अरावली पर्वत श्रृंखला का खिलता सौंदर्य: खूबसूरत पहाड़ियां, जहां संस्कृति के रंग बिखरे हैं..!

Dr.Prabhat Kumar Singhal डॉ. प्रभात कुमार सिंघल
Updated Thu, 23 Sep 2021 12:56 PM IST

सार

अरावली भारत की भौगोलिक संरचना में सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो करीब 870 मिलियन वर्ष प्राचीन है। भारत के राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के साथ ही पाकिस्तान के पंजाब और सिंध में स्थित है।

अरावली पर्वत श्रृंखला को क्षेत्रीय स्तर पर ‘मेवात’ भी कहा जाता है। राजस्थान राज्य के पूर्वोत्तर क्षेत्र से गुजरती 560 किलोमीटर लंबी इस पर्वतमाला की कुछ चट्टानी पहाड़ियां दिल्ली के दक्षिण हिस्से तक चली गई हैं।

इस श्रृंखला के महत्व के बारे में बता रहे हैं वरिष्ठ स्तंभकार, प्रभात कुमार सिंघल
अरावली भारत की भौगोलिक संरचना में सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो करीब 870 मिलियन वर्ष प्राचीन है।
अरावली भारत की भौगोलिक संरचना में सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो करीब 870 मिलियन वर्ष प्राचीन है। - फोटो : social media
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विस्तार

सालभर में बरसात का मौसम ही भारत की अरावली पर्वत श्रृंखला का हरियाली से श्रृंगार कर चित्ताकर्षक बना देता है। जब बरसात होती है तो दूर से पर्वतों की चोटियां बादलों से गले लगती नज़र आती हैं। महसूस होता है जैसे पहाड़ों से बदल निकल रहे हों।
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उदयपुर में अपनी नियुक्ति के दौरान कई बार बरसात में अरावली की विस्तृत श्रृंखला के मानसूनी सौंदर्य को निहारने का मौका मुझे मिला। आप किसी भी वाहन से पर्वतों के सहारे-सहारे जा रहे हो और बरसात हो रही हो तो अरावली के ये खूबसूरत नज़ारे देख आप रोमांचित हो उठेंगे और मोबाइल से क्लिक करने से अपने को नहीं रोक सकेंगे।


       
अरावली भारत की भौगोलिक संरचना में सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला है जो करीब 870 मिलियन वर्ष प्राचीन है। भारत के राजस्थान, हरियाणा और गुजरात के साथ ही पाकिस्तान के पंजाब और सिंध में स्थित है।

अरावली पर्वत श्रृंखला को क्षेत्रीय स्तर पर ‘मेवात’ भी कहा जाता है। राजस्थान राज्य के पूर्वोत्तर क्षेत्र से गुजरती 560 किलोमीटर लंबी इस पर्वतमाला की कुछ चट्टानी पहाड़ियां दिल्ली के दक्षिण हिस्से तक चली गई हैं।

इस श्रृंखला का उत्तरी किनारा हरियाणा से लगी दिल्ली सीमा तक जाता है। इसका दक्षिणी छोर अहमदाबाद के निकट पालनपुर तक है। यह पर्वत प्राचीन भारत के सप्तकुल पर्वतों में से एक है। इसे भी हिन्दूकुश पर्वत की तरह पारियात्र या पारिजात पर्वत कहा जाता है, वह इसलिए कि यहां पर पारिजात वृक्ष पाया जाता है। 

पर्वतारोहियों का पसंदीदा स्थल

राजस्थान की अरावली श्रृंखला पर्वतारोहियों का पसंदीदा स्थल है। पर्वत क्षेत्र में जंगल, वनस्पति, वन्यजीव, झीलें, नदियां और लहराते हुए घास के मैदानों, खनिजों के भंडार के साथ-साथ सैलानियों के आकर्षण के अनेक पर्यटन स्थल अरावली पर्वत श्रृंखला को बहुत खास बना देते हैं।

अरावली पर्वत की सबसे ऊंची चोटी ‘गुरु शिखर’ माउंट आबू में 5,653 फुट (1,723 मीटर) ऊंची है। यही पर सेर चोटी 1597 मीटर, अचलगढ़ चोटी 1380 मीटर, देलवाड़ा चोटी 1442 मीटर एवं आबू चोटी 1295 मीटर है। 

