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युवा कदम: कहानी, संगीत से समाज को बदल रहे अनूठे प्रयासों की

Tue, 29 Jun 2021 01:15 PM IST
Sandip Naik संदीप नाईक
Updated Tue, 29 Jun 2021 01:15 PM IST
सार

ऐसी ही एक कहानी है मप्र के हरदा जिले की टिमरनी तहसील में रहने वाले रितेश गोहिया की। रितेश वो युवा हैं जिन्होंने नौकरी छोड़कर 16 गांवों में बदलाव का झंडा थामा और समाज में शिक्षा को माध्यम बनाकर बदलाव की दिशा में काम किया।

अपने जज्बे की बदौलत रितेश ने बच्चों, किशोरों और युवाओं के जीवन में बड़ा बदलाव किया है। खास बात यह है कि इस काम के लिए उन्होंने संगीत का सहारा लिया है।

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रितेश वो युवा हैं जिन्होंने नौकरी छोड़कर 16 गांवों में बदलाव का झंडा थामा। - फोटो : Social Media

विस्तार

कुछ करने का जज्बा और बदलाव के स्वप्न हम सबकी चमकीली आंखों में हमेशा तैरते रहते हैं। परिवार-समाज के दबाव में शिक्षा ग्रहण करके तुरन्त नौकरी पर लगना और फिर पारिवारिक जिम्मेदारियों में उलझ कर अधिकांश युवा अपने जीवन में इन बदलाव के स्वप्नों की तिलांजली दे देते है और एक ढर्रे पर जीवन की गाड़ी को खींचते रहते हैं, पर ठीक इसके विपरीत कुछ युवा यह सब एक समय तक तो करते है, पर बाद में वे सब छोड़ देते है एक दिन अचानक, और अपने उन सपनों का पीछा करते है, जानी-अनजानी राहों पर चल निकलते है, इसमें मंजिल मिलती भी है और वे अपने साथ-साथ कुछ और लोगों को भी जोड़ते है और उनके जीवन के साथ समाज में भी बड़ा बदलाव करते है.

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ऐसी ही एक कहानी है मप्र के हरदा जिले की टिमरनी तहसील में रहने वाले रितेश गोहिया की। रितेश वो युवा हैं जिन्होंने नौकरी छोड़कर 16 गांवों में बदलाव का झंडा थामा और समाज में शिक्षा को माध्यम बनाकर बदलाव की दिशा में काम किया। अपने जज्बे की बदौलत रितेश ने बच्चों, किशोरों और युवाओं के जीवन में बड़ा बदलाव किया है। खास बात यह है कि इस काम के लिए उन्होंने संगीत का सहारा लिया है।
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क्या है रितेश की कहानी 
मूल रूप से रायसेन जिले की बरेली तहसील के रहने वाले रितेश 18 साल पहले पिताजी की मृत्यु के बाद परिवार सहित टिमरनी आ बसे। रितेश की पढ़ाई टिमरनी के शासकीय विद्यालयों में हुई, फिर इंदौर आदि भी पढ़ने गए। वहां रितेश ने बीकॉम, एमकॉम किया लेकिन इंदौर भाया नहीं और लौटकर टिमरनी आ गए। उनके मन में कुछ पसंद का काम करना था। संगीत में रुचि थी परन्तु संगीत को कैरियर बनाना बड़ा रिस्की था, लिहाजा कॉमर्स में परा स्नातक होने के कारण एक निजी बैंक में नौकरी मिली, परन्तु मन नहीं लगा।
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रितेश कहते है- “वो भी कोई काम था, लोगों के चेहरे देखो और नोट गिनते रहो– सो छोड़ दी और कुछ एनजीओ में काम किया क्योकि एनएसएस में काम करने का अनुभव छात्र जीवन से था और यह काम लुभाता था।

