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उत्तरकाशी टनल हादसा: सिलक्यारा का सबक नहीं सीखा तो भयंकर होंगे परिणाम

Thu, 30 Nov 2023 05:22 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 30 Nov 2023 05:22 PM IST
सार

स्वयं केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी इस संवेदनशीलता का उल्लेख कर सावधानी बरतने की बात कह गए हैं, लेकिन योजनाकार और योजनाएं बनवाने वाले इस हकीकत की अनदेखी करते रहे हैं।

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Silkyara Tunnel Incident: Problem and challenges In tunnel construction
Silkyara Tunnel Incident - फोटो : amar ujala

विस्तार

सारे देश को हिला देने वाले सिलक्यारा सुरंग संकट का सुखान्त पटाक्षेप हो गया है। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस हादसे के अनुभव से हमारे भूविज्ञानियों, खनन विशेषज्ञों और आपदा प्रबंधन तंत्र ने बहुत कुछ सीख लिया होगा। साथ ही हमारे राजनीतिक शासकों और योजनाकारों को भी हिमालय पर अपने ड्रीम प्रोजेक्ट थोपने पर नए सिरे से विचार करना होगा।

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अपने बेवाक कथनों के लिए चर्चा में रहने वाले केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी तो सार्वजनिक रूप से अपनी ओर से हुई चूक को कबूलने के साथ ही हिमालयी क्षेत्र की विशेष परिस्थितियों का उल्लेख भी कर चुके हैं। अगर पहले के अनेक हादसों की तरह कुछ दिन बाद फिर सिलक्यारा की दुर्घटना की बात आई गई हो गई तो फिर भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति को कोई नहीं रोक सकता।

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टिहरी बांध की टनल में मरे थे 29 श्रमिक

दरअसल पिछले ही साल 19 मई को जम्मू-श्रीनगर राजमार्ग पर रामबन में एक सुरंग निर्माण के दौरान भूस्खलन की चपेट में आने से 10 श्रमिकों की मौत हो गई थी। इसी उत्तराखण्ड में टिहरी बांध परियोजना के निर्माण के समय 1 अगस्त 2004 को सुरंग में काम चलने के दौरान हुए हादसे में 29 मजदूरों की जानें चलीं गई थीं।

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सुरंग निर्माण के दौरान अप्रत्याशित घटनाएं होती रहती हैं जिनसे निपटने के लिए अनुभव और क्षेत्र विशेष की भूगर्भीय स्थिति की सही जानकारी होनी चाहिए। मगर अनुभव बताता है कि विभिन्न कारणों से लापरवाहियों से सुरक्षा मानकों की निरन्तर अवहेलना होती रही है।

हिमाचल में भी होते रहे हादसे

स्वयं केन्द्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी भी इस संवेदनशीलता का उल्लेख कर सावधानी बरतने की बात कह गए हैं, लेकिन योजनाकार और योजनाएं बनवाने वाले इस हकीकत की अनदेखी करते रहे हैं। टिहरी बांध परियोजना की भूमिगत खुदाई के दौरान 2004 में हुए हादसे के कुछ ही दिनों बाद 7 अगस्त, 2004 को कुल्लू से लगभग 60 किमी दूर हिमाचल प्रदेश में पारबती जल विद्युत परियोजना में एक सुरंग के अंदर बीस श्रमिक फंस गए थे जिन्हें सिलक्यारा की तरह बचा लिया गया।

इसी तरह 14 फरवरी 2010 को हिमाचल प्रदेश के ही किन्नौर जिले में 1,000 मेगावाट की पनबिजली परियोजना करछम वांगतु में बांध निर्माण के लिए किए गए विस्फोट कार्य से अस्थिर पत्थर और बोल्डर श्रमिकों की एक अस्थायी बस्ती पर गिर गए। जिससे 6 श्रमिकों की मृत्यु हो गई और 16 गंभीर रूप से घायल हो गए। नवंबर 2015 में उसी किन्नौर जिले में एक और त्रासदी में, शोंगटोंग-करचम परियोजना में एक विस्फोट में दो श्रमिकों की मौत हो गई और छह घायल हो गए।  