इसकी चोटियां पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। इनको देखने के लिए देश-विदेश से लोग आते हैं। माउंट आबू , कुंभलगढ़ और रणकपुर का जैन मंदिर भी विशेष रुप से प्रसिद्ध है। अरावली के उत्तर-पश्चिम में जोधपुर, जैसलमेर, बाड़मेर और बीकानेर के क्षेत्र आते हैं, जो कि इसकी हरियाली को बीच में रोकते हैं।

अरावली के उत्तरी क्षेत्र में कई पवित्र और भव्य स्थान हैं। यह बहुत ही व्यापक क्षेत्र में फैले हुए हैं। अरावली की श्रृंखला राज्य के 12 जिलों में विस्तृत है यथा इसका कुछ भाग बूंदी जिले मै भी आता है।

अरावली पर्वत की सबसे ऊंची चोटी ‘गुरु शिखर’ माउंट आबू में 5,653 फुट (1,723 मीटर) ऊंची है।
अरावली पर्वत की सबसे ऊंची चोटी ‘गुरु शिखर’ माउंट आबू में 5,653 फुट (1,723 मीटर) ऊंची है। - फोटो : Social media

अरावली पर्वत और सिरोही

सिरोही जिला अरावली पहाड़ियों के दक्षिण पश्चिमी छोर पर घने जंगलों के बीच बसा राजस्थान एवं गुजरात का सीमावर्ती जिला है। माउण्ट आबू भारत का प्राचीनतम पर्वत है। यह क्षेत्र मौर्य, क्षत्रप, हूण, परमार, राठौर, चौहान, गुहिल आदि शासकों के अधीन रहा। प्राचीन समय में यह आर्बुदा प्रदेश के नाम से जाना जाता था। देवड़ा राजा रायमल के पुत्र शिव भान ने सरणवा पहाड़ी पर एक दुर्ग की स्थापना की एवं 1405 ई. में शिवपुरी नगर बसाया जिसे आज सिरोही के नाम से जाना जाता है।

कर्नल जेम्स टॉड के अनुसार चन्द्रावती नगर में 999 मंदिर थे। मंदिरों की बहुतायत होने से इसे देव नगर कहा जाता है। इनका शिल्प देखते ही बनता है। इसका प्राचीन नाम ’शिवपुरी’ था। सिरोही में आबू पर्वत राजस्थान की सबसे ऊॅची चोटी गुरु शिखर 1722 मीटर तथा दूसरी ऊंची चोटी 1597 मीटर ’सेर’ की है। माउंट आबू पर्वत जहां ऋषि-मुनियों की तपोभूमि, शूरवीरों की कर्मभूमि, धर्म-कला-संस्कृति का पोषक है वहीं संगमरमर, ग्रेनाइट, टगस्टन, केल्साइट, चूना पत्थर एवं वोल्सटोनाइट खनिजों का भंडार अपने गर्भ में लिए है। इस पर्वतीय जिले के 31 प्रतिशत भू-भाग पर वन पाये जाते हैं।

सालर, बबूल, धोकड़ा, सिरस, तेन्दु, खैर, कूमठा, बहेडा एवं बांस के वृक्ष पाये जाते हैं। यहाँ आबू पर्वत अभयारण्य है। इसमें पेंथर, भालू, जंगली सूअर, लंगूर, भेड़िया, लोमड़ी, जरख, सियार, खरगोश, जंगली मुर्गा, जगंली बिल्ली, बिज्जू, तीतर, बटेर एवं बुलबुल आदि अन्य जीव प्रमुखता से पाये जाते हैं। जिले में आदिवासी गरासिया की रंग-बिरंगी संस्कृति उनकी चटक-चमकीली वेशभूषा, गीत एवं नृत्य देखते ही बनते हैं। महिलाओं का सामूहिक रूप से किए जाने वाला वाला वाल र नृत्य विशेष लोकप्रिय है। जीरावल में लगभग 2000 वर्ष प्राचीन जैन मंदिर भी दर्शनीय हैं। सारनेश्वर मंदिर, मीर पुर मंदिर एवं सर्वधर्म मंदिर भी सिरोही के अन्य दर्शनीय मंदिर हैं।