रितेश कहते है- “अलग अलग संस्थाओं में काम करके लगा कि संस्थाएं डोनर एजेंसी पर निर्भर है और फंड इतनी बड़ी समस्या है कि आप अपनी पसंद का काम नहीं कर सकते पूर्णतया डोनर संस्था के निर्देशन और उनके अजेंडा पर कभी आप शौचालय बनवाते है, कभी एड्स का का काम करते है, कभी महिला सशक्तिकरण या कभी कंडोम प्रमोशन का और इस तरह से आपने जो बदलाव और विकास के स्वप्न देखे थे वे कभी फलीभूत नहीं होते इसलिए मैंने वो सभी नौकरियां भी छोड़ दीं और अपना खुद का एनजीओ पंजीकृत करवाया जहां मै अपने मनमाफिक काम कर सकता था, और उसका नाम था शेडो”।   

 

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रितेश ने मुख्य काम जो किया वह बहुत मूल्यवान और एक तरह से रिकॉर्ड है। - फोटो : अमर उजाला

क्या बदलाव किए रितेश ने 
रितेश ने मुख्य काम जो किया वह बहुत मूल्यवान और एक तरह से रिकॉर्ड है। रितेश और उनके साथ की टीम ने टिमरनी के सरकारी स्कूल में बच्चों का ड्राप आउट कम करने और पाठ्यक्रम को रोचक बनाने के लिए कक्षा पहली से आठवी तक के सम्पूर्ण पाठ्यक्रम के 124 अध्यायों को का जिंगल बनाया और सभी विषयों को इसमें जोड़ा।

इसका फायदा यह हुआ कि बच्चे मध्यान्ह भोजन के लालच में स्कूल आते थे और खाना खाकर भाग जाते थे परन्तु संगीत से पढ़ाई होने के कारण शुरुआत में उन्हें यह मनोरंजक लगा और बाद में धीरे-धीरे वे सीखने सिखाने में रुचि लेने लगे। 

रितेश ने दूसरा काम किया 5 हजार आदिवासी महिलाओं को कार्यात्मक साक्षरता सिखाने का किया और इस दौरान उनके साथ ग्राम विकास और महिला सशक्तिकरण का का काम भी जमकर किया। शिक्षा के काम के दौरान टिमरनी और आसपास के 16 गांवों के 112 बच्चों को सीधे स्कूल से जोड़ा जो हर शनिवार को शनि महाराज बनाकर भिक्षावृत्ति में संलग्न थे।

यही नहीं इसके बाद में युवाओं के साथ काम किया जिसमे उन्होंने युवाओं को एक वर्ष की फेलोशिप दी और सालभर में 40 दिन की यात्राएं निकालकर जागृति का काम किया। इसमें युवा ना मात्र संविधानिक मूल्यों को सीखते थे, बल्कि अपने जीवन में उतारकर अच्छे नागरिक बनने का प्रयास करते थे। 

सन् 2017 से शेडो ने अपने कामों में मूल्यों पर ध्यान देना शुरू किया और यह पाया कि काम की प्रक्रियाएं ही हमें संज्ञानात्मक व्यवहार को प्रभावित करती हैं। रितेश कहते हैं- “हमारा मानना है कि यह व्यवहार हमारे खुलेपन, सबको समानता से देखने और बराबरी का व्यवहार करने से विकसित होता है सशक्त होता है।

इसका अर्थ यह है कि हम अपने पुराने ज्ञान और अनुभव से नई परिस्थति में निर्णय लेते हैं, इस ज्ञान और अनुभव को मिलाकर निर्णय जब भी लेते हैं तो वह काफी उपयोगी और सबके लिए सबके हित में होता है इस तरह से हम युवाओं को तैयार करते हैं, ताकि वे जागरूक नागरिक बनकर समाज में जिम्मेदार नागरिक बनें. आज शेडो संस्था टिमरनी की दो बस्तियों में, 16 गांवों में तथा  हरदा में काम कर रही हैं।  
 

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बच्चों के बीच काम करते हुए रितेश। - फोटो : अमर उजाला

