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Benevolent And Destructive Form Of Shiva: शिव का कल्याणकारी और संहारक रूप

Tue, 15 Jul 2025 02:48 PM IST
Mohan singh मोहन सिंह
Updated Tue, 15 Jul 2025 02:48 PM IST
सार

ब्रह्मा ने शिव से जानना चाहा कि क्या आप नश्वर  प्राणियों को उत्पन्न नहीं कर सकते ? शिव ने सिर हिलाया। मैं केवल  अमर  प्राणियों को ही उत्पन्न कर सकता हूं। अगर इससे आपकी सृष्टि प्रक्रिया निष्प्रभावी होती है, तो मैं इसका हिस्सा नहीं बनूंगा।

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The benevolent and destructive form of Shiva
भगवान शिव। - फोटो : Adobe Stock

विस्तार

ऋग्वेद में शिव के दो रुप मिलते हैं। रुद्र के रूप में  वे  एक शक्तिशाली और उग्र देवता के रुप में चित्रित किये गए हैं। जो तूफान, बारिश और विनाश से जुड़े हैं। शिव रुप में उन्हें  कल्याणकारी और सर्वव्यापी कहा गया है। ऋग्वेद में में पाये जाने वाले 'महामृत्युंजय मंत्र' में उन्हें  अमरता प्रदान करने  वाले देवता के रुप में चित्रित किया गया है। एक पौराणिक कथा है।

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जब ब्रह्मा ने शिव से सृष्टि में सहयोग करने का अनुरोध किया, तो  शिव ने ब्रह्मा के सामने ऐसे ग्यारह रुद्र खड़े कर दिये, जो उनके ही प्रतिरुप थे और अमर थे।ब्रह्मा को यह चिंता सताने लगी  कि इससे  तो ब्रह्मामांडीय संतुलन ही बिगड़ जायेगा। सृष्टि में केवल नाशवान्   प्राणी ही जन्म ले सकते हैं। पृथ्वी पर रहने वाले प्राणी अमर कैसे हो सकते हैं? फिर तो सृजन-संरक्षण और विनाश का चक्र ही गड़बड़ हो जायेगा।
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ब्रह्मा ने शिव से जानना चाहा कि क्या आप नश्वर  प्राणियों को उत्पन्न नहीं कर सकते ? शिव ने सिर हिलाया। मैं केवल  अमर  प्राणियों को ही उत्पन्न कर सकता हूं। अगर इससे आपकी सृष्टि प्रक्रिया निष्प्रभावी होती है, तो मैं इसका हिस्सा नहीं बनूंगा।
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पुराणों में भगवान शिव का मनुष्य रुप में भी वर्णन मिलता है। इसे हम 'शिवावतार' कह सकते हैं। इस रुप में वे कभी प्रकट होते हैं, कभी अलक्षित रहते हैं। ऐसे भगवान शिव की तीन जगह उपस्थित बतायी जाती है।

भद्रवट में - जो कैलाश से पूर्व की ओर लौहित्यगिरि के ऊपर है।  दूसरा स्थान कैलाश पर्वत पर और तीसरा मूजवान पर्वत पर। काशी खंड में एक कथा है कि- शिव  ने अपना सारा राज्य मानसरोवर पर  विष्णु भगवान को दे दिया और स्वयं विरक्त होकर एकान्त में रहने लगे

अन्याय के समय देवताओं के प्रार्थना करने पर  वे प्रकट हुए। स्वामी कार्तिकेय की उत्पत्ति के लिए, त्रिपुर- वध  के लिए पार्वती से  विवाह किया। एक पौराणिक कथा यह भी है कि - ब्रह्मा को सृष्टि की सृजन प्रक्रिया समझाने के लिए ही  भगवान शिव ने अर्धनारीश्वर रुप धारण किया। परस्पर विरोधी ऊर्जा का सहजीवी रुप।

अर्धनारीश्वर रुप में ब्रह्मा को संबोधित करते हुए शिव कहते हैं कि - इसकी आवश्यकता क्यों है ?सृजन के लिए! शिव - शक्ति, देव- देवी शक्ति, स्थिर - गतिशील, होने - बनने का  संयुक्त रुप ही सृष्टि का आधार है। स्त्रीलिंग और पुल्लिंग आपकी बनायी सृष्टि के दो अंग हैं। इन दोनों तत्वों के मिलन से ही सृष्टि  प्रक्रिया अनंतकाल तक जारी रहेगी।

इस आख्यान से इतना तो स्पष्ट होता है कि सृजन  का जो  काम अपने विवेक से ब्रह्मा नहीं कर सकें, वह सृष्टि प्रक्रिया सम्पन्न हुई शिव के सलाह  और अर्धनारीश्वर रुप में प्रकट होने से।अब अनन्त काल तक ऐसी चलती रहेगी, उनकी कृपा से। फिर भी लोक में शिव का संहारक रुप ही ज्यादा प्रचलित है। जब कि सृजन और संहार  सृष्टि का अवश्यम्यभावी रुप है। इसके अतिरिक्त जिसने सबका संहार किया, वह तो बचा ही रहेगा। फिर सृष्टि भी वहीं करेगा।

भगवान शिव को पांच कलाओं का अधिष्ठाता होने के कारण के पांच रुपों  में प्रकट माना जाता हैं। आनन्द, विज्ञान, मन , प्राण और वाक्। ये अव्यय पुरुष की पांच कलाएं हैं।  आनन्द रुप की 'मृत्युंजय' नाम से उपासना होती है। दूसरी कला विज्ञानमय शंकरमूर्ति की दक्षिणामूर्ति  नाम से उपासना होती है।

