिया भर में शिया मुसलमानों के रहनुमा अयातुल्लाह अली खामेनेई के अमेरिका और इजराइल द्वारा किए गए खात्मे पर भारत में सियासत की नई रेड लाइन खिंच गई है। देश में कांग्रेस और अन्य विपक्षी पार्टियां ‘खामेनेई की हत्या पर मोदी सरकार की चुप्पी’ को भारतीय विदेश नीति पर प्रश्न चिन्ह बता रही हैं।

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कांग्रेस की वरिष्ठ नेता श्रीमती सोनिया गांधी ने एक अंग्रेजी अखबार में लिखे लेख में खामेनेई मामले में मोदी सरकार के रवैये को ‘चिंताजनक चुप्पी‘ करार देते हुए संसद में इस पर तुरंत चर्चा  की मांग की है।
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उन्होंने खामेनेई की 'लक्षित हत्या' पर भारत सरकार के मौन को "जिम्मेदारी से पीछे हटना" करार देते हुए कहा कि अब हमे अपनी नैतिक शक्ति के ‘पुनर्अन्वेषण’ और उसे स्पष्टता और प्रतिबद्धता के साथ व्यक्त करने की तत्काल आवश्यकता है। विपक्षी दलों की ओर से यह भी आरोप लगाया गया कि भारत की विदेश नीति ‘संतुलित’ न होकर किसी एक पक्ष में झुकी ज्यादा प्रतीत होती है।
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उधर भारत सरकार ने इस पूरे मामले में कोई अधिकृत बयान जारी न कर, केवल विश्वशांति कायम रखने और संवाद से विवाद सुलझाने की वकालत की है। हमने न तो इजराइल- अमेरिका द्वारा ईरान पर हमले का समर्थन किया और न ही खामेनेई के मारे जाने की निंदा की।

अलबत्ता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हमले के दो दिन बाद मध्य पूर्व के खाड़ी देशों के कुछ राष्ट्राध्यक्षों से बात की और वहां रह रहे भारतीयों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई। यानी ‘हम न तो तीन में है, न तेरह में।’ चूंकि इस संघर्ष के सभी पक्ष हमारे दोस्त  हैं, इसलिए हम सभी के साथ हैं या किसी के भी साथ नहीं है।

दूसरी तरफ इसका यह अर्थ भी निकाला गया कि विश्व की  बड़ी आर्थिक और सैनिक ताकत होते हुए भी भारत की वैश्विक मंच पर कोई खास आवाज नहीं है।

मोदी सरकार पर आरोप है कि उसने एक ऐसे देश, जिसके साथ भारत के सदियों से मित्रतापूर्ण रिश्ते रहे हैं, के सर्वोच्च धार्मिक नेता की मौत पर राजकीय शोक घोषित करना तो दूर, सामान्य दुख तक नहीं जताया। परोक्ष  रूप से यह भारत में रह रहे तमाम शिया मुसलमानों की भावनाओं की अनदेखी है।

जबकि भारत का सरकार का रवैया इस बात का संकेत है कि तीन देशों की आपसी लड़ाई में हमारी चिंताएं केवल हमारे अपने हित हैं आतंकवाद पर ‘जीरो टालरेंस’ के चलते हम ऐसे किसी भी पक्ष के साथ खड़े नहीं दिखना चाहते, जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से आंतकवाद का हिमायती हो।

श्रीमती सोनिया गांधी ने जो कहा, जरा उसे तथ्यों, तर्कों, रणनीतिक और व्यावहारिक पैमाने पर परखें। ईरान में 1979 में जब तत्कालीन अमेरिका समर्थित शाह पहलवी को हटाकर इस्लामिक क्रांति हुई, तब भारत में जनता पार्टी की सरकार थी। उस सरकार ने भी कट्टर इस्लामिक क्रांति का खुलेमन से स्वागत नहीं किया था।

