भारत की ऐतिहासिक जीत, इस वजह से इस्लामिक मुल्कों में भी अलग-थलग पड़ा पाकिस्तान
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समंदर पार से आ रही हवाएं इन दिनों हिंदुस्तान के लिए सुखद सन्देश लेकर आ रही हैं। इन हवाओं ने दो तीन बरस से भारतीय विदेश नीति पर छाया कुहासा दूर किया है। सबसे बड़ी राहत यह है कि जब देश को वाकई परदेसी प्राणवायु की ज़रूरत थी तो अखिल विश्व ने अपनी शुद्ध ऑक्सीजन के भण्डार भारत की ओर खोल दिए। आतंकवाद की विषैली वायु एक तरह से अपने आप ही हाशिए पर चली गई। आने वाले अनेक वर्षों तक एशिया के लोग स्वस्थ्य होते कूटनीतिक पर्यावरण में अब सांस ले सकेंगे।
आखिर हुआ क्या है? क्यों हालत खराब है पाकिस्तान की?
दरअसल, पठानकोट और उड़ी के बाद पुलवामा में आतंकवादी आक्रमण ने समूची दुनिया को हिला दिया था। अपनी कोख़ में दहशत के ज़हरीले नाग पाल रहे पाकिस्तान को संभवतया पहली बार इतना उपेक्षित और हताशा का शिकार होना पड़ा है। उसकी इतनी किरकिरी तो तब भी नहीं हुई थी,जब अमेरिकी कमांडो ने ऐबटाबाद में आकर दुर्दांत आतंकवादी ओसामा बिन लादेन को मौत के घाट उतार दिया था। लेकिन आज पाकिस्तान के लिटमस टेस्ट की रिपोर्ट सभी मुल्क़ों के सामने है। अब पाकिस्तान के सामने दो ही विकल्प हैं। आतंकवाद से अपने को मुक्त करे अथवा अपने ही भस्मासुर के हाथों दुनिया के नक़्शे से विलोपित हो जाए। ज़ाहिर है हालात से सीखने वाला कोई भी देश पहले विकल्प का ही चुनाव करेगा।मगर पाकिस्तान के लिए यह आसान नहीं है। इस बार उसकी हताशा का कारण क्या है ?
भारत का यह रौद्र रूप तो उसने अड़तालीस,पैंसठ ,इकहत्तर और निन्यानवे में भी नहीं देखा था। हर बार उसने हिन्दुस्तान की सदाशयता का ग़लत फायदा उठाया। जब जब भारत ने इस नक़ली मुल्क़ को सबक़ सिखाना चाहा ,अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी में मौजूद पाकिस्तान के कुछ शुभचिंतक आड़े आ गए। इस बार ऐसा नहीं हुआ। एक तरफ़ पश्चिमी देशों ने दूरी बनाई तो यूरोप से भी पाकिस्तान को समर्थन नहीं मिला। और तो और उसके अपने ही किनारा कर गए। सऊदी अरब ,संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका से लेकर चीन तक ने उससे मुंह मोड़ लिया।
आबूधाबी में इस्लामिक सहयोग संगठन के विदेश मंत्री सम्मेलन से ठीक पहले अमीरात ने तो हिंदी को अपनी तीसरी भाषा का सम्मान दे दिया। इसके बाद इस सम्मेलन में उसने पहली बार हिन्दुस्तान को गेस्ट ऑफ ऑनर के तौर पर बाक़ायदा न्योता भेजा। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज इस दो दिनी सम्मेलन में भारत का पक्ष मज़बूती से रखा। पाकिस्तान को जाहिर है कि ये रास नहीं आया। उसने खूब आंखें तरेरीं,फिर सम्मेलन के बहिष्कार की धमकी दी। आखिर सम्मेलन में उसकी कुर्सी खाली पड़ी रही।
दरअसल, पाकिस्तान लगातार कश्मीर के बहाने हिन्दुस्तान की इस संगठन में सदस्यता का विरोध करता रहा है। भारत संसार की कुल मुस्लिम आबादी का तीसरा बड़ा देश है और उसके आने से 57 सदस्यों वाले इस संघ में पाकिस्तान का वर्चस्व समाप्त होगा। अभी तक वह इस मंच का दुरुपयोग भारत की आलोचना के लिए करता रहा है।
पाकिस्तान से उठा मुस्लिम विश्व का भरोसा
जनरल याह्या ख़ान की बायकॉट धमकी के मद्देनज़र भारत के प्रतिनिधिमंडल को 1969 में इस संगठन के पहले स्थापना सम्मेलन से बैरंग लौटना पड़ा था। इस प्रतिनिधिमंडल की अगुआई फ़ख़रुद्दीन अली अहमद कर रहे थे। इसके बाद 1990 में सऊदी अरब, 2002 में क़तर, 2006 में फिर सऊदी अरब और पिछले बरस टर्की और बांग्लादेश ने फिर भारत को शामिल करने का समर्थन किया था।अतीत में सऊदी अरब और टर्की जैसे देश पाकिस्तान के दबाव में भारत से दूरी बनाते रहे हैं। इस बार पाकिस्तान की पोल खुल गई है। मुस्लिम विश्व अब उसका भरोसा नहीं कर रहा है।
इससे पहले विदेशमंत्री सुषमा स्वराज चीन में रूस चीन और भारत की त्रिपक्षीय बैठक में इन दोनों देशों को पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये की निंदा करने के लिए सहमत कर चुकी हैं। पाकिस्तान के लिए चीन का भारत के साथ आना एक बड़ा झटका है। संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद् में भी आतंकवाद विरोधी प्रस्ताव पर उसके दस्तख़त पाकिस्तान के होश उड़ाने वाले हैं। चीन के सामने भी पाकिस्तान की कलई खुल चुकी है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि मालदीव ,मलेशिया और लंका से लगातार झटकों ने चीन को अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार के लिए बाध्य कर दिया है। क्या हिन्दुस्तान के लिए इन परदेसी हवाओं में कोई सुगंध आप महसूस कर रहे हैं ?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।