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दूसरा पहलू: पारिस्थितिकी बहुत बदल चुकी है... विलुप्त अगर लौट आए, तो जिएंगे कैसे?

Fri, 16 May 2025 07:37 AM IST
दीपक कुमार शर्मा तिमोती नील कॉल्स्न
तिमोती नील कॉल्स्न Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 16 May 2025 07:37 AM IST
सार

डाइर भेड़िये की वापसी का दावा यह सोचने पर मजबूर करता है कि इन्सानों ने अपने पारिस्थितिक तंत्र के साथ क्या किया है। यह स्पष्ट नहीं है कि कोलोसल द्वारा विकसित भेड़िये ग्रे भेड़ियों से कैसे भिन्न होंगे। संभव है कि वे अलग तरीकों से भिन्न-भिन्न जानवरों का शिकार करें। जुरासिक पार्क फिल्म में डायनासोर को फिर से बसाने का प्रयास किया गया। इसी तरह कोलोसल विलुप्त हुए जीवों को विकसित करे भी, तो वे पनप पाएंगे या नहीं, इसकी गारंटी नहीं है, क्योंकि तबसे पारिस्थितिकी बहुत बदल चुकी है।

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Second aspect ecology has changed a lot If extinct species come back how will they survive
तिमोती नील कॉल्स्न और डायर भेड़िया - फोटो : अमर उजाला प्रिंट

विस्तार

अमेरिकी जेनेटिक इंजीनियरिंग फर्म कोलोसल बायोसाइंस ने हाल ही में धूम-धाम से घोषणा की कि उसने करीब दस हजार वर्ष पहले विलुप्त हुए भयानक भेड़िये (डाइर वुल्फ) को पुनर्जीवित किया है। हालांकि आनुवंशिक संशोधन से तैयार ये तीन भयानक भेड़िये वास्तव में आधुनिक ग्रे भेड़िये हैं। भले ही आप उन्हें भयानक भेड़िया मानें या नहीं, पर कोलोसल बायोसाइंस ने दिलचस्प दावा किया है कि उसने खोए हुए पारिस्थितिक तंत्र को आनुवंशिक रूप से तैयार किया है। क्योंकि सभी जीव अपनी आवासीय पारिस्थितिकी पर किसी न किसी रूप में अपना प्रभाव डालते हैं।

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मसलन, मधुमक्खियां और कई अन्य कीट फूल वाले पौधों को परागित करते हैं, ऊदबिलाव बांध बनाते हैं, जिससे तालाब निर्मित होते हैं और नदियों की प्रवाह गति को बदलते हैं, हाथी पेड़ों को गिरा देते हैं, जिससे सवाना खुला रहता है और चींटियां व दीमक बड़ी मात्रा में मिट्टी को हटाते हैं तथा पौधों के कूड़े को सड़ने में मदद करते हैं। इसने मुझे यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया कि हमारे द्वारा किए गए विलुप्तीकरण के चलते आज के पारिस्थितिकी तंत्रों से कौन से पारिस्थितिक कृत्य गायब हैं। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि कोलोसल द्वारा विकसित भेड़िये ग्रे भेड़ियों से कैसे भिन्न होंगे, संभव है कि वे अलग-अलग तरीकों से भिन्न-भिन्न जानवरों का शिकार करें। फिर भी डाइर भेड़ियों की वापसी का दावा एक उम्मीद तो जगाता ही है।
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इन्सानों की वजह से अफ्रीका से लेकर पूरी दुनिया में छोटे जानवरों की अपेक्षा बड़े ज्यादा विलुप्त हुए, जो अलग-अलग पारिस्थितिक कार्य करते थे। अफ्रीका एकमात्र ऐसा महाद्वीप है, जहां बहुत सारे बड़े शाकाहारी जानवर अब भी बचे हुए हैं, जिनमें गैंडे, हाथी, दरियाई घोड़े, जिराफ और भैंस शामिल हैं। लेकिन यहां इन्सानों के बसने से कई जानवरों की प्रजातियां विलुप्त हो गईं। जैसे जुरासिक पार्क  फिल्म में डायनासोर को फिर से बसाने का प्रयास किया गया। इसी तरह कोलोसल बायोसाइंस आनुवंशिक रूप से विलुप्त हुए जीवों को विकसित करे भी, तो वे पनप पाएंगे या नहीं, इसकी गारंटी नहीं है, क्योंकि तबसे पारिस्थितिकी बहुत बदल चुकी है। जीवित जानवरों के आनुवंशिक बदलाव से खोए हुए पारिस्थितिक कार्य को फिर से निर्मित करने की कोशिश के बजाय, हमें उन क्षेत्रों में मौजूदा प्रजातियों का उपयोग करके पारिस्थितिक कार्य को बनाए रखने और बहाल करने पर ध्यान देना चाहिए, जहां वे रहते हैं या कभी रहते थे। -द कन्वर्सेशन से

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