तीसरी मनोमय कला के अधिष्ठाता 'कामेश्वर ' शिव का ही रुप है। शिव  की इस  रुप में उपासना तान्त्रिकों  में प्रसिद्ध है। मन का  प्रथम बीज भी काम ही है। इस लिए  मन को काम प्रधान कहा गया है। ऋग्वेद में कहा गया है -

                 कामास्तग्रे समवर्तताधि  मनसो रेत: प्रथम: यदासीत्।
                 सतो बन्धुमसमति  निरविन्दन् हृदि प्रतीष्या कवयो मनीषा।।(10/129/4ऋग्वेद)


शिव की चौथी कला की  'पशुपति'  और 'नीलोहित ' नामों  से उपासना होती हैं। पांचवीं कला वांग्मय मूर्ति भूतेश  नाम से उपास्य है। शिव के इस अक्षर रुप में उपासना का विधान  हमारे शास्त्रों में किया गया है। हमारे शरीर में भी हृदय कमल में ब्रह्म की, नाभि में विष्णु की और और मस्तिष्क में शिव की उपस्थिति मानी जाती हैं। वृक्षों में यह स्थिति बदल जाती हैं। वहां  मूल से जो रस प्राप्त होता है उसी से उसका पोषण होता है। इस लिए कहा गया है -

मूलत ब्रह्मरुपाय मध्यतो विष्णु रुपिणे। अग्रत: शिवरुपाय अश्वत्थाय नमो नमः।।


शिव ऐसे देवता है जिनकी उपासना देवता और लिंग दोनों रुपों में होती हैं। स्कन्द पुराण में वर्णन मिलता है कि -

                              आकाशं लिंगमित्याहु: पृथ्वीं तस्य पीठिका।
                                आलय: सर्व देवानां    लयनार्लिंगमुच्ते।।


अर्थात् आकाश लिंग रुप है, पृथ्वी उसका आधार है। प्रलय काल में सृष्टि, देवता आदि उसी लिंग में समाविष्ट हो जाते हैं। सभी  देवताओं का  प्रादुर्भाव भी ज्योतिर्लिंग से ही माना गया है ।

शिव का एक विश्वरुपभी है। 'शेरतेsस्मिन् सर्व इति शिव:'  शिव का  यह वह  रुप है, जिसमें सब कुछ समाहित है। अग्नि  जिसका मस्तिष्क है। चन्द्रमा और सूर्य दोनों नेत्र हैं। वेद जिसकी वाणी है। विश्वरुपी  प्राणवायु अर्थात् प्राण जिसके हृदय में है। पृथ्वी पादरुप है। और जो सभी भूतों का अंतरात्मा है।

इनमें सोम तत्व चन्द्रमा रुप में, अप् गंगा रुप में  वायु जटा रुप में  शिव के मस्तक पर विराजमान हैं। इस लिए शिव का एक नाम 'व्योमकेश' है।अर्थात् आकाश तत्व उनकी जटा है। हमारे  शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि भगवान शिव की सावन में निम्न मन्त्रों से उपासना करने पर हर तरह की मनोकामनाएं पूरी होती हैं -
 

ऊं नमः शिवाय।  ऊं भगवते रुद्राय।  धीमहि तन्नो रुद्र प्रचोदयात्। उर्वारुकमिव वन्धनान् मृत्योर्मुक्षीव माममृतात्।।


शतपथ ब्राह्मण में एक कथा आती है। श्रेष्ठता पाने के लिए मन और वाणी में कलह हो गया।  मन का कहना था कि  मेरे द्वारा जो ज्ञात नहीं है, उसे वाणी नहीं बोल सकती। वाणी का कहना था कि तुम जो जानते हो, उसे मैं ही प्रकट करती हूं। अतः मैं  ही श्रेष्ठ हूं। दोनों प्रजापति के पास गये। प्रजापति ने  अपना निर्णय मन  के पक्ष में दिया। अर्थात् वाणी की अपेक्षा मन को श्रेष्ठ माना गया।

इस मन को श्रेष्ठ मानने का एक कारण यह भी हो सकता है कि- मन  ही हमारे कल्याणकारी संकल्प को कार्य  रुप में प्रकट करता है। भगवान शिव का संकल्प भी कुछ ऐसा ही है। समुद्र-मंथन से प्राप्त विष का पान तो जगत् कल्याण के लिए  वे पी गये , पर यह  उनके संकल्प शक्ति की ही  बलिहारी है कि उस विष को गले के नीचे उतरने नहीं दिया। इस लिए वे नीलकंठ कहलाये।वह विष भी कोई ऐसा - वैसा नहीं था। उसके ताप से देवताओं का समूह जलने लगा था। गोस्वामी तुलसीदास लिखते है -


 

 जयंत सकल सूर वृंद, विषम गरल जेहिं पान किय।
 तेहि न भजसि मन मंद को कृपालु संकर सरिस।। 
 यजुर्वेद के 34 वें अध्याय के चौथी ऋचा में ऐसे ही संकल्प को शिवसंकल्प की संज्ञा दी गयी है -
 यत्प्रज्ञानमुत चेतो धृति: च यज्जयोतिरन्तरमृतं  प्रजासु।
 यस्मान्न ऋते किचन कर्म क्रियते तन्मे मन: शिवसंकल्पमस्तु।। 


अर्थात् जिस अमृतस्वरुप मन के द्वारा भूत , भविष्यत् और वर्तमान सम्बन्धी सभी विषयों का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है, जिसके द्वारा सप्तहोतात्मक अग्निष्टोम (सोमयाग का एक प्रकार) सम्पन्न होता है, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प से युक्त हो।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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