जो प्रतिक्रिया थी, वह भारत और ईरान के ऐतिहासिक और रणनीतिक रिश्तों के आधार पर थी। लेकिन उसी इस्लामिक क्रांति के शिल्पकार अयातुल्लाह रोहिला खामेनेई का जब 3 जून 1989 को निधन हुआ तो उस वक्त राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे।

उन्होंने अयातुल्लाह के देहांत पर भारत में तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया था। ऐसा ही शोक तब पाकिस्तान ने भी घोषित किया था। लेकिन इस बार पाकिस्तान ने कोई राजकीय शोक घोषित नहीं किया। उलटे ईरान के मामले में वह विरोधी खेमे में खड़ा दिखाई दिया। हो सकता है कि सोनिया गांधी लेख के बहाने राजीव गांधी की मुस्लिम हितैषी नीतियों की याद दिला रही हों।

याद करें, यही वो समय था, जब देश में शाह बानो और राम मंदिर की राजनीति सिर उठा रही थी। साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की चक्की चलने लगी थी। मुस्लिम तुष्टीकरण के चलते कांग्रेस का मुस्लिम वोट बैंक खिसकने लगा था, जो अभी भी आंशिक रूप में ही वापस आया है। अब कांग्रेस की मांग इसी वोट को और मजबूत करने की हो। लेकिन एक बात और याद रखें।

अयातुल्लाह खामेनेई केवल शिया मुसलमानों के नेता थे। और शियाओं में भी केवल बारह इमामो (अरबी में इत्ना आशारिया) को मानने वाले शियाओं के सर्वोच्च नेता थे। ये बारह इमाम अरब में ई.स. 599 से लेकर 869 तक हुए (सुन्नी मुसलमान इन्हें नहीं मानते)।

बारह शब्द इस विश्वास पर आधारित है कि पैगंबर मुहम्मद के परिवार से बारह पुरुष वंशज (अली इब्न अबी तालिब से लेकर मुहम्मद अल-महदी तक) वो इमाम हैं, जिन्होंने इस्लाम में शरिया की धार्मिक और न्यायसंगत व्याख्या की।

इनमे से आखिरी इमाम अल मेहदी को शिया अमर मानते हैं, जबकि बाकी 11 में से दो की हत्या और नौ को जहर देकर मार दिया गया। मारने वाले भी उनके करीबी ही थे। वैसे इस्लाम के शिया सम्प्रदाय में भी कई उपसम्प्रदाय हैं। मसलन जैदी शियाओं का कोई एक धार्मिक नेता नहीं है।

ये बारह में से केवल पांच इमामों को ही मानते हैं। शियाओं का एक और उपसम्प्रदाय कासेनिया शियाओं का है, जो चार इमामों को मानते हैं। जबकि दाउदी बोहरा शियाओं के सर्वोच्च नेता सैयदना साहब और इस्माइली आगाखानी शियाओं के सर्वोच्च नेता प्रिंस आगाखान हैं।

भारत में करीब पच्चीस करोड़ मुसलमानों में से करीब 20 फीसदी शिया हैं और कुल शियाओं में 80 फीसदी बारह इमामत को मानने वाले हैं। अगर सोनिया गांधी इसी वर्ग को एड्रेस कर रही हैं तो कांग्रेस को वोट की दृष्टि से कितना फायदा होगा, समझा सकता है। जबकि ईरान के मसले में विश्व में शिया सुन्नी-विभाजन एक बार फिर से और गहरा गया है।

भारत में 80 फीसदी मुस्लिम वोटर सुन्नी हैं। जहां तक राजकीय शोक घोषित करने की बात है तो दुनिया में ईरान के अलावा केवल शिया बहुल इराक ने तीन दिन का राजकीय शोक घोषित किया। एक और शिया बहुल देश अजरबैजान ने केवल शोक जताया। बाकी सुन्नी देश मोटे तौर पर खामोश ही हैं।

