आजादी का अमृत महोत्सव: भारत की खेलों में दशा ‘नौ दिन चले अढ़ाई कोस’ वाली, कैसे सुधरेगी स्थिति?
ओलंपिक में भारत की 75 वर्ष की यात्रा देखें तो हमने अब तक 7 गोल्ड, 7 सिल्वर और 16 कांस्य पदक जीते हैं। 7 में 5 बार गोल्ड तो भारतीय हॉकी टीम लाई है, जिसकी आज देश में क्या दुर्दशा है? यह जगजाहिर है।
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देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त हुए 75 साल हो गए हैं। इन दिनों देश आजादी के अमृत महोत्सव के जश्न में डूबा हुआ है। 75 साल की इस यात्रा को पीछे मुड़कर देखें तो कई क्षेत्रों में भारत ने अभूतपूर्व तरक्की की है। फिर भी कई सेक्टर्स ऐसे हैं, जहां आज भी हम दुनिया के कई देशों से मीलों पीछे हैं। खेल उन्हीं में से एक है। 130 करोड़ की विशाल आबादी वाले भारत की खेलों में दशा 'नौ दिन चले अढ़ाई कोस' वाली है। कारण, खेलों को लेकर आज भी उचित वातावरण देश में बन नहीं पाया है, जिसके चलते समाज में बहुत बड़े तबके की रुचि बच्चों को खेलों में भेजने की नहीं है। हालांकि, विगत दो-तीन दशकों में कुछ परिवर्तन देखने को मिला है।
दुनिया में ओलंपिक खेलों का महाकुंभ है। 35 खेलों को ओलंपिक में शामिल किया गया है। ओलंपिक में भारत की 75 वर्ष की यात्रा देखें तो हमने अब तक 7 गोल्ड, 7 सिल्वर और 16 कांस्य पदक जीते हैं। 7 में 5 बार गोल्ड तो भारतीय हॉकी टीम लाई है, जिसकी आज देश में क्या दुर्दशा है? यह जगजाहिर है।
व्यक्तिगत स्पर्धा में पहली बार बीजिंग ओलंपिक- 2008 में 10 मीटर एयर राइफल शूटिंग में अभिनव बिंद्रा ने देश के लिए गोल्ड जीता था। व्यक्तिगत स्पर्धा में दूसरा गोल्ड टोक्यो ओलंपिक- 2020 में नीरज चोपड़ा ने जेवलिन थ्रो में जीता। नीरज तो एथलेटिक्स में देश के लिए पहली बार गोल्ड लेकर आए। ओलंपिक में मेडल जीतने वाले भारतीय खिलाड़ियों के नाम हम उंगलियों पर गिन सकते हैं।
ओलंपिक में शामिल कई खेलों में तो भारत क्वालीफाई तक नहीं कर पा रहा या कई खेल हमारे यहां खेले ही नहीं जा रहे।
टोक्यो ओलंपिक- 2020 में पहली बार हमारी तलवारबाज आनंद सुंदररामन भवानी देवी ने क्वालीफाई किया। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में वेटलिफ्टिंग, कुश्ती, बॉक्सिंग, शूटिंग, बैडमिंटन, टेनिस में भारतीय खिलाड़ियों ने दमखम दिखाया है। अभिनव बिंद्रा, नीरज चोपड़ा, साइना नेहवाल, पीवी सिंधु, राज्यवर्धन सिंह राठौड़, विजेंद्र सिंह, सुशील कुमार, विजय कुमार, मैरीकॉम, मीराबाई चीनू जैसे पदक विजेताओं ने देश में युवाओं को नया प्रोत्साहन दिया है।
एशियन और कॉमनवेल्थ गेम्स में हम जरूर कुछ बेहतर प्रदर्शन करते हैं, पर इन इवेंट्स में खेलों के महारथी देश भाग ही नहीं लेते।
1982 तक नहीं था कोई खेल मंत्रालय
आजादी के बाद खेल न तो सरकार की प्राथमिकता में था और न समाज की। वर्ष 1982 तक भारत सरकार में खेलों को लेकर कोई मंत्रालय या विभाग तक नहीं था। 1982 में नई दिल्ली में जब एशियन गेम्स होने थे, तब पहली बार केंद्र सरकार ने डिपार्टमेंट ऑफ स्पोर्ट्स बनाया। 1985 में इंटरनेशनल यूथ ईयर के समय इसे डिपार्टमेंट ऑफ यूथ अफेयर्स एंड स्पोर्ट्स कर दिया गया।
आजादी के 53 साल बाद यानी 27 मई 2000 को देश को पहली बार स्वतंत्र खेल मंत्रालय मिल सका। वर्ष 2008 में स्पोर्ट्स और यूथ अफेयर्स को अलग किया गया। वर्तमान में खेल मंत्रालय का 653 करोड़ रुपए का बजट है। सुखद यह है कि वर्तमान में स्पोर्ट्स इंफ्रास्ट्रक्चर और खिलाड़ियों की ट्रेनिंग पर सरकार विशेष रूप से ध्यान दे रही है।