अरावली पर्वत श्रृंखला के सिरोही जिले में माउंट आबू पर्वत पर्यटन के लिहाज से राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है।
अरावली पर्वत श्रृंखला के सिरोही जिले में माउंट आबू पर्वत पर्यटन के लिहाज से राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। - फोटो : Facebook/World of Rajasthan

माउंटआबू पर्वत

अरावली पर्वत श्रृंखला के सिरोही जिले में माउंट आबू पर्वत पर्यटन के लिहाज से राजस्थान का एकमात्र हिल स्टेशन है। माउंट आबू का नाम अर्बुदा नामक सांप के नाम पर पड़ा जिसने भगवान शिव के नंदी बैल की रक्षा की थी। रोमांचक रास्ते, मनमोहक झीलें, उत्तम पिकनिक स्पॉट और ठंडा मौसम, जो राजस्थान के अन्य हिस्सों से अलग है, माउंट आबू को पसंदीदा पर्यटक स्थल बनाता है। हनीमून प्वाइंट और सनसेट पोइंट लोकप्रिय हैं।

अचलगढ़

अरावली पर्वतमाला के एक ऊंचे शिखर पर स्थित अचलगढ एक प्राचीन दुर्ग है। मेवाड़ के महाराणा कुम्भा ने इसी प्राचीन दुर्ग के भगनावशेषों पर एक नये दुर्ग का निर्माण करवाया जो अचलगढ़ के नाम से विख्यात है। सुदृढ़ प्राचीर और विशाल बुर्जों से युक्त अचलगढ़ दुर्ग स्थापत्य का अच्छा उदाहरण है। दुर्ग के भीतर कुम्भा के राजप्रासाद, उनकी ओखा रानी का महल, अनाज के कोठे (अन्न भण्डार) सैनिकों के आवास गृह, पानी के विशाल टांके, अतुल जलराशि से परिपूर्ण सावन-भादो झील, परमारों द्वारा निर्मित खतरे की सूचना देने वाली बुर्ज आदि के भग्नावशेष दर्शनीय हैं।  

नक्की झील

पहाड़ों के बीच स्थित  नक्की झील बहुत खूबसूरत झील है। यह भारत की एकमात्र कृत्रिम झील है जो समुद्र तल से 1200 मीटर ऊंचाई पर स्थित है। माना जाता है कि इस झील का निर्माण देवताओं ने अपने नाखुनों से किया था इसलिए इसका नाम नक्की झील पड़ा। झील में बोटिंग की सुविधा भी उपलब्ध है। नक्की झील के पास ही रघुनाथजी मंदिर भी है।

देलवाड़ा के मन्दिर

संगमरमर से 11वीं और 13वीं सदी के बीच बने नक्काशीदार जैन मन्दिरों के समूह में पांच मन्दिर बनाए गए हैं। इनमें दो मन्दिर विशाल एवं भव्य हैं तथा तीन मन्दिर उनके अनुपूरक मन्दिर हैं। सबसे बड़ा विमल वसाही मन्दिर प्रथम जैन तीर्थंकर भगवान आदिनाथ को समर्पित है। इस मन्दिर का निर्माण गुजरात के चालुक्त राजा भीमदेव के मंत्री और सेनापति विमल शाह ने 1031 ई. मेंं पुत्र प्राप्ति की इच्छा पूर्ण होने पर करवाया था। यह मन्दिर करीब 98 फीट लम्बा एवं 42 फीट चौड़ा है। 

मन्दिर के स्तम्भ, दीवार, तोरण, छत एवं गुम्बज की बारीक नक्काशी और मूर्ति शिल्प आश्चर्यचकित करता है। मन्दिर में 57 देवरियां स्थापित हैं जिनमें तीर्थंकरों एवं अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित की गई हैं। दूसरा बड़ा लून वसाही मंदिर भी कला का उत्कृष्ट नमूना है। इस मन्दिर का निर्माण सोलंकी शासक तेजपाल और वास्तुपाल ने करवाया था।

