तेलंगाना पुलिस के ‘इंसाफ’ का सबक क्या है?
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तेलंगाना पुलिस की जय जयकार और फूलों की बरसात। एक अहम एनकाउंटर ने अचानक पुलिस की छवि बदल दी। दरअसल, हर रोज़ होने वाली अमानवीय और जघन्य वारदातों से देश जिस तरह हमेशा हिला रहता है, असुरक्षा की जो भावनाएं हमारे यहां लड़कियों और महिलाओं के भीतर गहराई से बैठ चुकी हैं, उस बीच अगर ऐसी कोई सुकून देने वाली ख़बर आ जाए तो बेशक पुलिस की तारीफ की जानी चाहिए।
तेलंगान एनकाउंटर ने एक साथ कई सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे अहम सवाल तो यही कि क्या अपने देश की कानून और अदालतों से लोगों का भरोसा उठ गया है और खासकर जस्टिस डिलेड वाले मामलों को देखते हुए पुलिस को ऐसी ही कार्रवाइयां करने की ज़रूरत है? एनकाउंटर के कितने किस्से पहले सुने जाते रहे हैं, उत्तर प्रदेश पुलिस के कई अफसर तो एनकाउंटर के लिए ही मशहूर हो चुके हैं।
हर एनकाउंटर की अपनी अपनी कहानियां होती हैं और उनसे जुड़े सवाल भी होते हैं। अक्सर एनकाउंटर फर्जी बताए जाते रहे हैं और इसके शिकार ज्यादातर बेगुनाह बताए जाते रहे हैं। ये भी कहा जाता है कि पुलिस अपनी नाकामी छुपाने के लिए और टारगेट पूरा करने के लिए फर्जी मामलों में लोगों को फंसाती है और एनकाउंटर तक कर देती है।
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी और एक ईमानदार पुलिस अफसर माने जाने वाले विभूति नारायण राय तो अपने अनुभवों के आधार पर कहते हैं कि पुलिस को उन्होंने जानवर बनते देखा है और उनके समय में बहुत कम ऐसे संवेदनशील पुलिस वाले होते थे जो सचमुच लोगों की तकलीफें समझकर इंसाफ करते थे। लेकिन उनका ये भी मानना है कि स्थितियां अब बहुत बदली हैं और नए पुलिस अफसर बेहद ईमानदारी और संवेदनशील तरीके से काम कर रहे हैं। तेलंगाना मामला इसकी मिसाल है।
लेकिन तेलंगाना की मिसाल रेप के हर मामले में मिले, यह शायद आसान नहीं है। जाहिर है इससे पूरे देश की पुलिस के भीतर मौजूद उन ईमानदार और मज़बूत इरादे वाले अफसरों का हौसला बढ़ा होगा जो किसी न किसी दबाव की वजह से अपराधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर पाते।
रेप के मामलों में खासकर उत्तर प्रदेश और उत्तर भारत के राज्यों में जिस तरह राजनीतिक संरक्षण और दबंगई का बोलबाला है और गंभीर अपराध भी एक उद्योग बन चुका है, वहां इसका शायद ही कोई असर हो। लेकिन कहीं न कहीं तेलंगाना पुलिस की इस कार्रवाई ने हमारी अदालती प्रक्रिया और जांच एजेंसियों पर तो गंभीर सवाल उठाया ही है।
अपने देश में कानून तो बहुत सारे हैं, जांच के लिए ढेर सारी एजेंसियां भी हैं और ‘तारीख पर तारीख’ जैसे फिल्मी डायलॉग एक हकीकत की तरह हर वक्त सुनाई भी पड़ते रहे हैं। हमारी फिल्में भी अंधे कानून और ज़मानत के खेल की कई मिसालें पेश करती रही हैं। तो क्या ऐसे में ये मान लेना चाहिए कि अब पुलिस बगैर किसी नियम कानून के ऐसे गंभीर अपराधियों को अपने तरीके से मौत के घाट उतार सकती है?
उत्तर प्रदेश में उन्नाव रेप पीड़िता को जलाए जाने का मामला हो, गुड़गांव में स्कूली बच्ची के साथ रेप का मामला हो या फिर रोज़ाना होने वाले ऐसे तमाम मामले हों जिसे लेकर शोर तो खूब होता है, लंबी चौड़ी अदालती कार्रवाइयां भी होती हैं, लेकिन उनका क्या जो इंसाफ की आस में बैठे पीड़ित और उसके परिवार वाले बरसों तक हर रोज़ घुट घुट कर जीते हैं, नेताओं, अफसरों और अदालतों के चक्कर काटते हैं, सियासत के घिनौने खेल देखते हैं और निर्भया जैसे चर्चित मामले में भी इंसाफ की लड़ाई लड़ते लड़ते सात साल से ज्यादा गुज़ार देते हैं।
रेप के दोषियों को फांसी का कानून बन जाता है, लेकिन आरोपी को दोषी बनाने में बरसों लग जाते हैं और एक कोर्ट से दूसरे कोर्ट में अपील कर करके सारी ज़िंदगी गुज़र जाती है। इन हालातों में, देश की घिनौनी सियासत और दबंगई के बेशर्म खेल में क्या तेलंगाना पुलिस की कार्रवाई की तारीफ नहीं की जानी चाहिए? क्या इससे हमारे बाकी ईमानदार पुलिस अफसरों को सबक नहीं लेना चाहिए?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।