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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय और लोकाचार को निगलती इंटरनेट की आजादी

Sat, 01 Feb 2020 04:57 PM IST
Ajay Khemariya अजय खेमरिया
Updated Sat, 01 Feb 2020 04:57 PM IST
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Supreme court decision and freedom of internet swallowing ethos
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixr8

भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने इंटरनेट की निर्बाध उपयोगिता को मौलिक अधिकार के समकक्ष दर्जा देते हुए जम्मू कश्मीर में इसकी बहाली के लिये सरकार को निर्देशित किया है। संविधान के अनुच्छेद 19(1)(अ) में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रावधान है और कोर्ट ने इंटरनेट की निर्बाध उपयोगिता को इसी आलोक में रेखांकित किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के साथ ही यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या इंटरनेट की आजादी पर कोई युक्तियुक्त पाबंदी मुल्क की सुरक्षा या सामाजिक सरोकारों की जमीन पर संभव है या नही? क्या नागरिक आजादी का नागरिक व्यवस्था के साथ किसी तरह का जबाबदेह युग्म होना चाहिये अथवा नहीं? 

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इंटरनेट की जिस आजादी को मौलिक अधिकार के साथ जोड़ने की कोशिश सुप्रीम कोर्ट ने की है उसके सामाजिक और राजनीतिक निहितार्थ भी बहुत दूरगामी महत्व के हैं। भारत का संविधान उन्मुक्त और स्वच्छन्दता के साथ नागरिक आजादी की व्यवस्था नही देता है वह इस पर युक्तियुक्त निर्बन्धन का पक्षधर है। लेकिन हकीकत की जमीन पर पिछले 72 सालों में अनुच्छेद 19 की व्याख्या बगैर जबाबदेही के ही की गई है। इसके राष्ट्रीय तत्व को सुनियोजित तरीके से तिरोहित किया गया है। भारत तेरे टुकड़े होंगे या अफजल हम शर्मिंदा है जैसे अभिव्यक्ति के नारे असल में अनुच्छेद 19 की उसी व्याख्या और सरंक्षण पर खड़े है जो राष्ट्र राज्य की अवधारणा के विरुद्ध है। दुनियां के किसी भी लोकतंत्र में इस तरह की आजादी का उदाहरण हमें देखने को नही मिलता है। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट के ताजा निर्णय को इस आधार भी विश्लेषित किया जाएगा।
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इस निर्णय का सामाजिक पहलू भी गौर करने वाला है। संविधान का हर मौलिक अधिकार उसके नागरिकों के सर्वांगीण विकास के कारक के रूप में अधिमान्य किये गए हैं लेकिन इंटरनेट की सामाजिक उपयोगिता के विश्लेषणात्मक आंकड़े कुछ और ही कहानी कहते हैं। हाल ही में जारी एक वैश्विक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा पोर्न देखने वालों में भारत नम्बर एक पर है। भारत मे इस समय 450 मिलियन स्मार्ट फोन यूजर हैं। 2019 में भारत के 89 फीसदी यूजर अपने स्मार्ट फ़ोन पर पोर्न मूवी देखते हैं। 2017 में यह आंकड़ा 86 फीसदी था। 
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मोबाइल हैंडसेट बनाने वाली कम्पनी एरिक्सन के अनुसार भारत में औसत 9.8 जीबी मासिक खपत स्मार्टफोन पर है और 2024 में यह बढ़कर 18 जीबी प्रति महीने होगी। अब सवाल यह है कि जब हमारा इंटरनेट उपयोग का संजाल इस बड़े पैमाने पर बढ़ रहा है तब इसकी सामाजिक उत्पादकीय क्षमताओं का मूल्यांकन होना चाहिये या नहीं? बेशक इंटरनेट ने लोकजीवन को सरलता और सुविधाओं के धरातल पर एक अकल्पनीय आयाम दिया है लेकिन इसके देय उपयोग को मूलाधिकारों के साथ जोड़ा जाना कुछ अतिशय आजादी की ओर इशारा करता है। 