जानबूझकर बहुत दूर से लाये जाते हैं मजदूर

ऐसे हादसों में मरने वाले लोगों की वास्तविक संख्या में हमेशा विवाद रहता है। अगस्त 2004 को टिहरी बांध परियाजना की डायवर्जन टनल टी-3 में चट्टाने खिसकने से मरने वालों की अधिकारिक संख्या 29 बतायी गई थी जबकि उस समय वहां कम से कम 109 लोगों के मौजूद होने की बात सामने आई थी। इसी साल 19 जुलाई को चमोली कस्बे में बिजली का करंट से मरने वालों की संख्या 16 बताई गई थी लेकिन अपुष्ट समाचारों में यह भी कहा गया था कि कुछ लोगों ने जान बचाने के लिए हड़बड़ी में उफनती अलकनन्दा में छलांग लगा दी थी।

दरअसल निर्माण कार्य बहुत दूर-दराज के इलाकों में होते हैं, इसलिए कई निर्माण कंपनियां बहुत दूर के गरीब इलाकों से श्रमिकों को लाने की रणनीति अपनाती हैं। फिर उन्हें स्थानीय आबादी से दूर करने की कोशिश की जाती है ताकि इन श्रमिकों के साथ जो कुछ भी हो वह रहस्य बना रहे।

यह व्यवस्था नियोक्ताओं को न्यूनतम वेतन कानूनों के घोर उल्लंघन, सुरक्षा आवश्यकताओं की उपेक्षा और मुआवजे का भुगतान न करने से बचने में मदद करती है। सिलक्यारा सुरंग निर्माण में ठेकेदारों द्वारा यही टैक्टिस अपनाई गई थी। वहां फंसे 41 श्रमिकों में से उत्तराखण्ड के केवल दो श्रमिक थे जिनमें से एक सुपरवाइजर ही था। जबकि वहा झारखण्ड के 15 और उड़ीसा के 5 श्रमिक थे।  

Silkyara Tunnel Incident: Problem and challenges In tunnel construction
Silkyara Tunnel Incident - फोटो : संवाद

ऋषिकेष कर्णप्रयाग रेल की सुरंगों में किसी को खरोच तक नहीं आई

ऋषिकेश -कर्णप्रयाग रेललाइन के लिए बन रही 105 किमी लंबी 17 सुरंगों में अब तक एक भी श्रमिक का खरोच तक आने की खबर सुरंगों से बाहर नहीं निकली। जबकि सुरंग निर्माण में घटनाएं घटती रहती है। इन 17 सुरंगों के लिए कुल छोटी-बड़ी 218 किमी लम्बी सुरंगें बननी हैं। चूंकि हिमालय क्षेत्र में राजमार्ग और बांध श्रमिकों को अक्सर शोषण के साथ-साथ उच्च जोखिम और अलगाव का सामना करना पड़ता है, इसलिए हमारी सरकारों को उनकी सुरक्षा और सुरक्षा के लिए तात्कालिकता के आधार पर महत्वपूर्ण कदम उठाने चाहिए।

समूचा खनन क्षेत्र जोखिम भरा है

सवाल केवल सड़क या रेल परियोजनाओं की सुरंगों का ही नहीं है। समूचा सुरंग निर्माण क्षेत्र जोखिम से भरा होता है, जिसमें गरीब मजदूरों की ही जानें जोखिम में होती हैं। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय द्वारा प्रायोजित एनविस सेंटर ऑन एनवार्नमेंटल प्राब्लम ऑफ मानिंग संस्था की रिपोर्ट के अनुसार सन् 2013 से लेकर 2023 अब तक की 10 वर्षों की अवधि में देश में कुल 225 माइनिंग दुर्घटनाएं हुईं जिनमें 404 लोग मारे गए और 271 घायल हुए। घायलों से अधिक मृतकों की संख्या को देखते हुए माइनिंग के खतरों की गंभीरता का आंकलन किया जा सकता है। इस अवधि में सर्वाधिक 151 मौतें 2018 और 102 मौतें 2015 में हुई थीं।  

