कोरोना से हाहाकार: जनता को इस पीड़ा से छुटकारा कब और कैसे मिलेगा?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
हर तरफ कोहराम मचा है। मानों ज़िंदगी कहीं गुम हो गई है। डॉक्टर्स फोन नहीं उठा रहे। अस्पताल के फोन बिजी जाते हैं। तमाम हेल्पलाइन नंबर बेकार हैं। डॉक्टरों के तमाम कथित पैनल आम मरीजों के लिए नहीं हैं। एक ने गलती से फोन उठाया तो खीझकर बोला, सुबह से दो हजार फोन रिसीव कर चुका हूं। जो कहना है व्हाट्सएप पर भेज दो, वक्त होगा तो जवाब दे देंगे।
व्हाट्सएप पर कई डॉक्टरी नुस्खे घूम रहे हैं। फॉरर्वर्डेड मैसेज की भरमार है। हर कोई डॉक्टर नज़र आता है। सब के सब आयुर्वेदाचार्य हैं। कोई होम्योपैथ बता रहा है तो कोई अनुलोम विलोम करवा रहा है। कोई ऑक्सीजीन लेवल लगतार चेक करने को कह रहा है तो कोई स्टीम लेने और ब्रीदिंग एक्सरसाइज़ की सलाह दे रहा है। यानी जिसके पास जो नुस्खा है, बताकर किसी तरह मरीज़ को ठीक करने के रास्ते बता रहा है। और कोई करे भी तो क्या करे। सबको पता है कि सिस्टम ‘कोलैप्स’ हो चुका है।सरकारें घोषणाएं करने के अलावा कुछ नहीं कर सकतीं। उनकी प्राथमिकताएं दूसरी हैं। उनके लिए जीवन का मोल नहीं है। वो अधिकारियों के साथ बैठकें करने की खानापूर्ती करती आई हैं।
बड़ी-बड़ी बातें कोई उनसे सुन ले। उन्हें चुनाव से फुर्सत नहीं है। उन्हें कुंभ में भीड़ जुटाने से फुर्सत नहीं है। उन्हें इस बात की परवाह नहीं है कि जिन लाशों पर सवार होकर वो वोट मांग रहे हैं, जिनकी ज़िंदगी से खेलकर वो अपनी बेशर्म राजनीति चमका रहे हैं, आंखें नचा नचाकर, उंगलियां घुमा घुमाकर तरह तरह के स्वांग कर रहे हैं, वही देर सवेर उन्हें खत्म भी कर सकती है। उन्हें देश के ‘पागलपन’ पर भरोसा है। उन्हें अपनी ‘लहर’ के आगे कोरोना की ‘लहर’ कुछ नहीं लगती। कोरोना तो अच्छा बहाना मिल गया है। जय हो उस चीन का जिसने इतनी बड़ी विपदा दुनिया को सौगात में दे दी।
खासकर भारत जैसे देश को ये अमोल तोहफा दे दिया जिसके लिए आपदा ‘अवसर’ है। एक ऐसा कारगर अवसर जब लोगों में मौत का खौफ भरकर लोगों को एक दूसरे से अलग कर दो। एक ऐसा अवसर जब मौत के आंकड़े गिनने के लिए पूरी टीम लगी हो, हिसाब-किताब हो रहा हो, परसेंटेज निकाले जा रहे हों। एक ऐसा अवसर जब रोज़ लाखों की संख्या में आरटीपीसीआर जांच का खेल चल रहा हो। आप जांच कराने केंद्रों पर चले जाएं। भीड़ देखें, गंदगी देखें।
कोरोना को लेकर लापरवाही
कोरोना नियमों की धज्जियां उड़ती देखें। हाथ में डंडा लिए लोगों को हांकते कांस्टेबल और खुद को काबिल समझने वाला स्टाफ देख लें जो बताता है जाओ पहले टोकन की लाइन में लगो, जब नंबर आए तो आना। प्राइवेट अस्पतालों में दनादन नोट गिने जा रहे हैं। टेस्टिंग के लिए कागजी खानापूरी करके लाइन में लगिए, पेमेंट कीजिए, कई घंटों के घुटन भरे माहौल में एक दूसरे से टकराते, घिसटते और अगर कोरोना न हो तो उसे साथ लेते टेस्ट कराइए और फिर रिपोर्ट का कई दिनों तक इंतज़ार कीजिए। दवाओं की फेहरिस्त पहले से तैयार है, सोशल मीडिया पर घूम रही है, डॉक्टर अगर गलती से हाथ आ जाए तो वो भी वही फेहरिस्त पकड़ा देता है। जिंक, आइवरमेक्टिंन, डोलो, विटामिन सी, मल्टी विटामिन, डॉक्सी...।
कुछ रामदेव का कोरोनिल बताते हैं तो कुछ गिलोय। काढ़ा तो सबसे जरूरी और स्टीम लें तो बंद नाक, जकड़ा गला और सीना खुल जाए। और सबसे जरूरी घर में क्वारंटीन रहिए। एक दूसरे से दूर रहिए, खुद को कमरे में बंद कर लीजिए, गलती से भी एक दूसरे को छुइए मत। अब आप सोचिए। किसके पास इतनी बड़ी हवेली है कि वह ऐसा एकांतवास ले लेगा। एक-दो या हद से हद तीन कमरों में कैसे ऐसी व्यवस्था हो सकती है कि सब अलग थलग रह लें। और अगर घर के सभी सदस्य पॉजिटिव आ गए तब क्या कर लेंगे। अजीब मुसीबत है।