संगीत की प्रतिभाओं को दिखाया रास्ता  
रितेश कहते हैं- काम के दौरान फंड का दबाव हमेशा होता है और यदि डोनर एजेंसी के दबाव और अजेंडे पर काम नहीं करना है तो अपना रेवेन्यु मॉडल विकिसत करना पड़ता है और इसके लिए उन्होंने अपने शौक संगीत को एक बार पुन: माध्यम बनाया और टिमरनी में छोटा सा संगीत का स्टूडियो बनाया।

शुरुआत में यह बहुत कम संसाधनों के साथ शुरू किया, परन्तु धीरे-धीरे आज यह इस क्षेत्र का बड़ा महत्वपूर्ण स्टूडियो है। इसमें रितेश ने वो सभी संसाधन जुटाए हैं जो एक अच्छे संगीत और रिकॉर्डिंग के लिए आवश्यक होते हैं।

वे कहते हैं “गांवों में और आदिवासी इलाकों में कम करते हुए हमने पाया कि शिक्षा तो महत्वपूर्ण है ही परन्तु हमारी संस्कृति खत्म हो रही है, हमारा लोक संगीत और लोक वाद्य यंत्र भी खत्म हो रहे हैं, लोक गायकों को कोई स्थान या प्लेटफॉर्म नहीं है, तकनीकी रूप से वे इतने दक्ष नहीं कि वे अपनी बात गीत और लोक परमपराएं आम लोगो तक पहुंचा सकें, तो उन्होने “लोक विधान” फेलोशिप आरंभ की जिसमे स्थानीय ग्रामीण युवाओं को एक वर्ष तक वे सिखाते हैं।

उनके गीत आदि जो वाचिक परम्परा में है- को रिकॉर्ड करते है, सीडी आदि बनवाते हैं और उन्हें फिर स्वतंत्र रूप से अपना बैंड बनाने में सहायता करते हैं। यह फेलोशिप नगद ना होकर व्यक्ति की न्यूनतम आवश्यकताओं पर बातचीत करके दी जाती है। 

मसलन हिमांशु कौशल नामक एक युवा ने बातचीत में बताया कि उसे उसके व्यक्तिगत खर्च के लिए साल भर में मात्र छब्बीस हजार रुपयों की आवश्यकता होगी तो उन्होंने उसे दो किश्तों में ये राशि दी और आज हिमांशु बेहतरीन गायक है, देश में प्रसिद्ध हो रहे हैं और वे जगह-जगह निकलने वाली कबीर यात्राओं में बड़ी भूमिका निभाते हैं।

इस तरह लोक विधान फेलोशिप के तहत अभी तक 20 लोक गायक युवाओं को सपोर्ट किया गया है और यह क्रम जारी है। “अब हमें किसी से फंड के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ता चाहे सामाजिक काम हो या संगीत का, हमारा स्टूडियो हमें इतना कमाकर दे देता है कि हम अपनी पसंद का काम कर सकें, लोगों की आर्थिक रूप से मदद कर सकें और हमारे रिकॉर्डिंग के भाव भी व्यवसायिक नहीं है, न्यूनतम पांच सौ रूपये में भी हम अच्छी गुणवत्ता का रिकॉर्डिंग करके देते हैं जो बड़ी बात है– सब लोग अपनी पसंद का काम करते है, हमारा स्टूडियो टिमरनी ही नहीं बल्कि आसपास के इलाके के लिए सीखने सिखाने का अड्डा है, जहां शिक्षा, स्वास्थ्य, विकास और संगीत खासकरके लोक संगीत पर बड़ा काम हो रहा है।

हम गणगौर से लेकर स्थानीय लोक जीवन की अच्छी और वैज्ञानिक मान्यताओं को प्रमोट कर रहें हैं, कबीर सिंगाजी और सूफी परम्परा के संगीत को तरजीह दे रहें हैं। इस तरह काम नया है हमारे इरादे बड़े है और हम लगे हुए है कि कुछ अच्छा कर पाएं” रितेश कहते है जिनके साथ पांच युवाओं की सशक्त टीम है और कोई बॉस नहीं है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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