आज विदेशों में कोचिंग के अलावा विदेशी एक्सपर्ट की सहायता लेने में सरकार पीछे नहीं है। टोक्यो ओलंपिक में इसके नतीजे देखने को मिले थे। अच्छी बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खेलों को लेकर खास दिलचस्पी लेते हैं।
खेलों में भारतीय सेना की भूमिका
खेलों में भारतीय सेना की भूमिका भी अहम है। आजादी के बाद यदि कहीं खेलों को लेकर गंभीरता रही है तो वह भारतीय सेना में ही रही है। भारतीय सेना में अपने स्तर पर कई बड़े खिलाड़ी तैयार किए। ओलंपिक पदक विजेता राज्यवर्धन सिंह राठौड़, विजय कुमार, नीरज चोपड़ा ऐसे ही बड़े नाम हैं। हॉकी टीम में सेना के खिलाड़ी शामिल होते रहे हैं।
हॉकी के जादूगर ध्यानचंद सेना में मेजर थे। रेलवे, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, इंडियन ऑयल जैसे सरकारी विभाग और कई निजी कंपनियां भी खिलाड़ियों को सपोर्ट कर रही हैं। कई राज्य सरकारों ने खिलाड़ियों को तैयार करने का बीड़ा उठाया है।
वैसे, क्रिकेट के बिना भारत में खेलों की कल्पना नहीं की जा सकती। अच्छा और बुरा, दोनों पक्ष क्रिकेट के साथ जुड़े हैं। क्रिकेट के आलोचकों का मत है कि क्रिकेट के कारण भारत में अन्य खेलों को सही प्रोत्साहन नहीं मिला। दुनिया के मुट्ठी भर देशों में ही खेले जाने वाले क्रिकेट में हमने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया।
सरकार ने परोक्ष तो नहीं, लेकिन अपरोक्ष रूप से क्रिकेट का ज्यादा भला किया। देश में आज अन्य खेलों की अपेक्षा क्रिकेट के सर्वाधिक मैदान हैं, जबकि आजाद भारत में 5 ओलंपिक मेडल दिलाने वाली हॉकी के टर्फ मैदान 22-25 ही होंगे। कुछ ऐसी ही स्थिति अन्य खेलों को लेकर भी है।
विडंबना यह है कि भारत आज तक किसी एक खेल को राष्ट्रीय खेल तक घोषित नहीं कर पाया है। वर्ष 2020 में सरकार ने एक आर.टी.आई के जवाब में स्पष्ट किया था कि भारत का कोई आधिकारिक राष्ट्रीय खेल नहीं है।
राष्ट्रीय खेल को लेकर भ्रम की स्थिति
भारत सभी प्रचलित खेलों को बढ़ावा देता है। हद तो यह है कि राष्ट्रीय खेल को लेकर भ्रम की स्थिति जनमानस में भी है। हॉकी को अधिकांश लोग राष्ट्रीय खेल मानते हैं और उसकी दुर्दशा को लेकर सरकार को कोसते हैं। कुछ लोग कबड्डी को राष्ट्रीय खेल मानते हैं। भारतीय नेताओं की अधिक रुचि के चलते कुछ लोग अब क्रिकेट को ही राष्ट्रीय खेल मानने लगे हैं।
बड़ी आबादी के चलते भारत में खेलों को लेकर अपार संभावनाएं हैं। हालांकि, अभी सरकार ने बहुत कम ध्यान इस ओर लगाया है। भविष्य के खिलाड़ियों की पहचान आज भी थोड़ा मुश्किल टास्क है, क्योंकि हमारी शिक्षा प्रणाली में खेल प्राथमिकता में नहीं हैं।
सरकार को स्कूलों में ऐसा सिस्टम विकसित करने की अति आवश्यकता है, जिससे छोटी उम्र में प्रतिभाओं को पहचान कर उचित ट्रेनिंग की व्यवस्था की जा सके। माता-पिता को भी चाहिए कि यदि उनका बच्चा खेलों में रुचि रखता है तो उसे रोके नहीं, आगे बढ़ने दें।
सरकार ओलंपिक जैसा बड़ा स्पोर्ट्स इवेंट देश में कराए, ऐसे आयोजनों से खेल का माहौल बनता है। उम्मीद यही है कि भारत में खेलों का स्वर्णिम युग जल्द आएगा और ओलंपिक मेडल टेली में हमारा तिरंगा चमकेगा।
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