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यूपी में शौचालय बनाने के नाम पर हो रहा है ये काम, शर्मिंदा करती है रिपोर्ट

Wed, 21 Nov 2018 05:09 PM IST
Updated Wed, 21 Nov 2018 05:09 PM IST
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में एक स्वच्छ भारत-मिशन - फोटो : फोटोः अनुज अनुज द्विवेदी

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे महत्वाकांक्षी योजनाओं में से एक स्वच्छ भारत-मिशन के तहत युद्धस्तर पर गांवों को खुले में शौच से मुक्त घोषित किया जा रहा है, लेकिन यूपी के बुंदेलखंड में अनुपयोगी शौचालय, आंकड़ों की बाजीगरी की अलग ही कहानी कह रहे हैं। दरअसल, स्वच्छ भारत अभियान के अंतर्गत शौचालय निर्माण की योजना ने देश मे बुलेट ट्रेन की रफ्तार पकड़ रखी है। इस योजना में शौचालय निर्माण की गति इतनी तेज है कि कई राज्यो ने तो रैंकिंग भी बना रखी है। अब उत्तर प्रदेश को ही देख लीजिए तो इसकी रैंकिंग भी अव्वल दर्जे की बनी है, लेकिन सवाल यह है कि तेजी से बन रहे ये शौचालय किस स्तर के हैं और उनकी हालत कैसी है। 

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दरअसल, जमीन पर 'जहां सोच है वही शौचालय है' की लाइनें दम तोड़ती नजर आ रही हैं। इस योजना में स्थानीय अधिकारी के ऊपर इस स्कीम को तय समयसीमा में पूर्ण कराने को लेकर इतना दबाव है कि तेजी से बनाए जा रहे है ये शौचालय उपयोग में आने लायक नहीं है। यही पैसा और दबाव गरीबों और शोषित तबके की शिक्षा पर खर्च किये जाते तो शायद शौचालय अपने आप बन जाते।

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ग्रामीण अंचलों में ये योजना घर-घर पहुंची है। - फोटो : फोटोः अनुज अनुज द्विवेदी

योजना अच्छी लेकिन खस्ताहाल शौचालय 
इस योजना की सबसे सुखद बात ये है कि ग्रामीण अंचलों में घर-घर तक ये योजना तेजी से पहुंच तो रही है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से अधिकांश स्थानों पर प्रधानों और सचिवों द्वारा ही शौचालय निर्माण कराया जा रहा है। शौचालय निर्माण के दौरान खराब क्वालिटी का मसाला भी प्रयोग किया जा रहा है। शासन से लेकर जिला प्रशासन और ब्लॉक तक इस योजना को तय समयसीमा तक पूर्ण कराने हेतु सिर्फ तेजी के दिखावे के साथ दबाव में भी है जिसके कारण निर्माण कार्य भी अच्छा नहीं हो रहा। 

पानी की जद्दोजहद के बीच 'शौचालय' 
एक तरफ शौचालय निर्माण को लेकर प्रशासन तेजी से लगा है और अधिकांश गांवो में निर्माण प्रक्रिया अपने आखिरी चरण में है, वहीं बुन्देलखण्ड जो कि सूखे के लिए हमेशा से चर्चा में रहा है, यहां शौचालय निर्माण होने के बाद लोग सिर्फ इसलिए प्रयोग नहीं कर रहे हैं क्योंकि पानी की समस्या है। इस समस्या के कारण सबसे ज्यादा दिक्कत पाठा क्षेत्र में हो रही है। यहां मारकुंडी, अमचूर नेरुआ, इटवां, डोडामाफी, ददरी, रुकमा,रानीपुर,कशेरुआ जैसे क्षेत्रों में पानी की समस्या के कारण शौचालय बनने के बाद भी अधिकांश ग्रामीण बाहर ही शौच के लिए जाते हैं। सैकड़ो गांव पानी की समस्या के कारण प्रभावित हैं।

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अशिक्षा के कारण खुले में शौच जाने के लिए अभिशप्त ग्रामीण  - फोटो : फोटोः अनुज अनुज द्विवेदी

अशिक्षा के कारण खुले में शौच जाने के लिए अभिशप्त ग्रामीण 
किसी भी योजना का आम लोग तभी फायदा उठा सकते हैं जब वह शिक्षित हों। शायद यही कारण है कि खुले में शौच जाने को लेकर ज्यादातर लोग सही मानते हैं, जबकि ऐसा नही है। सरकार को यही तेजी और दबाव लोगों की शिक्षा की गुणवत्ता पर लगाना चाहिए था। बुन्देलखण्ड क्षेत्र वैसे भी शिक्षा की दृष्टि से काफी पीछे है और इसका पाठा क्षेत्र तो काफी पीछे है। यहां रहने वाले आधे से ज्यादा आदिवासी जाति के लोग बड़ी मुश्किल से ही हाईस्कूल तक पढ़ने गए होंगे। ऐसे में जिस योजना का (शौचालय) का जागरूकता से सीधा ताल्लुक हो उसमे अशिक्षित लोगों के समूह से आप किंतनी आशा कर सकते हैं। शायद यही विडम्बना है कि सरकार को जिस क्षेत्र में शिक्षा की गुणवत्ता पर धन और बल खर्च करना चाहिए, वहीं पूरा सरकारी सिस्टम शौचालय और आवास निर्माण में लगा है। 

ओडीएफ के बावजूद खुले मे क्यों?
स्वच्छ भारत मिशन बड़ी संख्या में गांवों को ओडीएफ यानी की खुले से शौच मुक्त घोषित करने के बावजूद खुले में शौच की आदत बरकरार है क्योंकि शौचालय तो बनवा दिए गये लेकिन शौचालय के महत्व के बारे मे नहीं बताया गया। ओडीएफ की अनिवार्य शर्त शौचालय का इस्तेमाल है. यानी जब तक किसी गांव के सभी घरों के सभी सदस्य शौचालय का इस्तेमाल नहीं करते, तब तक उस गांव को ओडीएफ घोषित नहीं किया जा सकता। लेकिन जल्दबाजी के चक्कर मे शौचमुक्त गांव का दिखावा किया जा रहा है। गांवों को ओडीएफ घोषित करने मे जबरदस्त तेजी है। ओडीएफ घोषित करने के तौर-तरीकों पर सवालिया निशान लग रहा है।

बुंदेलखंड से ग्राउंड रिपोर्ट.

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है. आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं. लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें.

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