भारत में भी जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, वो बारह इमामतपंथी शिया मुसलमान ही कर रहे हैं। इसमें भी कश्मीर घाटी में हो रहे प्रदर्शन के पीछे वहां की स्थानीय राजनीति ज्यादा है। सुन्नी महबूबा मुफ्ती अगर इन प्रदर्शनों का खुलकर समर्थन कर रही हैं तो इसके पीछे शिया मुसलमानों का वोट बैंक नेशनल कांफ्रेंस से छीनना है।

अमूमन कोई भी देश किसी महान व्यक्तित्व के निधन पर शोक तभी जताता है, यदि वह राष्ट्राध्यक्ष हो अथवा उसका कोई सकारात्मक वैश्विक योगदान हो। दिवंगत अयातुल्लाह ईरान में इस्लामिक क्रांति करने वाले अयातुल्लाह रोहिला के उत्तराधिकारी थे न कि उस क्रांति के शिल्पकार। महिलाओं के बारे में उनकी सोच तो जगजाहिर है ही।

अलबत्ता उन्हें इस बात का श्रेय जरूर दिया जा सकता है कि उन्होंने ईरान में इस्लामिक सत्ता को स्टील फ्रेम में बदलने के लिए पूरी ताकत लगा दी और इसके खिलाफ उठने वाली हर आवाज को कुचलने में रत्तीभर संकोच नहीं किया।

उदार इस्लाम की जगह कट्टर इस्लाम से ईरान की पहचान को जोड़ा और विश्व में अपने दुश्मनों को कमजोर करने के लिए तीन बड़े आतंकी संगठन खड़े किए, उन्हें पाला पोसा। उन्होंने महाबली अमेरिका की दादागिरी को निर्भीकता से चुनौती दी और ईरान को परमाणु शक्ति बनाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी।  

जहां तक भारत के साथ ईरान के रिश्तों की बात है तो यह मोटे तौर पर ठीक ही रहे हैं।  यूं तो ईरानियों को आर्यों की अलग हुई शाखा के रूप में भी माना जाता है। उनकी फारसी भाषा हमारी संस्कृत जितनी ही पुरानी और समृद्ध है। लेकिन यह वही ईरान है, जहां इस्लाम के आगमन के बाद वहां के लोगों ने अपने ही पुरूखों का पारसी धर्म मानने वालों को देश छोड़ने पर विवश किया।

ईरान में अपनो के प्रति असहिष्णुता की कहानी तभी से शुरू होती है, जो आज तक जारी है। ईरान और भारत के बीच लोग आते-जाते रहे हैं। व्यापार भी होता रहा है। मुगलों के जमाने में बादशाह हुमायूं ईरान से लौटकर कई ईरानी विद्वानों को साथ लेता आया। उसका नतीजा यह हुआ कि मुगल दरबार की राजभाषा फारसी बनी, जिसका कुछ असर अभी तक है। 

ईरानियों ने भारत को जो दिया, उसी तरह लूटा भी। नादिरशाह दुर्रानी 1739 में ईरान से ही आया था, और वो अपने साथ कोहिनूर, दरिया ए नूर जैसे हीरे और मुगल बादशाह के सोने से बने अप्रतिम तख्ते ताऊस के साथ साथ अकूत सोना चांदी लूट कर ले गया। यही नहीं, उसने दिल्ली में कत्लेआम मचाया, जिसमें मरने वाले भी बड़ी तादाद में मुसलमान ही थे।

इसमें से दरिया- ए- नूर हीरा तो आज तक ईरान ने हमे नहीं लौटाया। वह ईरानी की सेंट्रल बैंक में रखा है। और तख्ते ताऊस को तोड़ ताड़ कर उसका सोना जवाहरात ईरानी राजा ने अपने सिंहासन में जड़वा लिए।

नादिरशाह के बाद उसके उत्तराधिकारी अहमदशाह अब्दाली ने भारत को चार बार लूटा और देश में उभरती मराठों की ताकत को पंगु बनाकर चला गया। 

