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चर्चा जरूरी: क्या धर्म और आस्था आज की सियासी जरूरत है?

Tue, 04 Apr 2023 08:29 PM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Tue, 04 Apr 2023 08:29 PM IST
सार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जबतक धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जाएगा तब तक भड़काऊ भाषणों पर रोक नहीं लगाया जा सकता। जिस दिन राजनेता, सियासत में धर्म का इस्तेमाल बंद कर देंगे, नफरती भाषण खुद-ब-खुद बंद हो जाएंगे।

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Supreme Court said When Politicians Stop Using Religion, Hate Speech Will End
सियासी दलों में भगवा रंग को लेकर छिड़ी बहस। - फोटो : Twitter

विस्तार

सियासी दलों में भगवा रंग को लेकर इन दिनों बहस छिड़ी है कि आखिर इस रंग पर किसी एक पार्टी का एकाधिकार कैसे हो सकता है? कांग्रेस अगर भगवा रंग का इस्तेमाल करती है तो भला यह हिन्दूवादी राजनीति का हिस्सा कैसे हो गया?

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ताजा चर्चा मध्य प्रदेश में इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों के संदर्भ में हो रही है। खासकर तब, जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ को धर्म संवाद कार्यक्रम में गदा भेंट करने के साथ ही पूरे कांग्रेस मुख्यालय को भगवा रंग से पाट दिया गया। कमलनाथ हों या दिग्विजय सिंह, कांग्रेस के दिग्गज नेता पहले भी मंदिरों में जाते रहे हैं, पूजा पाठ करते रहे हैं और साधुओं, सन्यासियों के अलावा हिन्दू धर्म के अनुयायियों और धर्माचार्यों से मिलते जुलते रहे हैं।
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राहुल गांधी, प्रियंका गांधी या सोनिया गांधी कई कई बार मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों में शीश नवाते हुए कैमरे में कैद हुए हैं। मीडिया में सुर्खियां भी बनती रही है कि कांग्रेस अब भाजपा की तरह धर्म की राजनीति करने लगी है। लेकिन क्या किसी सार्वजनिक जीवन में रहने वाले किसी नेता को आप मंदिरों में आने जाने, पूजा पाठ करने या आस्थाओं का सम्मान करने से रोक सकते हैं? सवाल ये भी है कि कहीं आप सार्वजनिक मंचों पर भड़काऊ भाषण या बयान तो नहीं दे रहे, जिससे किसी खास समुदाय की भावनाएं भड़कती हों। अगर ऐसा नहीं है तो धर्म शुद्ध रूप से आस्था और एकदम निजी आस्था का मामला है।

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आस्था और राजनीति

बात अगर इंदिरा गांधी के जमाने की करें या फिर इससे नेहरू जी के जमाने की भी करें तो क्या उस दौर में कांग्रेस का कोई नेता कभी मंदिर नहीं जाता था, भगवान को शीश नहीं नवाता था या फिर अपने देश की धार्मिक परंपराओं को नहीं मानता था? अगर आप ये सवाल कम्युनिस्टों पर उठाएं तो कुछ हद तक समझ में भी आता है।


कम्युनिस्टों के लिए बेशक भगवान या मूर्ति पूजा के मायने भले ही कम से कम दिखावे के लिए न रहे हों, लेकिन आप ये भी देखें कि ज्यादातर तथाकथित कम्युनिस्ट अपनी पत्नी या घरेलू आस्था को ढाल बनाकर उस परंपरा का निर्वाह भी करते रहे हैं और अब जब से देश में भाजपा सरकार और संघ परिवार का दबदबा बढ़ा है तब से तो कम्युनिस्टों ने भी अपनी सोच बदल ली है।

एक वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता तो यहां तक कहते हैं कि भला पूजा करने या किसी शक्ति में आस्था रखने में बुराई क्या है? वह कहते हैं कि कम्युनिज़्म एक विचारधारा है और आस्था आपकी परंपरा का हिस्सा। मैं निजी तौर पर कई ऐसे कम्युनिस्टों को जानता हूं जो पूजा पाठ भी करते हैं, जन्म कुंडली भी मानते हैं और ज्योतिषियों के चक्कर भी लगाते हैं। अब आप इसे कह लीजिए कि लाल रंग वाले भगवा कैसे हो गए?

जाहिर सी बात है कि जिस देश की संस्कृति और इतिहास में ये परंपराएं रची बसी हों, उसमें आप आस्था पर सवाल नहीं उठा सकते। रही बात भगवा को सियासी और चुनावी हथियार बनाने की, तो कांग्रेस पहले भी ये करती रही है, कांग्रेस के नेता पहले भी तमाम धार्मिक मंचों पर भगवा पट्टे पहनते रहे हैं, गदा उठाते रहे हैं, रामलीलाओं में बैठकर तीर चलाते रहे हैं। अगर अपने देश के हिन्दू सिर्फ किसी के भगवा पट्टा पहन लेने या भगवा झंडा लहरा देने से वोट देते हैं तो यह शायद अतिशयोक्ति होगी।

साहित्य से जुड़ी तमाम हस्तियां ऐसा मानती हैं कि रामनवमी या ऐसे मौकों पर होने वाली शोभायात्राओं, इस दौरान दिए जाने वाले भड़काऊ भाषणों और उसके बाद होने वाली हिंसा-आगजनी की घटनाओं पर अगर गौर करें तो यह बात तो साफ हो जाती है कि ये लोग आस्था के तहत न तो कोई पर्व त्योहार मनाते हैं, न शोभायात्राएं निकालते हैं और न ही इसके पीछे उनके भीतर कोई धर्म की अवधारणा होती है।

कवि दिविक रमेश, मदन कश्यप, उपेन्द्र कुमार और कौशल किशोर भी मानते हैं कि भगवा रंग पर किसी का कॉपीराइट नहीं है और न ही किसी धर्म में यह लिखा है कि एक दूसरे की भावनाएं भड़काओ और हिंसा फैलाओ।


सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर गौर करें

सुप्रीम कोर्ट की हाल ही में उठाई गई एक अहम आपत्ति गौर करने लायक है जिसमें ये कहा गया है कि जबतक धर्म को राजनीति से अलग नहीं किया जाएगा तबतक भड़काऊ भाषणों पर रोक नहीं लगाया जा सकता। जिस दिन राजनेता सियासत में धर्म का इस्तेमाल बंद कर देंगे, नफरती भाषण खुद ब खुद बंद हो जाएंगे।

सर्वोच्च अदालत भी ये जानती है कि ऐसा इस देश में नहीं होने जा रहा और पिछले कम से कम तीन दशकों से धर्म और सियासत के रिश्ते बेहद गहरे हो चुके हैं। देश में कई पार्टियों की बुनियाद ही धर्म को केन्द्र में रखकर बनाई गई है। ऐसे में हालात बदलना एक तरह से नामुमकिन सा दिखता है।

जाहिर है ऐसे में भगवा रंग को लेकर हो, या फिर हिन्दू या वैदिक परंपराओं को लेकर या फिर इस्लाम को केन्द्र में रखकर हो, सियासत का खेल जारी रहेगा। तो फिर कमलनाथ या राहुल गांधी या कांग्रेस का कोई नेता और यहां तक कि कम्युनिस्ट भी अगर भगवा का सियासी इस्तेमाल करते हैं तो इसे आज के दौर में उनकी सियासत का ही हिस्सा माना जाएगा।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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