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सुरों की विदाई, शोर का साम्राज्य: राग-प्रधान गरिमा की जगह इलेक्ट्रॉनिक बीट्स ने ली
Sun, 19 Apr 2026 07:50 AM IST
Nitin Gautam
विवेक विशाल, अमर उजाला, नई दिल्ली
विवेक विशाल, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: Nitin Gautam
Updated Sun, 19 Apr 2026 07:50 AM IST
सार
पूर्ववर्ती काल में संगीतकार घंटों बैठकर राग ‘यमन’, ‘भैरवी’ या ‘दरबारी’ की बंदिशों को फिल्मी परिवेश में ढालते थे, जिससे गीतों में एक गंभीर ठहराव आता था।
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भारतीय संगीत
- फोटो : फ्रीपिक
विस्तार
भारतीय सिनेमा का संगीत कभी भावनाओं की वह अविरल धारा थी, जिसमें डूबकर श्रोता सुध-बुध खो बैठता था। वह ऐसा स्वर्ण युग था, जब फिल्मों के गीत केवल मनोरंजन का साधन मात्र न होकर भारतीय शास्त्रीय संगीत की सुदृढ़ नींव पर आधारित होते थे। नौशाद, मदन मोहन, एस.डी. बर्मन, जयदेव और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे मनीषियों ने रागों की शुद्धता को जनमानस की संवेदनाओं से जोड़कर ऐसी कालजयी रचनाएं दीं, जो दशकों बाद भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। साहिर की दार्शनिकता, मजरूह की रूमानी नजाकत और गुलजार के बिंबों से सजे वे गीत केवल सुरों का मेल नहीं, बल्कि जीवन का दर्शन होते थे।
आज बॉलीवुड संगीत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से पीछे मुड़कर देखने पर गौरवशाली अतीत की स्मृतियां शेष हैं और सम्मुख एक दिशाहीन, शोर से भरा भविष्य। जिसे हम ‘संगीत का गिरता तारा’ कह रहे हैं, वह वस्तुतः हमारी सृजनात्मकता का संकट और सांस्कृतिक धरोहर का क्रमिक अवसान है। वर्तमान परिवेश में मौलिक सृजन का स्थान ‘संशोधन’ और ‘पुनर्निर्माण’ ने ले लिया है। पाश्चात्य शैली के अंधानुकरण ने भारतीय धुनों के उस नैसर्गिक माधुर्य को हाशिए पर धकेल दिया है, जो कभी लोक-धुनों की मिठास से ओत-प्रोत होता था।
वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में हमने ‘इलेक्ट्रॉनिक बीट्स’ को तो अपना लिया, किंतु उस राग-प्रधान गरिमा को विस्मृत कर दिया, जो श्रोता के अंतर्मन को उद्वेलित कर देती थी। आज का संगीत धैर्य और साधना से पूरी तरह विमुख हो चुका है। पाश्चात्य ‘पॉप’ और ‘हिप-हॉप’ के बढ़ते वर्चस्व ने सितार, सरोद और बांसुरी जैसे भारतीय वाद्यों की मधुर ध्वनि को यांत्रिक शोर के पीछे ओझल कर दिया है।
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विडंबना यह है कि सुरों और शब्दों का वह अनूठा सामंजस्य, जो कभी हमारी काव्य परंपरा की विशिष्टता था, अब सोशल मीडिया पर ‘वायरल’ होने की प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ चुका है। ‘हुक लाइन’ के व्यावसायिक प्रलोभन में भाषा की मर्यादा और छंदों के सौंदर्य की बलि दी जा रही है। गीत अब श्रोता से संवाद नहीं करते, केवल क्षणिक उत्तेजना उत्पन्न करते हैं। साथ ही, संगीत अब ‘साधना’ के स्थान पर पूरी तरह ‘सॉफ्टवेयर’ का विषय बन चुका है। ‘ऑटो-ट्यून’ जैसे डिजिटल उपकरणों ने मानवीय कंठ की उस नैसर्गिक खनक को सोख लिया है, जो कभी बिना किसी साज-सज्जा के भी रोंगटे खड़े कर देने की सामर्थ्य रखती थी। बॉलीवुड का यह ढलान एक गंभीर चेतावनी है कि यदि हमने अपनी जड़ों की ओर लौटकर शास्त्रीय शुद्धता और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक रिक्त कोलाहल ही छोड़ जाएंगे।
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आज बॉलीवुड संगीत एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहां से पीछे मुड़कर देखने पर गौरवशाली अतीत की स्मृतियां शेष हैं और सम्मुख एक दिशाहीन, शोर से भरा भविष्य। जिसे हम ‘संगीत का गिरता तारा’ कह रहे हैं, वह वस्तुतः हमारी सृजनात्मकता का संकट और सांस्कृतिक धरोहर का क्रमिक अवसान है। वर्तमान परिवेश में मौलिक सृजन का स्थान ‘संशोधन’ और ‘पुनर्निर्माण’ ने ले लिया है। पाश्चात्य शैली के अंधानुकरण ने भारतीय धुनों के उस नैसर्गिक माधुर्य को हाशिए पर धकेल दिया है, जो कभी लोक-धुनों की मिठास से ओत-प्रोत होता था।
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वैश्वीकरण की अंधी दौड़ में हमने ‘इलेक्ट्रॉनिक बीट्स’ को तो अपना लिया, किंतु उस राग-प्रधान गरिमा को विस्मृत कर दिया, जो श्रोता के अंतर्मन को उद्वेलित कर देती थी। आज का संगीत धैर्य और साधना से पूरी तरह विमुख हो चुका है। पाश्चात्य ‘पॉप’ और ‘हिप-हॉप’ के बढ़ते वर्चस्व ने सितार, सरोद और बांसुरी जैसे भारतीय वाद्यों की मधुर ध्वनि को यांत्रिक शोर के पीछे ओझल कर दिया है।
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विडंबना यह है कि सुरों और शब्दों का वह अनूठा सामंजस्य, जो कभी हमारी काव्य परंपरा की विशिष्टता था, अब सोशल मीडिया पर ‘वायरल’ होने की प्रतिस्पर्धा की भेंट चढ़ चुका है। ‘हुक लाइन’ के व्यावसायिक प्रलोभन में भाषा की मर्यादा और छंदों के सौंदर्य की बलि दी जा रही है। गीत अब श्रोता से संवाद नहीं करते, केवल क्षणिक उत्तेजना उत्पन्न करते हैं। साथ ही, संगीत अब ‘साधना’ के स्थान पर पूरी तरह ‘सॉफ्टवेयर’ का विषय बन चुका है। ‘ऑटो-ट्यून’ जैसे डिजिटल उपकरणों ने मानवीय कंठ की उस नैसर्गिक खनक को सोख लिया है, जो कभी बिना किसी साज-सज्जा के भी रोंगटे खड़े कर देने की सामर्थ्य रखती थी। बॉलीवुड का यह ढलान एक गंभीर चेतावनी है कि यदि हमने अपनी जड़ों की ओर लौटकर शास्त्रीय शुद्धता और आधुनिकता के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया तो हम आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल एक रिक्त कोलाहल ही छोड़ जाएंगे।