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असम के चाय बागानों में फैल रहा तनाव, गहरे संकट में है सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला उद्योग

Fri, 06 Sep 2019 10:52 AM IST
Ravishankar Ravi रविशंकर रवि रवि
Updated Fri, 06 Sep 2019 10:52 AM IST
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Tension spreading in Assam's tea gardens after Doctor's killing
असम के चाय बागान इन दिनों गहरे संकट से गुजर रहे हैं। - फोटो : सोशल मीडिया

टियोक चाय बागान के चिकित्सक ही हत्या के बाद राज्य के बागानों से चिकित्सकों का पलायन हो रहा है तो दूसरी तरफ बोनस के लिए तनाव फैल रहा है। असम के चाय बागान इन दिनों गहरे संकट से गुजर रहे हैं। खर्च बढ़ रहा है, लेकिन उत्पादन स्थिर है। इससे चाय बागानों की आमदनी घटी है।

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चाय श्रमिकों से राजनीतिक हित साधने के चक्कर में उनके लिए कई वादे किए गए। जिनमें दैनिक मजदूरी बढ़ाने और न्यूनतम 20 फीसदी बोनस देने का आश्वासन भी शामिल है। अधिक उत्पादन के चक्कर में चाय की गुणवत्ता गिरी है और इसका असर चाय की कीमत पर पड़ा है। छोटे बागानों की तुलना में बड़े और पुराने चाय बागानों की हालत ज्यादा खराब है। उनके पास स्थाई कर्मचारियों की संख्या ज्यादा है। जिन्हें कई सुविधाएं देनी पड़ती है। जिनमें भविष्य निधि राशि का भुगतान, सस्ते दर पर राशन की व्यवस्था और मजदूरों की चिकित्सा की व्यवस्था शामिल है।
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जबकि छोटे बागानों के पास ज्यादातर अस्थाई मजदूर होते हैं। उन्हें सिर्फ पत्तियों की तुड़ाई के समय लगाया जाता है। उन्हें सिर्फ मजदूरी देनी पड़ती है। जिन बागानों के पास जितने अधिक स्थाई कर्मचारी हैं, उनका खर्च उतना ही ज्यादा है। मौसम की मार हरी चाय के उत्पादन पर पड़ता है। जिस तरीके से पिछले कुछ वर्षोे में चाय पर लागत बढ़ी है, उस  तुलना में बाजार में चाय की कीमत नहीं बढ़ी है। सिर्फ कुछ बागानों के चाय की कीमत ज्यादा है, शेष बागानों के चाय की बिक्री औसतन कम है। इसलिए उनके समक्ष  बागान चलाना मुश्किल हो गया है। 

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Tension spreading in Assam's tea gardens after Doctor's killing
असम में 765 बड़े चाय बागान (टी इस्टेट) और एक लाख से अधिक छोटे-छोटे चाय बागान हैं। - फोटो : सोशल मीडिया

चाय बागान के संचालन के लिए बैंक का रवैया भी अन्य उद्योगों की तरह नहीं है। असम में 765 बड़े चाय बागान (टी इस्टेट) और एक लाख से अधिक छोटे-छोटे चाय बागान हैं। जिनमें करीब 50 से 60 लाख मजदूर काम करते हैं। इन्हें अभी  ब्रह्मपुत्र घाटी में 167 रुपए  और बराक घाटी में 150 रुपए दैनिक मजदूरी मिलती है। भाजपा ने पिछले विधानसभा चुनाव में इस मजदूरी को बढ़ाकर 350 रुपए देने का वादा किया था। इसलिए मजदूर संगठन बीच-बीच में मजदूरी बढ़ाने की मांग करते हैं। असम सरकार ने अपने चाय बागानों के लिए पिछले वर्ष 20 फीसदी बोनस देने की घोषणा की थी। उसके बाद सभी बागानों में 20 फीसदी बोनस देने की मांग उठने लगी।
 

इस संकट के बीच ही जोरहाट जिले के टियोक चाय बागान में मजदूरों ने बागान अस्पताल के चिकित्सक डॉ देबेन दत्त की पीट-पीटकर हत्या कर दी, जबकि वे घर पर लंच के लिए आए थे। इस घटना के बाद अन्य बागानों में तनाव फैल गया और कई बागानों के चिकित्सकों ने इस्तीफा दे दिया है। चिकित्सक की हत्या के खिलाफ असम के सभी चिकित्सकों ने एक दिन की हड़ताल की, जबकि इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने देव्यापी असहयोग की धमकी दी है।

दबाव में राज्य सरकार ने कुछ अभियुक्तों को गिरफ्तार किया और इस मामले में फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिए न्यायिक जांच की घोषणा की है। इसके पहले भी बोनस तथा अन्य विवादों पर बागान के मजदूरों ने अपने बागान के मालिक या प्रबंधकों की हत्या कर दी है। चाय बागानों में प्रबंधन और मजदूर के रिश्ते तनावपूर्ण होना असम के लिए शुभ नहीं है, क्योंकि यह असम में सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला उद्योग है। सरकार को इसमें हस्तक्षेप करना चाहिए।
(लेखक दैनिक पूर्वोदय के संपादक और पूर्वोत्तर मामले के जानकार हैं)

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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