मन्दिर के रूप मण्डप का गुम्बद विमल वसाही के गुम्बद से अधिक बड़ा और आकर्षक है। गुम्बद के किनारे वृत्ताकार पट्टियों में 72 तीर्थंकरों की प्रतिमाएं बैठी हुई मुद्रा में हैं। मन्दिर के गलियारों में तीर्थंकर नेमीनाथ के जीवन की प्रमुख घटनाओं को पाषाण में खूबसूरती से तराशा गया है। इन मन्दिरों के साथ - साथ पीतलहर मन्दिर एवं चतुर्भुज मन्दिर भी दर्शनीय हैं।  मंदिर माउंट आबू को खूबसूरत जैन तीर्थ बना देते हैं।

माउंट आबू से 15 किमी.दूर  गुरू शिखर अरावली पर्वत माला की सबसे ऊंची चोटी है।
माउंट आबू से 15 किमी.दूर  गुरू शिखर अरावली पर्वत माला की सबसे ऊंची चोटी है। - फोटो : Social media

अर्बुदा देवी मंदिर

आबू की पहाडी पर स्थित माॅ अर्बुदा देवी का मंदिर का महत्व इसी से लगाया जा सकता है कि सती (पार्वती) के 51 शक्तिपीठों में इसका स्थान आता है, यहां सति के होठ गिरे थे। माउंट आबू से 3 किलोमीटर दूर एक पहाडी की चोटी पर स्थित यह मंदिर तक पहुंचने के लिए 365 सीढ़ियां बनाई गई है। पूरे रास्ते में आस-पास का प्राकृतिक दृश्य अत्यन्त मनोहारी होता है।  माता का मंदिर एक प्राकृतिक गुफा के रूप में निर्मित है, जहां माता की ज्योत निरंतर जलती रहती है। श्रद्धालुओं को गुफा के सकडे मार्ग से बैठकर जाना पडता है। 

गुरु शिखर

माउंट आबू से 15 किमी.दूर  गुरू शिखर अरावली पर्वत माला की सबसे ऊंची चोटी है, जिस के उत्तर-पश्चिम में श्वेत रंग के भवन में गुरु दत्तात्रेय मंदिर है। समीप ही रामानंद के चरण चिन्ह बने हैं।  शिखर पर  भव्य पीतल का घण्टा लगा है। यहां से आबू का सम्पूर्ण दृश्य चित्ताकर्षक नजर आता है।

अचलेश्वर महादेव

आबू पर्वत पर अचलगढ़ पहाडियों पर अचलगढ़ किले के समीप स्थित अचलेश्वर महादेव का प्राचीन मंदिर भारत का अकेला ऐसा मंदिर है जहां शिव के अंगूठे की पूजा होती है। मंदिर में पंच धातु से बनी नंदी की एक विशाल प्रतिमा, गर्भगृह में शिवलिंग जिसके ऊपर एक तरफ पैर के अंगूठे का निशान उभरा हुआ है, को स्वयंभू शिवलिंग के रूप में पूजा जाता है।

यह देवाधिदेव शिव का दांहिना अंगूठा माना जाता है। गर्भगृह के बाहर वराह, नरसिंह, वामन, कच्छप, मत्स्य, कृष्ण, राम, परशुराम, बुद्ध एवं कलंगी अवतारों की श्यामवर्णीय पाषाण की भव्य मूर्तियां स्थापित हैं। परिसर में द्वारिकाधीश का मंदिर भी स्थित है।  

सरकारी संग्रहालय

संग्रहालय में पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के हथियार, वाद्य यंत्र, महिलाओं के गहने और वस्त्र प्रदर्शित किए गए हैं। संग्रहालय का मुख आकर्षण 6 ठीं से 12वीं शताब्दी के बीच की देवदासी या नर्तकियों की मूर्तियां, चक्रबाहु शिव की प्रतिमा, 404 प्राचीन मूर्तियों का संग्रह और विष कन्या की प्रतिमा शामिल है।

आवागम की दृष्टि से राष्ट्रीय राजमार्ग संख्या 14 एवं 27 सिरोही जिले से हो कर गुजरता है। मार्ग संख्या 27 पिण्डवाड़ा से शिवपुरी तक जाता है। आबू रोड़ रेल स्टेशन है। देश की राजधानी दिल्ली के साथ-साथ भारत एवं राजस्थान के सभी प्रमुख स्थलों से बस सेवा द्वारा जुड़ा है। गुजरात एवं मध्य प्रदेश भी बसें यहां उपलब्ध होती हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें [email protected] पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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