हमारा लोकजीवन सदैव सयंमित यौनाचार का हामी रहा है और एक आत्मकेंद्रित अनुशासन ने हजारों सालों से हमारे सामाजिक और पारिवारिक ताने बाने को मर्यादित रखा है। सवाल यह है कि क्या सर्व सुलभ इंटरनेट की यह आजादी हमारी मर्यादित जीवन पद्धति को निगल नही रही है। निर्भया केस के अपराधी हो या हैदराबाद के दरिंदे इस यौन हिंसा के बीज कहीं न कहीं इंटरनेट पर निर्बाध रूप से उपलब्ध पोर्नोग्राफी साइटों में ही नजर आते हैं। इंदौर के बाल सम्प्रेक्षण गृह में रह रहे दो नाबालिगों ने स्वीकार किया कि 14 वर्षीय बालिका के बलात्कार से पहले उन्होंने पोर्न मूवी अपने मोबाइल पर देखी थी। जाहिर है इंटरनेट की यह आजादी हमारे लोकाचार की मर्यादा को निगल रही है। 

फ़ोर्ब्स पत्रिका के ताजा 100 भारतीय आइकॉन्स की लिस्ट में सनी लियॉन भी शामिल हैं क्योंकि उन्हें इस नेट ट्रैफिक में हमने सर्वाधिक खोजा है। 2019 में अमेरिका, इंग्लैंड, ब्राजील, फ्रांस जैसे देशों से भी हम भारतीय पोर्न देखने के मामले में आगे रहे हैं। सवाल यह भी है कि क्या 2013 की 40 फीसदी की पोर्न लत के 2019 में 86फीसदी तक पहुंचने के साथ ही हमारी चेतना का स्वरूप समेकित रूप से विकृत तो नही हो रहा है। क्या हम एक कामांध समाज की चेतना का निर्माण कर रहे है। 2017 में जियो के आने के बाद स्मार्टफोन पर जिस तरह से पोर्नहब हमने अपने मन में विकसित कर लिये हैं वह इस बात की चेतावनी भी है कि हमारे इंटरनेट उपभोग पर तार्किक बंधन भी आवश्यक है। 

केंद्र सरकार ने पिछले सालों में करीब 400 पोर्नसाइट्स पर प्रतिबंध लगाया है, इसके बाबजूद जिओ कम्पनी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि इससे महज 200 एमबी डाटा की खपत स्मार्टफोन से घटी है। समझा जा सकता है कि हमारी सामूहिक चेतना किस तरफ उन्मुख है। इसलिये इंटरनेट की मौलिक आजादी का नियमन और नियंत्रण अत्यावश्यक है। केवल एक नागरिक की आजादी भर से यह जुड़ा हुआ सीमित महत्व का मामला नहीं है, ये समाज की सेहत का आधार भी है। जाहिर है इसे बोलने, घूमने, फिरने, रहने जैसी जीवनोपयोगी स्वतंत्रता के समानांतर नही रखा जा सकता है। 

एक सभ्य और सम्प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के अपने अंतर्निहित हित होते हैं जो सर्वोपरि है। अगर इंटरनेट की मौलिक स्वतंत्रता राष्ट्रीय राज्य की अवसरंचना या सुरक्षा में खलल पैदा करती है तो कोई भी सम्प्रभु राज इसे स्वीकार नही करेगा। इंटरनेट के मौलिक अधिकार पर जश्न मनाने वाले बड़े वर्ग को इस तथ्य को समझना ही होगा कि इस आजादी की बुनियाद पर न तो राष्ट्रीय सुरक्षा औऱ न ही सामाजिक विद्रूपता को खड़ा किया जा सकता है।

असल में भारत के चुनावी लोकतंत्र ने आजादी के मायनों को अपनी अपनी सुविधा की व्याख्या पर खड़ा कर रखा है। सोशल मीडिया के असीमित प्रभाव ने इसमें करोड़ों लोगों को एक प्लेटफॉर्म उपलब्ध करा दिया है और आज कथित तौर पर जनमत को प्रभावित करने का यह सशक्त हथियार भी बन गया है। स्वाभाविक ही है कि भारत जैसे देश में जहां नेशन फर्स्ट का कोई विचार नागरिकों के जेहन में नही रहता है वहां इस नेट की तार्किक आजादी का विचार ही राष्ट्रीय हित में है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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