बिहार की राजनीति: नए विवाद में फंसे तेजस्वी, क्या है इसका 'अखिलेश कनेक्शन'?
तेजस्वी के उप-मुख्यमंत्री का बंगला खाली करते ही भाजपा की ओर से आरोप लगाया गया कि एसी, सोफा, कुर्सी, पर्दे, लाइटें आदि अनेक सामान गायब हैं। आरोपों पर भड़के तेजस्वी यादव ने आरोप लगाने वालों को कानूनी नोटिस देने की धमकी दी है।
विस्तार
बिहार के नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का भड़कना जायज है। उनपर उप-मुख्यमंत्री के सरकारी बंगले में लगे सामान अपने घर ले जाने के आरोप लगे हैं। उप मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटने के करीब आठ माह बाद तेजस्वी यादव ने उप-मुख्यमंत्री का सरकारी आवास खाली किया है।
बंगला खाली होते ही भाजपा की ओर से आरोप लगाया गया कि एसी, सोफा, कुर्सी, पर्दे, लाइटें आदि अनेक सामान गायब हैं। आरोपों पर भड़के तेजस्वी यादव ने आरोप लगानेवालों को कानूनी नोटिस देने की धमकी दी है।
तेजस्वी पर पहली बार ऐसे आरोप नहीं लगे हैं। इसके पहले भी कई वर्ष पूर्व जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पलटी मारने के बाद वे सत्ता से बाहर हुए तो बंगला खाली करना पड़ा था। तब स्व. सुशील मोदी उप मुख्यमंत्री के रूप में उस बंगले में आए थे।
तब मोदी ने भी पत्रकारों को बंगला दिखाते हुए आरोप लगाया था कि राजमहल के रूप में तेजस्वी ने इस बंगले को विकसित करवाया था। नियम कानून का उल्लंघन कर इसमें सुख सुविधा के साधन लगवाए गए। शौचालय में भी एसी लगवाने की बात उन्होंने बताई थी।
बंगले की साज सज्जा पर अतिरिक्त खर्च के भी लगे थे आरोप
सजावट के कई सामान विदेशों से मंगाए जाने के आरोप लगे थे। ऐसे बंगलों की साज सज्जा के लिए सरकार द्वारा तय खर्च की सीमा से अधिक खर्च किए जाने के आरोप भी लगे थे। उस समय भी तेजस्वी ने जांच कराने की चुनौती दी थी। जांच के बाद भवन निर्माण विभाग ने उन्हें क्लीन चिट दी थी। तब मीडिया ने भी क्लीन चिट मिलने की खबर उस प्रमुखता से नहीं चलाई थी, जैसी प्रमुखता से सामान गायब होने की खबर चली थी। ना ही भाजपा नेताओं ने गलत आरोप लगाने के लिए कोई खेद व्यक्त किया।
अब फिर वैसे ही आरोप लगाए गए हैं। उनकी तुलना यूपी के पूर्व सीएम अखिलेश यादव से की गई जिनपर चुनाव हारने के बाद सरकारी बंगला खाली करते समय अन्य समानों के साथ नल की टोटी खोल कर ले जाने के आरोप लगे थे।
संयोग से तेजस्वी और अखिलेश के बीच रिश्तेदारी भी है। ऐसे आरोप घटिया राजनीति का उदाहरण है। किसी की छवि हनन के लिए ऐसे अप्रमाणित आरोप लगाया जाना राजनीति का मान्य प्रचलन बन गया है। राहुल गांधी की पूरी राजनीति इसी पर टिकी है।
दरअसल भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में अभियुक्त होने के कारण तेजस्वी की छवि ऐसी बन गई है कि लोग उन पर लगे आरोपों पर भरोसा भी कर लेते हैं। किसी नेता पर जब भी ऐसे आरोप लगते हैं तो मीडिया बिना तथ्यों की पड़ताल के उसे ले उड़ता है। यह तरीका ठीक नहीं। इससे मीडिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े होते हैं।
भवन निर्माण विभाग, जो सरकारी भवनों का केयर टेकर होता है, उसकी तरफ से अभी तक ऐसा कोई बयान नहीं आया है जिससे भाजपा के आरोपों की पुष्टि हो। इस विवाद में एक बात सामने आई है कि ऐसे बंगलों की रंगाई-पोताई के लिए सालाना 7 से 10 लाख रुपए सरकार खर्च करती है। इसके अलावा 5 साल में फर्नीचर और साज-सज्जा के लिए 9 लाख रुपए खर्च का प्रावधान है।
लोकतंत्र में सामंतशाही
5 साल के कार्यकाल में 50 लाख रुपए सिर्फ रंगाई-पोताई के लिए खर्च करना क्या भारत जैसे लोकतंत्र के लिए यह न्याय संगत है? यह लोकतंत्र के सामंतशाही में बदलने का परिचायक है। कोई नेता या पार्टी इसका विरोध नहीं करती। इसमें सभी की सहमति होती है। इस देश में करोड़ों करोड़ लोग ऐसे हैं जिनकी पूरे जीवन की कमाई 40 लाख नहीं होती और उनके सेवक होने का दावा करने वाले सोफा और पर्दे पर सिर्फ 5 साल में 40 लाख खर्च कर दें?
बात-बात में संविधान की दुहाई देने वालों, क्या तुम्हें इस पर रंच मात्र भी लज्जा नहीं आती! माफ करना तुम्हारे मुंह से गांधी का नाम शोभा नहीं देता। बहरहाल बिहार के भवन निर्माण विभाग को उप मुख्यमंत्री के बंगले से समानों के गायब होने पर सच्चाई सामने लानी चाहिए, नहीं तो यह माना जाएगा कि तेजस्वी को बदनाम करने में उसकी भी भूमिका है। अगर सचमुच सामान गायब हुए हैं तो तेजस्वी पर मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए।
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