ऑक्सीमीटर का बाज़ार गर्म है। दनादन 1500 से चार-पांच हजार तक बिक रहे हैं। कुछ जगह कालाबाजारी हो रही है। अब घर में अगर चार बीमार हों तो चार चार ऑक्सीमीटिर या थर्मामीटर तो होगा नहीं। वही सैनिटाइज करके इस्तेमाल कीजिए। डर अलग कि अगर छू जाए तो क्या हो। जिन बड़ी बड़ी दवाओं की कालाबाजारी के किस्से चल रहे हैं, जिस तरह ऑक्सीजन प्लांट अब लगाने की घोषणाएं हो रही हैं, इसका अंदाज़ा तो पहले से था ही। कोई ठेका लेकर भाग जाता है तो कहीं प्लांट लगाने के लिए जमीन तलाशी जा रही है।
पीएम केयर फंड से अब ये प्लांट लगेंगे। पहले कोविड अस्पताल बन रहे थे। इस कहानी को कोई सवा साल हो गए। अबतक 1.80 करोड़ संक्रमित अपने देश में दर्ज़ हो चुके हैं, दो लाख से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। अब रफ्तार पहले से कहीं तेज़ है। सरकार और तथाकथित ‘सिस्टम’ अभी ‘पीक’ का इंतजार कर रहा है। थोक में लाशें जलाने के वीभत्स दृष्य चैनल वाले खूब दिखा रहे हैं।
सोशल मीडिया पर कोरोना को लेकर भ्रम
यूट्यूब, फेसबुक और सोशल मीडिया देख लें तो पागल हो जाएं। मौत का भयानक मंजर है। लेकिन हमारी मोटी चमड़ी वालों को कोरोना कुछ नहीं करता। वो पॉजिटिव आने तक की रस्मअदायगी तक रह जाते हैं, खुद को ट्विटर पर होम क्वारंटीन करने की सूचनाएं देते हैं। क्योंकि कोरोना आम लोगों की बीमारी है। हवा में इंफेक्शन फैलता है तो आम आदमी के गले और शरीर तक पहुंचता है। कुछेक बेचारे कम इम्युनिटी वाले जरूर शिकार हुए क्योंकि वो भीतर से कमजोर थे या पहले से किसी और बीमारी से पीडित। कितने साहित्यकार, लेखक, कलाकार, पत्रकार और आम लोग चले गए, क्योंकि वो आम थे। किसी को वेंटिलेटर नहीं मिला, किसी को बेड नहीं, किसी को ऑक्सीजन नहीं तो कोई एक बार आईसीयू में गया तो उसका क्या हुआ, बाहर किसी को पता नहीं। इतने खौफनाक मंज़र की तो कभी कल्पना भी नहीं की गई थी।
कोर्ट स्वत:संज्ञान ले रहे हैं अब। वो फटकार लगाते हैं। वो कड़ी टिप्पणियां करते हैं। कभी चुनाव आयोग पर बरसते हैं तो कभी सरकार पर तो कभी सिस्टम पर। कोर्ट और कर भी क्या सकते हैं। कोर्ट को भी पता है कि वह इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकते। कम से कम किसी जज ने ये तो खुलकर बोलने की हिम्मत जुटाई कि ये सामूहिक हत्या है। लेकिन कोर्ट भी इस देश की सच्चाई को अच्छी तरह जानता है, यहां की सियासत और सत्ता को जानता है, व्यवस्था के खोखलेपन से वाकिफ है, इसलिए वह कभी कभार अपनी जिम्मेदारी कुछ तल्ख टिप्पणियों से निभा देता है।
हम खुश हो लेते है कि चलो सरकार को फटकार लगी। लेकिन ऐसी फटकारों का असर अगर मोटी चमड़ियों पर होने लगे, तब तो हो चुकी सियासत। अब वैक्सीन की बात हो रही है। अभी न तो 60 वाले पूरे हुए, न 45 वाले, अब 18 वालों को भी रजिस्ट्रेशन करवाना है। लेकिन सरकार भी कह रही है कि यह ‘फुल प्रूफ’ नहीं है। बस इतना है कि आप मरेंगे नहीं। इंफेक्शन तो फिर भी हो सकता है। अस्पताल के खर्चे तो रहेंगे ही। अगर कुछ न हो तो आपसे किस्मतवाला कोई नहीं।
किसी को कुछ पता नहीं, सब राम भरोसे है। अराजकता अपनी चरम पर है। बेहतर है ‘रामजी’ को याद कीजिए। इस कलयुग में अब वही बेड़ा पार करेंगे। सरकार भी यही चाहती है। आस्था के आगे सब बेकार है। बाकी तो सब माया है। और अगर ज्यादा बेचैनी है तो 2 मई का इंतजार कर लीजिए। कोर्ट ने कहा है जश्न नहीं मनाना है। देखते रहिए कैसे मनता है जश्न। उसके बाद और भी राज्य हैं... चुनाव है.. कोरोना है तो कौन सी आफत है। जनता मरने के लिए है, मरने दीजिए।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।