भारतीय कंपनियों की घटिया डीपीआर

अपने बेवाक बयानों के लिये चर्चित सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने इसी साल 17 मई 2023 को उद्योग जगत के प्रमुख संगठन फिक्की के एक कार्यक्रम में कहा था कि सड़क परियाजनाओं में विलम्ब, लागत में वृद्धि और दुर्घटनाओं के लिए अगर कोई सबसे बड़ा दोषी है तो वह डीपीआर बनाने वाला है।

डीपीआर का मतलब डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट। गडकरी के अनुसार भारत की डीपीआर बनाने वाली कंपनियां निहायत घटिया डीपीआर बनाती हैं, इसलिये हमें इस कार्य के लिये अन्तर्राष्ट्रीय कंपनियों की मदद लेनी चाहिए। घटिया डीपीआर के मामले में गडकरी की यह धारणा सिलक्यारा सुरंग हादसे में सही साबित हो गई। अब बताया जा रहा है कि सिलक्यारा सुरंग की डीपीआर में जिस जगह पक्की रॉक बताई गई थी वहां खुदाई के दौरान भुरभुरी मिट्टी निकल रही है। लूज रॉक का मलबा खुदाई में थम नहीं रहा है।

हिमालय पर 2.75 लाख करोड़ की सुरंगे बनेंगी

अगर केन्द्रीय मंत्री की आंशका निर्मूल नहीं है तो वर्तमान में चल रही राजमार्गों की तमाम सुरंग परियोजनाओं पर सवाल उठना वाजिब ही है। क्योंकि इन सबकी डीपीआर भारतीय कंपनियों द्वारा बनायी गई हैं। अगर ऐसी डीपीआर के आधार पर बनने वाली सुरंगें आज टिक भी गईं तो इनके कल का क्या भरोसा? सिलक्यारा सुरंग का वह हिस्सा भी ढह रहा था जिसे पक्का कर दिया गया था। उत्तराखंड के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर में इस वक्त पौने तीन लाख करोड़ रुपये की लागत की सुरंगें बनाई जा रही हैं।

ये सुरंगें विभिन्न रेल, सड़क प्रोजेक्ट में बन रही हैं। गडकरी का यह भी कहना था कि वर्तमान में सड़क परियोजनाओं में हिमालयी क्षेत्रों में लगभग 79 किमी लम्बी सुरंगें बन रही हैं जिनमें 6 सुरंगें हिमाचल प्रदेश और 2 उत्तराखण्ड की भी हैं जिनका सुरक्षा ऑडिट अब सिलक्यारा हादसे के बाद कराया जा रहा है। राजमार्ग के अलावा उत्तराखण्ड में रेल मार्ग के लिए 17 बड़ी सुरेंगे बन रही हैं जिनमें से कुछ तैयार हो गई हैं।

अगर रेल लाइन सचमुच बदरीनाथ और केदारनाथ तक पहुंचाई गई तो रेल सुरंगों के बार नहीं दिख सकती। सन् 2021 के अन्तराष्ट्रीय रोड टनल वेबिनार में गडकरी ने कहा था कि देश में कुल 270 किमी लम्बी सुरंगें 2026 तक बनायी जानी हैं जिनमें से 135 किमी लम्बी सुरंगों की डीपीआर उस समय तक बन चुकी थी। ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए कि सिलक्यारा हादसे से सबक लेकर इन सभी सुरंग परियोजनाओं में सुरक्षा मानकों के साथ ही पर्यावरणीय मानकों का पूरा ध्यान रखा जाएगा।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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