अगर खामेनेई के निधन पर शोक का नैतिक कारण माने तो भारत के आजाद होने के बाद ईरान के तत्कालीन शाह के साथ हमारे रिश्ते ठीक ही थे, लेकिन उसका झुकाव मुस्लिम होने के कारण पाकिस्तान की तरफ ज्यादा रहा। इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान की विदेश नीति शिया-सुन्नी तराजू पर ज्यादा निर्धारित होने लगी।

वहां के शासकों ने भारत के मामले में संतुलन बरतने की कोशिश की। अयातु्ल्लाह अली खामेनेई ने कश्मीर मुद्दे पर केवल एक बार भारत का खुलकर साथ 1991 में दिया था, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंहराव की पहल पर उसने संयुक्त राष्ट्र संघ में इस्लामिक देशों के संगठन द्वारा कश्मीर पर भारत के खिलाफ लाए गए प्रस्ताव का विरोध कर उसे रूकवा दिया था। तो क्या कांग्रेस उसी का अहसान का बदला चुकाना चाह रही है?

इस एक उदाहरण को छोड़ दिया जाए तो भारत के मुसलमानों और कश्मीर को लेकर ईरान का रवैया भारत के अनुकूल नहीं रहा है। जबकि हमने ईरान की कई तरह से मदद की।  कश्मीर से धारा 370 हटाने पर ईरान ने भारत की खुलकर आलोचना की तो भारत ने उसका कड़ा विरोध किया था।

अयातुल्लाह कई बार भारत के मुसलमानों की स्थिति को लेकर सवाल उठाते रहे, लेकिन आपसी रिश्तों में यह मामला कटुता तक नहीं पहुंचने दिया गया। वैसे अयातुल्लाह 1990 में एक बार भारत यात्रा पर आए थे और वो कर्नाटक और श्रीनगर गए थे। उन्होंने श्रीनगर में मुसलमानों की सभा को सम्बोधित किया था। कहते हैं कि उनके भाषण के बाद वहां शिया और सुन्नियों में भाईचारा बढ़ गया था। हालांकि वो इस बार उनके निधन पर नहीं दिखा।   

अब सवाल ये कि भारत को और उसके प्रधानमंत्री को अपनी प्रतिक्रिया क्या और कैसी देनी चाहिए थी? या फिर चुप रहना ही बेहतर था? अगर ईरान को भारत हितैषी के रूप में देखें तो इतिहास इसकी बहुत पुष्टि नहीं करता और हर धार्मिक नेता के निधन पर देश को प्रतिक्रिया देना आवश्यक नहीं है।

फिर भी मोदी मानवीय आधार पर शोक जता सकते थे। लेकिन लगता है, उन्होंने किसी वोट बैंक को एड्रेस करने की जगह व्यावहारिकता को तरजीह दी। इसका एक कारण तो अमेरिका का दबाव तो होगा ही, दूसरा कारण इजराइल से हमारी बढ़ती नजदीकी और बदलता वर्ल्ड ऑ र्डर है। आज ईरान के साथ भारत तो क्या दुनिया का कोई भी देश खुलकर नहीं खड़ा है।

रूस और चीन भी केवल बयानों की बाटियां सेंक रहे हैं, ऐसे में भारत ईरान के साथ हमदर्दी जताकर भी क्या हासिल कर लेता। कर भी लेता तो इस बात की क्या गारंटी है कि ईरान में यही सत्ता कायम नहीं रहेगी और भविष्य में भारत किसी संकट में फंसेगा तो क्या ईरान उसका आंख मूंदकर समर्थन करेगा?

बेशक परमाणु बम बनाने के नाम पर अमेरिका और इजराइल ने ईरान के साथ जो किया  है, वो वैश्विक भी आतंकवाद ही है, लेकिन आतंकी संगठनों को पोस कर ईरान भी प्रकारांतर से वही कर रहा है। ऐसे में ‘वेट एंड वॉच’ ही ज्यादा भली है या अति उत्साह में कोई प्रतिक्रिया देना?


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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